माँ भाई के साथ चली गई। साथ में पापा की वह तस्वीर भी ले गई जिसपर रोज़ फूल चढ़ाती थी। माँ का कमरा खाली हो गया है।
मैने नहीं पूछा उन्हे यूँ जाना कैसा लग रहा है। कोई समय शायद ऐसा रहा हो जब माँ अकेले भी दुनिया को अपने बस में करना चाहती हो। पर मुझे उनका अकेला होना याद नहीं । पापा की दुनिया माँ से शुरु हो वहीं खत्म हो जाती थी। पास की दुकान ले जाने से लेकर सड़क पार पापा ही करवाते थे। आखिरी बार आई सी यू में ले जाते वक्त पापा हाँफ और साँस के बीच माँ के आराम की चिंता कर रहे थे।
माँ के चश्मे में पापा की तस्वीर और तस्वीर के फ्रेम में माँ की झलक देख मुझे उनके साथ होने का दिलासा होता था।
माँ ने पापा की तस्वीर अपनी शॉल में लपेट कर हैंड बैगेज में रखी थी। दिल को सदमा सा पहुँचा था। फिर याद हो आई माँ के साथ की पापा की निश्चिन्त सी छवि।
माँ को मैने नहीं रोका।
कुछ दिलासों के झाँसों पर ही सही...... जब तक पापा हैं माँ की चिंता करने की जरूरत नहीं.....
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3 comments:
बहुत सुन्दर लघु-कथा है. बधाई.
मन भीग गया ..कुछ एहसास होते हैं जिनको केवल महसूस किया जा सकता है ..
ओह जाने कैसा कैसा सा मन हो गया ...बहुत कुछ याद आ गया.
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