Tuesday, September 28, 2010

बेमौसम

मौसम अचानक ही बदला है। एकदम गरम दोपहरी पर कहीं बाकी बचे सावन के छींटे पड़े हैं। बादल गरज रहे हैं। और चमकती हुई बिजली भी नीले आसमान पर चुँधिया रही है। मौसम ठंडा हुआ है। बादल चमक, गरज कर भी बरस नहीं पा रहे। जैसे रूदन कहीं गले में ही अटक गया हो....।

बादल आज प्रासंगिक नहीं। जैसे बिना संदर्भ ही बात छिड़ गई हो। और फिर किसी पुराने ना चुकता किए ऋण के व्याज की याद की तरह एक अनकहे दर्द सी उभरी हो।

हिसाब जो निपटाये नहीं जा सके विलीन नहीं होते। समय की सलवटों में कहीं अटके भटके से ठहर जाते हैं। वक्त अपना खाता खुद सँभालता है। और मौका देख अपनी चाल चलता है। पासे पलट जाते हैं। हिसाब गड़मड़ा जाता है।

हमें आदत है राउँड ऑफ करने की। जो फिगर आधे आँकड़े से कम उसे मिटा देना। और जो आधे से ज्यादा वो पूरा एक अंक। हमारे हिसाब पक्के नहीं। समझ भी कच्ची ही है। अनुमान ....हाँ अनुमान ....सही गलत का अनुमान, समझ नासमझ का, निदान और उपचार भी अनुमान....।

जीवन चलता है। संदर्भ बनते बिगड़ते हैं। हम इसके अर्थ खोजते हैं। स्थिति परिस्थिति को ताड़ अंदाज़े से परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं।
हमेशा अनुमान सही नहीं होता।

....और बेमौसम बरसात होती है.......

4 comments:

Udan Tashtari said...

हमें आदत है राउँड ऑफ करने की-सही खाता बही में यह नहीं चलता...

बस, विंडो ड्रेसिंग का माधयम है...सो सही है जिन्दगी जीने के लिए...

डॉ .अनुराग said...

बेमौसम की बारिश में उम्मीद के छाते भी तो... तैयार नहीं रहते .....ओर बाज़ी फिर वक़्त के हाथ .....

समय said...

समसामयिक संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में लाजवाब तरीके से बात कही गई है। बेहद प्रभावशाली।

शुक्रिया।

शरद कोकास said...

हमेशा अनुमान सही नहीं होता।

और ऐसा ही हुआ ।