
कितनी बार यूँ होता है मन वक्त का साथ छोड़ देता है। वक्त के किसी कोने में ढ़ेरा डाल कर पसर जाना चाहता है। किसी सुरीली सी धुन के जाम के साथ पुरानी सी किसी याद में ठहर जाना चाहता है। हौले हौले मन सोंकता है...कुछ कही,कुछ रही बातों को......कुछ अनकही को कह कर देखता है....कुछ को पकड़ कर सुनने की कोशिश करता है...। घावों को कुरेदने में अपना एक सुकून है....। जैसे उनके रिसने से उनके होने पर विश्वास होता है। हसरतों की शायद उम्र नहीं होती....मौसम होते हैं....। मौसम जो वक्त के साथ तो कभी मन के साथ बदल जाते हैं।
आती है ऐसी शाम जब वक्त को रोकने को जी चाहता है। उलझे हुए मन के तार सार तलाशते हुए थकते हैं...रुकते हैं....। मन वक्त को पीछे धकेलता है....और वक्त आगे गुजर जाता है । सुरीली सी धुन मन के तारों में उलझ जाती है।
Painting-Sergio Gonzalez




2 comments:
"नौस्टाल्जिया" अच्छा सा नहीं लगता।
पर इन शब्दों को पढ़ना कुछ अच्छा सा लगा।
शुक्रिया।
नौस्टेल्ज़िया हर हमेशा बुरा नही होता ...खूबसूरत अल्फाज़ और खूबसूरत पेंटिंग
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