
ऐसे लगता है जैसे किसी राह की तलाश में जीवन की चेतना पाई हो। और रास्तों के पड़ावों में ना रास्ता याद रहा ना तलाश। जैसे किसी सपने के उगने पर...जागी आँखों के सच धुँधले से पड़ जाते हैं। और सपने के ही मायने दिखाई देते हैं। ऐसे बँधता है मन लगावों के तारों से...कि छटपटा कर सपने में ही कैद होकर रह जाता है। नींद से जगना फिर भी आसान ही है...अधूरी चेतना से जागना बहुत मुश्किल। कहीं कोई चेहरा, कोई खुशबू, कोई स्वाद,कोई स्पर्श ...कोई आवाज़ बहुत अपनी सी नज़र आती है। उसके अपनेपन की वजह भूल जाती है। जैसे किसी दिमागी आहत इंसान से याददाश्त अधूरी खोई हो। पहले इन उलझे हुए तारों में उलझते हैं....फिर इन्हे सुलझाते हुए समय गुजर जाता है। तलाश अक्सर अधूरी ही रह जाती है। इस पड़ाव के आगे ना निकल पाते हैं....और किसी शाप की तरह फिर फिर उसी सपने से गुजर जाते हैं। कभी सोचती हूँ...उस पत्ते के बारे में ....जो जिस्म पहन कर टिड्डे की तरह उड़ सका.....। उस गिरते हुए पँख को देख कर आश्चर्य होता है ...किस तरह पानी में जीवित होकर तैर सका।
.....शायद आता है हम सभी के पास एक ऐसा पल...जहाँ हम फिर रास्तों तक हाथ बढ़ा सकते हैं...। तलाश से मंजिल की तरफ......चेतन, अभिज्ञ। किसी स्क्रिप्ट से पढ़ी कहानी की तरह नहीं। हर निमिष में सजीव रह...अपने रास्ते ...अपनी तलाश तक पहुँच सकते हैं।
उलझे हुए सायों के बीच से कोई रौशनी की पगडंडी सी चेतना.....जो तलाश पर उजाले बिखेर जाती है...।
Photo credit-Cosmic hand NASA