
तुम उस खुशबू के समंदर सी हो जो लहर लहर सी उठ कर मुझे किनारे से उठा ले जाती है। मेरी साँसों मे घुल यह महक मेरे पोर पोर तक पहुँचती है। तुम्हारी पहचान है इसमें। मुझ तक यह तुम्हारा नाम बन कर आती है। मैने इसे जिस्म पहनते देखा है। और तुम्हारे जिस्म को खुशबू में बदलते देखा है। छूता हूँ तुम्हे तो तपिश में मोम सा पिघलकर जुड़ता ही चला जाता हूँ। तुम्हारे साँचे में ढ़लता ही चला जाता हूँ। मुझे अपने बुलबुलों में बसा कर लहर सी उठती गिरती हो। असमंजस,अनुराग और फिर समर्पण....धूप सा तैरता है तुम्हारी आँखों में...। मैं इन बुलबुलों के भीतर उठता,उभरता हूँ....गिरता उतरता हूँ। तुम्हारी साँसों को चखता हूँ। तुम्हारा स्वाद..। उस अमृत की तरह जो मुझे जीवित करती है। तुम जीवन की तरह दौड़ती हो मेरी नब्ज़ में। तुम्हारा प्रवाह, तुम्हारी गति, उथल पुथल, बेचैन....अपनी धड़कनों पर तुम्हारे लय को महसूस करता हूँ। थक कर ही शायद रुकती हो तुम...मेरे आलिंगन की सीमाओं में ठहरती हो तुम...। छलकती सी तुम...सँभालता हूँ तुम्हे अपने आगोश में....और तुम सिमटती सी चली आती हो। मैं साँस रोक कर सुनता हूँ तुम्हे....तुम्हारी खुशबू में महकता हूँ...। हाँ बस तब ही बदल जाती हो...सिर्फ खुशबू बन जाती हो...मेरी पकड़ से आज़ाद फिर छलक जाती हो। निर्दोष सी कोई हँसी की धुन की तरह...किसी चंचल भोली ललक की तरह...। अपनी गहराई की थाह समझ पाने की चाह...चाँदनी को ओढ़ लेने की आस....सैलाब सा उठती हो तुम....फिर खुशबू में बिखर जाती हो....। मुझे साथ लेकर ....उठ हवा में चल....मेरे साथ...
...बूँद सा मैं...तेरे सतरंगी खुशबू में नम...
तेरे साथ ही फिर ..........सावन सा बरस जाता हूँ....।




