Tuesday, March 17, 2009

दोपहरी

मार्च एप्रिल का महीना। घनी छाँव सी छनी धूप घर के पिछवाड़े पर पड़ती थी। धूप ,छाँव पहन थोड़ी सी ठंडी होकर गुनगुनी सी बदन को छूती थी। नींबू के पौधों से हल्की सी खट्टास ताज़गी की तरह उठती। मुझे यहाँ बैठना अच्छा लगता था। गर्म हवायें आम के पेड़ की साँसों की तरह चेहरे पर महसूस होती । यहाँ मुझे अकेला नहीं महसूस होता। पत्तों की सरसराहट से लेकर कोयल की कूक सब जाना पहचाना था। कभी अचानक से पकी इमली टप्प सी गिर जाती। बहुत सी आवाज़ों के बीच सुकून सी नि:शब्दता।
सिमेन्ट के चबूतरे पर बैठ छोटे पछीटों को हथेली से उछालती और कल्पना उड़ान भरने लगती। डॉक्टर, इंजीनियर, एस्ट्रानॉट...गुड़िया की शादी के सपने,बड़ी सी गाड़ी के सपने....अच्छे चमकीले कपड़े....ढ़ेर सारे चाभी से चलने वाले खिलौने....। चबूतरे पर जमी लाल मिट्टी पर पाँव चलाती और समंदर के किनारे की रेती को छू आती। पास ही बेल थी..एक घनी बेल जिसपर मोगरे गुच्छों मे खिले होते....उनकी महक हवा में घुली होती। थोड़ा पानी बाल्टी में लेकर, मग के मुँह पर हाथ रख बेल पर पानी छिड़क देती...। मोगरे नहा कर...उछल खूद बेल पर लहराने लगते। और मैं सोचती एक बाड़ी...जिस पर मोगरे ही मोगरे हों..., नीचे साफ सुथरी पक्की क्यारी और बाड़ी पर लगा एक सफेद गेट।

घर के पिछवाड़े की बाड़ी छोटी टहनियों को गूँथ कर पापा ने रामू की मदद से बनाई थी। छोटी मोटी यहाँ वहाँ मुड़ी टहनियाँ कैसे तो पंक्ति में बँध गई थी। धीरे धीरे सँभल कर मैं उनपर हाथ चलाती। चिकनी, फिर खुरदुरी...बीच में काँटे। एक कोने से हिलाओ तो मिट्टी फिसल कर सरक सरक नीचे गिरती।


आँख बंद कर फेफड़ों को फैला कर भरी पूरी एक साँस लेती....और मार्च एप्रिल का जायका मेरे जहन में समा जाता...। पूरे साउँड और विश्अल एफेक्ट्स के साथ।

..............................................................
महीना मार्च ही है। गर्म हवायें भी हैं। बड़ी सी गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील थामे....प्यारी सी गुड़िया को रियर सीट में बैठा कर...फूलों की क्यारियों के बीच से गुजरते हुए.....कैसे तो मन फिर उसी दोपहरी के लिए तरसा है.......।

Tuesday, March 10, 2009

रंग


लाल, पीला, हरा , नीला...कैसे कैसे तो फीके...कैसे चटकीले...कितने सारे रंग। याद है जब टेसू के फूलों से पानी में घुलता था रंग....और हाथों में लगाई मेहंदी पर शक्कर के पानी से चढ़ता था रंग। हल्दी और बेसन....चेहरे पर कैसे कैसे तो निखरता था रंग।

जब पहली बार इँद्रधनुष देखा तो सच में लगा था कोई कूची लेकर बैठा होगा...नहीं तो इतने बड़े आसमान पर कैसे तो उतरा होगा रंग। पता नहीं कब तो बंद आँखों के भीतर से भी दिखने लगे थे रंग। पुतलियों के नीचे से सरक काले को सरका कर हल्का हरा,नीला फिर नारंगी....। कब तो सीखा था...बेरंग हकीकत को सपनों से रंगने का हुनर ।

सूरज के मिज़ाज की तरह जिंदगी भी मन की घटाओं को रंगती जाती। कभी सफेद, उज्जव्ल....कभी अँधेरा सा काला.....लाल, गुलाबी,नारंगी, स्लेटी.... अलग अलग कितने रंग। प्रतिबिंब में बदलते थे रंग....और बिंबों में सजते थे रंग। कुछ आँखों में खुमार बन उमड़ते थे रंग.....कभी गालों पर सिमटते थे रंग...।

रंग भी तो कैसे होते हैं....कुछ पक्के होते हैं...कुछ यूँ ही उतर जाते हैं.....। ऐसे भी होते हैं रंग ....दाग बन उभर जाते हैं..।
................................


याद रहते हैं वो रंग....जो रूह पर निखर जाते हैं.....मुझ में घुल ...मेरे होने में शामिल......मेरा रंग बन जाते हैं....।





पूरे ब्लॉग परिवार को होली की शुभकामनायें।