Friday, February 13, 2009

हैप्पी बर्थड़े पापा


पापा,

आप से लंबी बाते करना याद नहीं है। बल्कि साथ बैठ कर भी कब की है बातें।

आज एक बच्चे को उठाये एक बेबस से पिता के चेहरे पर डॉक्टर से जल्द से जल्द मिलने की झुँझलाहट देखी और आप फिर याद आ गये। आप को याद होगा जब टाई पकड़ कर भागते हुए एक कुत्ता पीछे पड़ गया था...और मैं गिर पड़ी थी,आप भागे हुए आये थे। अपनी जेब से बड़ा सा रुमाल लेकर तुरंत बाँध, साईकल की आगे की सीट में बैठा कर दौड़ते पहुँचे थे अस्पताल। उस समय का आपका चेहरा इसी आदमी सा था । सिस्टर ने रूखी सी आवाज़ में उसे हिदायत दी थी....मैं खुद को रोक नहीं सकी और कहा था....चिंता मत करो अभी देखती हूँ।

हर रोज़ किसी ना किसी के चेहरे में दिखते हो पापा। कैसा तो सादा सा चेहरा है आपका...किसी से भी मेल खा जाता है। पूरे दिन मेहनत कर ओवरटाइम करते मज़दूरों में दिख जाते हो....कभी किसी छोटी बच्ची के हाथ में पकड़ी छोटी उँगली से लगते हो, कभी स्टील के छोटे टिफिन में सँभाले बेर में आते हो और कभी गरम दूध के ऊपर बने झाग में। कैसे तो मुस्कुरा देते थे मेरी दूध की मूँछ पर और हमेशा भूले बिना लाते थे चूरण की खट्टी मीठी गोली।मेरे ही साथ जिया था आपने अपना बचपन। कँबल के अंदर सर्द रातों में कड़क सी आपकी हथेली माथे को छूती और मैं और ज़ोर से आँखें मीच लेती। फिर धीरे से मिची हुई आँखों के नीचे से देखती आपका स्नेहसिक्त चेहरा...और आपकी आँखें हँस देती।

मुझे याद है हर बात। मम्मी कहती थी नाज़ों में पालोगे तो आदत बिगड़ जायेगी...और आप कहते मेरी बिजु तो राजकुमारी ही है।

डॉक्टर बनेगी ना...आप पूछते और मैं तुनककर कहती और नहीं तो क्या। बन तो गई डॉक्टर पापा ।

आज फोन पर कामवाली ने ही कहा था पापा अस्पताल गये हैं। पूछने की जरूरत नहीं थी, जानती थी आपको जाना था। अच्छा नहीं लगा।
पता नहीं क्यूँ आपकी तरह क्यूँ नहीं हूँ। आप हमेशा तो हर जोखिम से बचा लेते थे। आपका हाथ पकड़ कर कितना,कितना तो सुरक्षित महसूस होता था। तब जब छोटी थी...और फिर तब भी जब बड़ी हुई और ट्रेन में लोग चेहरे पर धुँआ छोड़ देते।

... आप को खतरे में देख कर बौखला जाती हूँ। आप पूछते हैं सब ठीक हो जायेगा ना...और मैं सोचती हूँ कैसे बिगड़ा सबकुछ। आप तो कभी बेबस नहीं होते थे पापा....और जब आप पूछते हैं...बेटा इससे बेहतर कोई इलाज नहीं इसका..तो कितना बेबस महसूस करती हूँ। मैं कोशिश करके आपकी आवाज़ की थकान को आपका बुढ़ापा समझती हूँ...फिर साँस की लड़खड़ाहट सुनकर ...उसे बच्चे को आवाज़ देकर अपनी आवाज़ से ढँक देती हूँ।

मैं सुनना चाहती हूँ आप ठीक हैं, खुश हैं। आप कह भी देते हैं। पर पता नहीं क्यों सुनकर रोने का मन सा होता है।

पता नहीं कब आपने मुझे सही गलत समझाना छोड़ दिया। मम्मी से भी उलझते समय आप ठोकते नहीं अब। आपके लिए मैं बड़ी नहीं होना चाहती,पापा । आपकी डाँटती आवाज़ मुझे बहुत अच्छी लगती है।

क्रिसमस साथ मनाने की जिद थी। सब काम यहाँ वहाँ सरका कर जब घर पहुँचे और उस लंबी सी सीढ़ी पर चड़ कर तारे टाँक रही थी ...तब हाँफते हुए ही आप सीढ़ी पकड़ने चले आये थे। एक बार फिर महसूस किया था आपका मज़बूत सहारा। पूरी कमज़ोरी में भी आपके हाथों ने मज़बूती से मुझे थामा था।

...लंबा आप पढ़ते नहीं.... पापा आपके पास आना चाहती हूँ...

जन्मदिन मुबारक

आपकी प्यारी बेटी।

Thursday, February 12, 2009

इंतज़ार


आँखें कैसी तो थक जाती हैं राह तकते तकते। और फिर दरवाज़े पर खामोश आहटें सुनाई देने लगती हैं। चहल कदमी और किसी के आने का अंदेशा। बाहर साये रंग पहनने लगते हैं.....फिर जाने कैसे तो लगता है यह वही है जिसका इंतज़ार था। एक आशावाद, कि धुंधली लकीरे साफ होकर दरवाज़ा खटखटा देंगी। पर दस्तक कोई नहीं देता। बजता हुआ संगीत कान से टकराकर लौट जाता और पढ़ते हुए किताब के अक्षर काले श्वेत बेमतसब साँचों में ढल जाते। वक्त चलते चलते थक कर विश्राम करने लगता और इंतज़ार लंबा खिंचने लगता।

इंतज़ार की अजीब सी नि:शब्दता है। जैसे किसी खाली कमरे का सन्नाटा हो। जहाँ पहले तो खुद के ही आवाज़ की प्रतिध्वनि सुनकर वह सब सुनाई देने लगता है जो सुनना चाहते हैं। और फिर .... इनकी गूँज खुरेद खुरेद कर बनाती हैं संशय और डर की दरारें। विराम में विश्राम नहीं...और थकान में नींद। साया और छाया के खेल के बीच सपना एक व्याकुल , अशांत बिंब बन जाता।

वही आवाज़ फिर एक बार, कोई मुलाकात, कोई वादा, कोई निश्चित सौदा। होता है इंतज़ार किसी खिड़की से...किसी दरवाज़े पर दस्तक सा। फोन की घंटी, किसी सुपरिचित चाल की आहट सा, कभी खाँसती सी कोई गला साफ करती आवाज़ सा।

इंतज़ार के चेहरे का रंग समय के साथ उतरते किसी बेहद श्रंगार किये चेहरे से उतरते रंग की तरह बदसूरत सा है। पोता हुआ रंग और काजल के फैलने पर एक विकृत स्वरूप।
उम्मीद की कोख में जन्म लेता है इंतज़ार... । साथी के आने की उम्मीद, किसी खत में अपेक्षित शब्दों को ढूँढ़ने की उत्सुकता , बेसब्री में एतबार किया प्यार....और ना जाने होता है किस किस का इंतज़ार।

मरती हुई आँखों में होता है जीवन का ....तो कभी अपनी साँसें छोड़ देने का इंतज़ार। शुष्क हाथों को स्पर्श का इंतज़ार। लंबी लाईन में किसी अपने के लिए किसी सौगात को ढूँढ़ लेने का इंतज़ार। किसी अजनबी में कभी अपनेपन का इंतज़ार। थोड़ी समझदारी का, थोड़ी सहानुभूति का इंतज़ार। कभी क्षमा का तो कभी मोक्ष का इंतज़ार।

किसी सेतु की तरह है इंतज़ार...। कभी पार भी पहुँचता है ....और फिर उम्मीद की वजह बनता है इंतज़ार।

पर अक्सर धुँध में खोये टूटे पुल सा होता है...जिसके छोर पर पहुँच दौड़ कर लौटता है....या फिर डूब जाता है इंतज़ार।

Saturday, February 7, 2009

अमल


कभी कैसे तो सबकुछ बहुत खूबसूरत हो जाता है। जैसे कोहरे के बीच से सवेरा बादलों को धकेलता हुआ निकलता है। हल्की बूंदाबांदी के बीच से किरण निकल रंगों सी बिखर जाती है। उदर में उठी पहली हलचल, किसी अनजान घबराये बच्चे का पूरे विश्वास से उँगली थाम लेना , बाबूजी को याद करते ही फोन पर उनकी आवाज़ सुनना। लंबी सी जिंदगी में पता नहीं कितने होते हैं ऐसे बिन पाखंड के क्षण। रेत की धूल में गुम किसी हीरे की तरह कहीं धूल में ही सने हुए।

कब बुलाने पर आते हैं...कहाँ इनके लिए कोई आयोजन होता है...कभी किसी के उदास चेहरे पर सिसकियों से उभर आते हैं....और किसी के कँधों पर ठिठक कर रुक जाते हैं...

कोई युक्ति नहीं...कोई षडयंत्र नहीं...खूबसूरती की करवट की तरह...कोई बेहद आम पल खास हो जाता है। ढूँढने वाले ढूँढ़ते है इनके पीछे काम करते हुए मकसद.... इरादे...आँकते हैं इनकी ताकत...पूछते हैं इनकी जरूरत....

परत-दर-परत कैसे तो खुले इनका राज़..
...किसी जादू की तरह...खुदा की तरह...महसूस होते है यह क्षण...

ऐसा लगता है जैसे सभी तरंगें एक लय में बँध गई हो...और होता है अनुनाद....एक संगीत ऐसा...जो जीवन से बेहतर दिखाई देता है....

बहुत कम...पर होते हैं जीवन में ऐसे क्षण....किसी मिलावट के बिना...हर पाखंड़ से अछूता...

ऐसे आँसू की तरह...जिसका दर्द किसी और सीने में उठता है....

....जब जीवन अपलक ठिठक रुक जाता है....और इंसान सदा के लिए ऋणी हो जाता है....