
पापा,
आप से लंबी बाते करना याद नहीं है। बल्कि साथ बैठ कर भी कब की है बातें।
आज एक बच्चे को उठाये एक बेबस से पिता के चेहरे पर डॉक्टर से जल्द से जल्द मिलने की झुँझलाहट देखी और आप फिर याद आ गये। आप को याद होगा जब टाई पकड़ कर भागते हुए एक कुत्ता पीछे पड़ गया था...और मैं गिर पड़ी थी,आप भागे हुए आये थे। अपनी जेब से बड़ा सा रुमाल लेकर तुरंत बाँध, साईकल की आगे की सीट में बैठा कर दौड़ते पहुँचे थे अस्पताल। उस समय का आपका चेहरा इसी आदमी सा था । सिस्टर ने रूखी सी आवाज़ में उसे हिदायत दी थी....मैं खुद को रोक नहीं सकी और कहा था....चिंता मत करो अभी देखती हूँ।
हर रोज़ किसी ना किसी के चेहरे में दिखते हो पापा। कैसा तो सादा सा चेहरा है आपका...किसी से भी मेल खा जाता है। पूरे दिन मेहनत कर ओवरटाइम करते मज़दूरों में दिख जाते हो....कभी किसी छोटी बच्ची के हाथ में पकड़ी छोटी उँगली से लगते हो, कभी स्टील के छोटे टिफिन में सँभाले बेर में आते हो और कभी गरम दूध के ऊपर बने झाग में। कैसे तो मुस्कुरा देते थे मेरी दूध की मूँछ पर और हमेशा भूले बिना लाते थे चूरण की खट्टी मीठी गोली।मेरे ही साथ जिया था आपने अपना बचपन। कँबल के अंदर सर्द रातों में कड़क सी आपकी हथेली माथे को छूती और मैं और ज़ोर से आँखें मीच लेती। फिर धीरे से मिची हुई आँखों के नीचे से देखती आपका स्नेहसिक्त चेहरा...और आपकी आँखें हँस देती।
मुझे याद है हर बात। मम्मी कहती थी नाज़ों में पालोगे तो आदत बिगड़ जायेगी...और आप कहते मेरी बिजु तो राजकुमारी ही है।
डॉक्टर बनेगी ना...आप पूछते और मैं तुनककर कहती और नहीं तो क्या। बन तो गई डॉक्टर पापा ।
आज फोन पर कामवाली ने ही कहा था पापा अस्पताल गये हैं। पूछने की जरूरत नहीं थी, जानती थी आपको जाना था। अच्छा नहीं लगा।
पता नहीं क्यूँ आपकी तरह क्यूँ नहीं हूँ। आप हमेशा तो हर जोखिम से बचा लेते थे। आपका हाथ पकड़ कर कितना,कितना तो सुरक्षित महसूस होता था। तब जब छोटी थी...और फिर तब भी जब बड़ी हुई और ट्रेन में लोग चेहरे पर धुँआ छोड़ देते।
... आप को खतरे में देख कर बौखला जाती हूँ। आप पूछते हैं सब ठीक हो जायेगा ना...और मैं सोचती हूँ कैसे बिगड़ा सबकुछ। आप तो कभी बेबस नहीं होते थे पापा....और जब आप पूछते हैं...बेटा इससे बेहतर कोई इलाज नहीं इसका..तो कितना बेबस महसूस करती हूँ। मैं कोशिश करके आपकी आवाज़ की थकान को आपका बुढ़ापा समझती हूँ...फिर साँस की लड़खड़ाहट सुनकर ...उसे बच्चे को आवाज़ देकर अपनी आवाज़ से ढँक देती हूँ।
मैं सुनना चाहती हूँ आप ठीक हैं, खुश हैं। आप कह भी देते हैं। पर पता नहीं क्यों सुनकर रोने का मन सा होता है।
पता नहीं कब आपने मुझे सही गलत समझाना छोड़ दिया। मम्मी से भी उलझते समय आप ठोकते नहीं अब। आपके लिए मैं बड़ी नहीं होना चाहती,पापा । आपकी डाँटती आवाज़ मुझे बहुत अच्छी लगती है।
क्रिसमस साथ मनाने की जिद थी। सब काम यहाँ वहाँ सरका कर जब घर पहुँचे और उस लंबी सी सीढ़ी पर चड़ कर तारे टाँक रही थी ...तब हाँफते हुए ही आप सीढ़ी पकड़ने चले आये थे। एक बार फिर महसूस किया था आपका मज़बूत सहारा। पूरी कमज़ोरी में भी आपके हाथों ने मज़बूती से मुझे थामा था।
...लंबा आप पढ़ते नहीं.... पापा आपके पास आना चाहती हूँ...
जन्मदिन मुबारक
आपकी प्यारी बेटी।





