
बक्से को खोलते ही एक अजीब सी गंध कमरे में फैली थी। बहुत दिनों से बंद हवा के अलावा कुछ शब्द भी महक रहे थे। बक्से में छोटे छोटे पुलिंदों में बँधे कागज़ थे। नीले अँतर्देशीय ,पीले पोस्टकार्ड और सफेद, गुलाबी पन्नों में साँस लेती करवट बदलती लँबी चिट्ठियाँ। हवा लगते ही सभी शब्द आँख मल कर उठ ठहलने लगे थे। वह अचरज से देख रही थी ...यह अभी भी जिंदा हैं।
सबकी अलग लिखावट थी। अपनी सी चाल थी। वह इन्हे पहचानती थी....अब भी वैसे ही जैसे बहुत पहले जिन्होने इन्हे लिखा था उन्हे। बाँई ओर मुड़ी लिखाई, सदे हुए सुंदर छोटे अक्षर,कहीं बड़े अक्षर छोटी सी लिखाई में अस्पष्ट होते हुए। अपना एक मिज़ाज...अपनी एक अदा । उसे सब याद था। लिखी हुई बात को मिटाने के लिए चलाई स्याही के नीचे खड़े शब्दों को पढ़ना...सुनना और समझना भी....।
जाने कैसे तो दिन थे जब साँस लेते शब्द लिफाफों में बंद कर लाल बक्सों में ड़ाल आते थे। और खाकी कपड़ो वाला साइकिल पर सवार पोस्टमैन कँधों पर लटकाकर कितने सजीव बोलते शब्द हाथ में थमा जाता।
पता नहीं शब्दों की उमर क्या होती है। कहने वाला भूल भी जाये तब भी किसी और के रूह के आसमाँ में साँस लेते रहते है। इनकी आवाज़ मद्धम होती है...कभी गूँजने सी लगती है....। पर यह बोलते रहते हैं।
बक्से से जैसे जिस्म पहन कर उठे थे शब्द। उसे छू रहे थे, छेड़ रहे थे। कैसे तो उनके छूने पर गुदगुदी सी हुई थी। सिहरन भी उठी थी .... । कोलाहल सा था...पर हर शब्द साफ सुनाई दे रहा था। इन शब्दों के स्वर में बहुत पहले का सुनना भी शामिल था।
रिश्तों की आयु होती है। बदलाव नियती। लोग बदलते रहते हैं। पास आते हैं,साथ होते हैं, दूर जाते हैं...खो जाते हैं....। उमर बीत जाती है। लिखी स्याही का रंग भी उड़ जाता है। पन्ने फीके पड़ जाते हैं...। पर शब्द खामोश होकर भी नष्ट नहीं होते। थोड़ी सी हवा लगने पर फिर बोलने लगते हैं।
....................
शायद इसीलिए उसने चिट्ठियाँ लिखना छोड़ दिया है।







