Wednesday, January 28, 2009

चिट्ठियाँ


बक्से को खोलते ही एक अजीब सी गंध कमरे में फैली थी। बहुत दिनों से बंद हवा के अलावा कुछ शब्द भी महक रहे थे। बक्से में छोटे छोटे पुलिंदों में बँधे कागज़ थे। नीले अँतर्देशीय ,पीले पोस्टकार्ड और सफेद, गुलाबी पन्नों में साँस लेती करवट बदलती लँबी चिट्ठियाँ। हवा लगते ही सभी शब्द आँख मल कर उठ ठहलने लगे थे। वह अचरज से देख रही थी ...यह अभी भी जिंदा हैं।

सबकी अलग लिखावट थी। अपनी सी चाल थी। वह इन्हे पहचानती थी....अब भी वैसे ही जैसे बहुत पहले जिन्होने इन्हे लिखा था उन्हे। बाँई ओर मुड़ी लिखाई, सदे हुए सुंदर छोटे अक्षर,कहीं बड़े अक्षर छोटी सी लिखाई में अस्पष्ट होते हुए। अपना एक मिज़ाज...अपनी एक अदा । उसे सब याद था। लिखी हुई बात को मिटाने के लिए चलाई स्याही के नीचे खड़े शब्दों को पढ़ना...सुनना और समझना भी....।

जाने कैसे तो दिन थे जब साँस लेते शब्द लिफाफों में बंद कर लाल बक्सों में ड़ाल आते थे। और खाकी कपड़ो वाला साइकिल पर सवार पोस्टमैन कँधों पर लटकाकर कितने सजीव बोलते शब्द हाथ में थमा जाता।

पता नहीं शब्दों की उमर क्या होती है। कहने वाला भूल भी जाये तब भी किसी और के रूह के आसमाँ में साँस लेते रहते है। इनकी आवाज़ मद्धम होती है...कभी गूँजने सी लगती है....। पर यह बोलते रहते हैं।

बक्से से जैसे जिस्म पहन कर उठे थे शब्द। उसे छू रहे थे, छेड़ रहे थे। कैसे तो उनके छूने पर गुदगुदी सी हुई थी। सिहरन भी उठी थी .... । कोलाहल सा था...पर हर शब्द साफ सुनाई दे रहा था। इन शब्दों के स्वर में बहुत पहले का सुनना भी शामिल था।

रिश्तों की आयु होती है। बदलाव नियती। लोग बदलते रहते हैं। पास आते हैं,साथ होते हैं, दूर जाते हैं...खो जाते हैं....। उमर बीत जाती है। लिखी स्याही का रंग भी उड़ जाता है। पन्ने फीके पड़ जाते हैं...। पर शब्द खामोश होकर भी नष्ट नहीं होते। थोड़ी सी हवा लगने पर फिर बोलने लगते हैं।

....................
शायद इसीलिए उसने चिट्ठियाँ लिखना छोड़ दिया है।

Thursday, January 22, 2009

हमसफर


तुम्हारे साथ सफर तय करना मुझे अच्छा लगता है। पर मैं तुम्हारा साया नहीं हूँ।

मैं तुम्हारे आगे या पीछे नहीं चलना चाहती। मैं चाहती हूँ हम अपनी राह चल सके। तुम्हारे लिए मैं जड़े बन नमी खोज लाऊँ, पत्तियों सा जादू रचाऊँ...तुम खिल सको....बिल्कुल अपने रंगों में.....। मुझे तुम अच्छे लगते हो क्योंकि तुम्हे मेरे रंग पर फख्र है कि यह बिल्कुल मेरा है...।


मुझे तुम अच्छे लगते हो। बहुत अच्छे लगते हो। मेरा ध्यान तुम्हारे रंग, ढंग और अदा पर नहीं है। बल्कि उस अनुभूति पर है जो तुम्हारे मेरे पास होने पर होती है। मुझे आश्रित होना पसंद नहीं। मैं उनमुक्त हूँ। तुम्हारा होना उस रौशनी सा है....जहाँ मैं अपने सहारे खुद खोज सकती हूँ। मुझे तुम्हारी कही हुई सब बातें याद नहीं है। लेकिन तुम्हारी खामोशी में उठे सभी भाव मेरे अंतरंग में दर्ज हैं। अक्सर मैं जानती हूँ तुम्हारी सोच...तुम्हारा दर्द...तुम्हारी अनुरक्ति....। अक्सर मैं इंतज़ार करती हूँ इसकी अभिव्यक्ति की...। पर फिर भी इसके मायने बहुत नहीं है...।


तुम कहते हो मैं समंदर हूँ... । लहरों की सतह से नीचे तल तक...हर जगह अलग। तुम हर बात समझते नहीं। मुझे तुम अच्छे लगते हो क्योंकि तुम्हारा प्यार समझ का मोहताज नहीं।

मुझे तुम आकाश से लगते हो। जिसका बिम्ब आँखों में सजा कर मैं सुंदर बन जाती हूँ। मैं उछल कर तुम से मिलना चाहती हूँ। और तुम मेरी अठखेलियों को आगोश में समेट लेते हो। मुझे तुम अच्छे लगते हो क्योंकि... मेरी गहराइयों से भी तुम्हे एतराज़ नहीं है...।

मैं तुम्हारे व्यक्तित्व पर हावी नहीं होना चाहती। जानती हूँ तुम मुझसे बिल्कुल अलग हो। मुझे तुम अच्छे लगते हो कि तुम अपनी पहचान के पीछे मेरी पहचान छिपाना नहीं चाहते।

अच्छे लगने की कितनी सारी तो वजह है। में सोच सोच कर और लिख सकती हूँ.....।

........................................


और तुम......
....बेवजह....बेशर्त मुझे प्यार करते हो।

Sunday, January 18, 2009

याद


याद का क्या है ... आ जाती है। कभी किसी रंग पर...तो कभी किसी ढंग पर सवार। किसी गाने की बीच की धुन की तरह...तो कभी उन गाते हुए शब्दों के जज़्बे की तरह। कभी मिल जाती है कोई आवाज़ बिल्कुल किसी और से ....और उसके जायके में आता है याद का स्वाद। हँसते समय नाक के ऊपर पड़ी झुर्रियों में सरक, तो कभी मस्ती भरी हँसी में सिमट। कभी छेड़ जाती है...जैसे खुशबू और फिर रुक कर जब लेते हैं गहरी सी साँस...समा जाती है पूरे जहन में याद। याद आहटों की तरह सुनाई देती है....जिस्म पर रोंगटों की तरह खड़ी होती है। नींद में चुपके से कोई सपना पहन कर आती है तो कभी इंतज़ार बन जाती है। याद चिंता की तरह सताती है....माँ की आवाज़ सा सुनाई देती है...बाबूजी के हाथों की तरह उठा कर कँधों से दुनिया दिखाती है। किसी सहेली की तरह साथ चलती है....साथ में हँसती है...और साथ में रो देती है...

बारिश के बाद की भीनी खुशबू सा महकती है....सुबह उठी चिड़ियों सा चहकती है....

मेरी छोटी उँगली पकड़ याद बीते रस्ते फिर दिखाती है.....

याद का चश्मा पहन सब चित्र उभर आते हैं....लगता है छू लूँ

........

याद छू कर कहीं छिप जाती है.....

Sunday, January 11, 2009

सवाल...?


सवाल हर तरह के हो सकते हैं। ऐसे जिनके जवाब सबको पता है। जैसे,"सूरज कहाँ से उगता है ?!" ऐसे भी जिनके जवाब खोजे जा सकते हैं, जैसे पृथ्वी की गोलाई...सबसे अच्छे टेनिस प्लेयर का नाम....सबसे बड़े तरबूज की जगह...रूस की सबसे लज़ीज मिठाई। सवालों के जवाब ढूँढना शोधकार्य हो सकता है...रिसर्च टॉपिक....और लोग जवाब की कोशिश में पी एच ड़ी हो जाते हैं...डॉक्टर कहलाने लगते हैं। कुछ सवाल का जवाब हम जानते हैं पर कहते नहीं... ,"मम्मी नाना नानी अकेले क्यूँ रहते हैं?!"..."यह ऐ फिल्म क्या होती है?!"....

सवाल पत्रकार पूछते हैं...छात्र पूछते हैं...राजनितिज्ञ पूछते हैं...प्रजा पूछती है....

सवाल पूछना आसान होता है। इसके लिए विषय की जानकारी की जरूरत नहीं होती। शोध अनिवार्य नहीं होता।

बस जरूरत होती है थोड़ी जिज्ञासा की....और सवाल पूछ लेने की....

बहुत से जवाब दे देकर जिंदगी में उम्र की दहलीज पार करता है इंसान....पर फिर भी रह जाते हैं कुछ सवाल... ऐसे सवाल जिनके जवाबों तक वह कभी नहीं पहुँच सका....
...और जब कोई यूँ ही चलते हुए इन्हे फिर उछाल देता है ... जवाब की तलब नहीं किंतु सवाल के प्रसंग में उठते हैं मन में और कई सवाल....
...............

सच तो यही है....इन अनुत्तरित सवालों ने ही रखी है भगवान और आत्मा पर आस्था की नींव....

Sunday, January 4, 2009

विगत


समय रुकता नहीं है, चलता चला जाता है। पेड़ के तने में जैसे एक और गोला...एक वर्ष का जीवनचक्र बीते हुए जीवनकाल में अंकित होकर लुप्त हो जाता है। लोग ,संदर्भ, संजोग मिलते हैं और बिछड़ जाते हैं। सब कुछ हमेशा नाटकीय नहीं होता। कभी कभार हाँ...। जैसे किसी हादसे में किसी का गुजर जाना....या नई नौकरी की तलाश में विस्थापित हो जाना। इन लोगों का जाना याद रहता है। शायद इसी याद के खातिर लोग समारोह का आयोजन करते हैं। थोड़ा समारोह और थोड़ा संदर्भ याद रह जाता है।

पर अक्सर समय के गुजरने का पता नहीं चलता। जैसे चलती बस में बैठे बैठे फ्रेम बदलते रहते हैं। देखते देखते सूरज डूब जाता है। नीला आसमान....गुलाबी सुनहरा...फिर काला...। कुछ फ्रेम जो पसंद आते हैं आँखों से निहार कर रूह से ठठोल कर देखते हैं। थोड़ा इन्हे मन से सोचते हैं। फिर याद के पन्नों में हल्के से सँभाल लेते हैं। यूँ लगता है यह गुजर नहीं सकते। इन्हे संजो लेने का अजीब सा अहंकार मन में होता है।
............

अचानक से पता चलता है इनके चले जाने का...जब इन्हे छूने का मन होता है और यह हाथ नहीं आते....।