
परिवेश,सोच,विकास,आज़ादी....सीमा हर चीज़ की होती है। सीमायें अचानक से आकर खड़ी नहीं हो जाती। पहले होता है शोध,संघर्ष,विमर्श और फिर धीरे से बनती हैं सीमायें। युद्ध लड़े जाते हैं, सभ्यता की दिशा का अनुमान लगाया जाता है,विचार की पराकाष्ठा तय की जाती है, सँभावनाओं का आंकलन किया जाता है। और तब पहले कागज़ में, फिर नियमावली में और फिर मनोवृत्ति में सीमाओं की मर्यादा तय की जाती है। प्रशासन और प्रबंध के लिए अहम हैं यह, अधिपति की स्थापना और अनुबंध के लिए अत्यावश्यक। सीमाओं के अंतर्गत एक आश्वासन रहता है। एक सुरक्षित रहने का अहसास..जैसे घर की दीवारों के बीच....। एक अनुशासन ...ट्रैफिक सिग्नल और फास्ट और स्लो लेन की तरह। धरती का मानचित्र लेकर , फिर आड़ी तिरछी रेखाओं से उसे बाँटकर हम देश के नक्शे बनाते हैं....अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अंतर्गत उसे अपना एक दर्जा देते हैं.....सोच समझकर सँविधान बनाते हैं। हमें अनुभव है....सभ्यताओं, धर्म, जाति, रूप,रंग....हम इन सब के आधार पर पहले भी यह कर चुके हैं। सीमाओं के भीतर बहुत कम जोखिम है। हर बात के लिए नियम है, और पूर्वानुमान सँभव। अनिश्चितता के हम आदी नहीं। गणितज्ञ की तरह हम पूरे इलाके का सही क्षेत्रफल जानना चाहते हैं। कैलकुलेट टिल द स्मालेस्ट स्कायेर पॉसिबल।
पता नहीं कितना सहज है गणना। कोई भी सीमा अप्रवेश्य नहीं। घरों की दीवारों में खिड़कियों का होना, हवा का बेहिचक सीमाओं का उल्लँघन करना, बादलों का एक देश से दूसरे में चले जाना........कहीं की बरसात का कहीं की बाढ़ बनना।
ऐसा नहीं कि हम इन सीमाओं के पार नहीं जाना चाहते। उसके लिए भी प्रावधान है....विसा, इमिग्रेशन, धर्म परिवर्तन,.....। ट्रैफिक में तक स्लो से फास्ट और फास्ट से स्लो में जाने का प्रावधान है। नियम हैं...नियमावली है....। नियमावली के नीचे फिर एक सीमा है।
सीमाओं का मतलब सब के लिए अलग है। यू एन डिप्लोमैट की और पंचायत कर्मी की अलग सीमायें हैं, नौजवान लड़की की तालीबान और अमेरिका में , सड़क पर अधिकतम स्पीड़ की यू ए ई और भारत मेंअलग सीमायें हैं।
सीमाओ का उल्लँघन भी स्वाभाविक है.....
फ्लू के वायरस को तक तमीज़ नहीं कि एक जानवर, जाति, प्रजाति तक सीमित रहे।
सीमाओं की सीमायें सीमित नहीं.....विचार ,उद्भेद और सँभावनायें अपार हैं.....
इनका अतिक्रमण बस होने को है....
शायद जरूरी भी.....
शायद अगले स्तर तक पहुँचने के लिए सीमा एक सोपान मात्र.......




7 comments:
सहमत हूँ हर चीज की सीमा होती है
सीमाएँ मत पार कीजिए।
इनका अतिक्रमण बस होने को है....
बधाई।
कई बार यूं ही देखा है
ये जो मन की सीमा रेखा है
मन तोड़ने लगता है.........
www.nayikalam.blogspot.com
सीमाएँ बनती हैं
टूटने के लिए
सीमाएँ फिर बनती हैं
फिर टूटने के लिए।
सीमाएँ बनती रहेंगीं
वे फिर फिर टूटेंगी
हम फिर फिर बनाएँगे।
Yun hi likhte rahiye.Shubkamnayen.
bahut hi jaayaj likha hai aapne... ham aapse hazaar feesdi sahamat hain....
क्या यह सचमुच आपकी भाषा है ? अगर हाँ तो आगे क्या करना है फिर बताउंगा ।
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