वह मिट्टी थी। उस पर एक जंगल उगा था। जंगल जिसकी जड़ें बहुत भीतर उतर कर उसकी रूह को टटोलती थी। कहीं गहरे से नमी खोज लाती थी। ऐसी नमी जिससे जंगल पनपता था। फूल खिलते थे...फल लगते थे। हरियाली,वसंत,पँछी,पखेरू...। वह देना जानती थी। हल्की बारिश में सौंधी खुशबू सा महकना जानती थी। बीज को अंकुरित कर वृक्ष बनाना जानती थी। उसके पास बीज में सोये हुए वृक्ष को जगाने का जादुई मंत्र था। वह मिट्टी थी। जंगल की पकड़ में सिमटी हुई। जंगल के सूखे गले पत्ते... टूटी डालियाँ...मुरझाये फूल ..वह यह सब सहेजना जानती थी।जंगल के लिए वह जीवन थी.......जादू थी....ज़मीं थी.......
मिट्टी के लिए जंगल एक वजह थी....जिसके लिए वह थमी थी...... खड़ी थी...।




9 comments:
अद्भुत !
Marvellous...... !!
bahut hi sahi ......our anupam rachanaa....lajabaab
आपके शब्दो में जादू होता है। अद्भुत।
भावनाओं को लफजों में पिरोना कोई आपसे सीखे।श्
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
सुन्दर विचार।
बढ़िया
डॉ बेजी, क्या गजब का वर्णन है!!
सस्नेह -- शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
वाह, क्या सही कहा है!
घुघूती बासूती
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