Monday, April 13, 2009

विलीन


तुम उस खुशबू के समंदर सी हो जो लहर लहर सी उठ कर मुझे किनारे से उठा ले जाती है। मेरी साँसों मे घुल यह महक मेरे पोर पोर तक पहुँचती है। तुम्हारी पहचान है इसमें। मुझ तक यह तुम्हारा नाम बन कर आती है। मैने इसे जिस्म पहनते देखा है। और तुम्हारे जिस्म को खुशबू में बदलते देखा है। छूता हूँ तुम्हे तो तपिश में मोम सा पिघलकर जुड़ता ही चला जाता हूँ। तुम्हारे साँचे में ढ़लता ही चला जाता हूँ। मुझे अपने बुलबुलों में बसा कर लहर सी उठती गिरती हो। असमंजस,अनुराग और फिर समर्पण....धूप सा तैरता है तुम्हारी आँखों में...। मैं इन बुलबुलों के भीतर उठता,उभरता हूँ....गिरता उतरता हूँ। तुम्हारी साँसों को चखता हूँ। तुम्हारा स्वाद..। उस अमृत की तरह जो मुझे जीवित करती है। तुम जीवन की तरह दौड़ती हो मेरी नब्ज़ में। तुम्हारा प्रवाह, तुम्हारी गति, उथल पुथल, बेचैन....अपनी धड़कनों पर तुम्हारे लय को महसूस करता हूँ। थक कर ही शायद रुकती हो तुम...मेरे आलिंगन की सीमाओं में ठहरती हो तुम...। छलकती सी तुम...सँभालता हूँ तुम्हे अपने आगोश में....और तुम सिमटती सी चली आती हो। मैं साँस रोक कर सुनता हूँ तुम्हे....तुम्हारी खुशबू में महकता हूँ...। हाँ बस तब ही बदल जाती हो...सिर्फ खुशबू बन जाती हो...मेरी पकड़ से आज़ाद फिर छलक जाती हो। निर्दोष सी कोई हँसी की धुन की तरह...किसी चंचल भोली ललक की तरह...। अपनी गहराई की थाह समझ पाने की चाह...चाँदनी को ओढ़ लेने की आस....सैलाब सा उठती हो तुम....फिर खुशबू में बिखर जाती हो....। मुझे साथ लेकर ....उठ हवा में चल....मेरे साथ...

...बूँद सा मैं...तेरे सतरंगी खुशबू में नम...

तेरे साथ ही फिर ..........सावन सा बरस जाता हूँ....।

8 comments:

neeshoo said...

बेजी आप की कल्पना भी क्या खूब होती जितनी बार भी पढ़ो एक नया ही रूप मिलता है । बहुत ही अच्छा लगता है । बेहतरीन लिखा आपने । बधाई

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

साथ चल, जब तक साथ है तब तक अस्तित्व है।

"अर्श" said...

तुम्हारी साँसों को चखता हूँ। तुम्हारा स्वाद..। उस अमृत की तरह जो मुझे जीवित करती है। तुम जीवन की तरह दौड़ती हो मेरी नब्ज़ में।

gazab ka bhav bodh hai saalinta liye kamaal ka likha hai aapne ....


arsh

mehek said...

dilkash aaj leheron mein khusbu samayi hai,aakhari linw tak ek saans mein oadh liya,nitant sunder.

Shikha Deepak said...

सुंदर रचना। बार बार पढ़ रही हूँ। एक एक लाइन बस.................क्या कहूं........शब्द नहीं मिल रहे।

अनिल कुमार वर्मा said...

बेजी, लेखन शैली की क्या तारीफ करूं...बस यहीं कहूंगा कि शुरू से अंत तक बांधे रखा...शब्दों की रवानी ऐसी कि विलीन ही हो गया...बधाई...

महामंत्री - तस्लीम said...

जज्बात के इस समंदर में डूब कर खुद का होश ही न रहा।

----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

tanu sharma.joshi said...

शायद अद्भुत....!!!
क्या लिखूं...कुछ समझ नहीं आ रहा...हमेशा ही होता है ऐसा...जब भी कुछ निशब्द सा कर देने वाला मेरे सामने आ जाता है..पर बिना बताए कैसे जाऊं कि ये कितना गहरे तक उतर गया है...