
रात थी। और सन्नाटा बिल्किल चुप्प। जैसे बहुत दिनों तक जागने के बाद अनायास ही रात की आँख लगी हो। पत्ते अपनी टहनियों से लटके खड़े थे। बिल्ली आँख मूँदे सो रही थी। उजालों का कहीं नामोनिशाँ नहीं था। सड़क सूनी थी। कोई बत्ती कहीं दूर तक नहीं टिमटिमा रही थी। वह अमावास की रात थी। चाँद भी सायों को ओढ़ कर सो रहा था। हवा स्तब्ध सी खड़ी थी। कभी दबे पाँव अपना भार दूसरे पैर पर टिका देती।
वह सो रहा था। उसकी साँसों की आवाज़ की लय में और भी किसी की साँसे शामिल थी। सुकून से ली गई साँसे जो आत्मा को पँखा झल रही हों। रात सो रही थी। और नींद सब पर पहरा लगाये थी।
इस रात में करवटें नहीं थी....कोई आधे अधूरे...धुँधले हल्के ख्वाब नहीं थे....बस नींद...।
कल एक नया सवेरा था जिसमें थकान नहीं थी।
(पेंटिंग-Evelyn De Morgan-sleep and night)




3 comments:
बहुत बढिया लिखा !!
बेजी यह गद्य है या पद्य है? लगता है प्रकृति का संगीत है।
man ko har liya
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