मार्च एप्रिल का महीना। घनी छाँव सी छनी धूप घर के पिछवाड़े पर पड़ती थी। धूप ,छाँव पहन थोड़ी सी ठंडी होकर गुनगुनी सी बदन को छूती थी। नींबू के पौधों से हल्की सी खट्टास ताज़गी की तरह उठती। मुझे यहाँ बैठना अच्छा लगता था। गर्म हवायें आम के पेड़ की साँसों की तरह चेहरे पर महसूस होती । यहाँ मुझे अकेला नहीं महसूस होता। पत्तों की सरसराहट से लेकर कोयल की कूक सब जाना पहचाना था। कभी अचानक से पकी इमली टप्प सी गिर जाती। बहुत सी आवाज़ों के बीच सुकून सी नि:शब्दता। 
सिमेन्ट के चबूतरे पर बैठ छोटे पछीटों को हथेली से उछालती और कल्पना उड़ान भरने लगती। डॉक्टर, इंजीनियर, एस्ट्रानॉट...गुड़िया की शादी के सपने,बड़ी सी गाड़ी के सपने....अच्छे चमकीले कपड़े....ढ़ेर सारे चाभी से चलने वाले खिलौने....। चबूतरे पर जमी लाल मिट्टी पर पाँव चलाती और समंदर के किनारे की रेती को छू आती।
पास ही बेल थी..एक घनी बेल जिसपर मोगरे गुच्छों मे खिले होते....उनकी महक हवा में घुली होती। थोड़ा पानी बाल्टी में लेकर, मग के मुँह पर हाथ रख बेल पर पानी छिड़क देती...। मोगरे नहा कर...उछल खूद बेल पर लहराने लगते। और मैं सोचती एक बाड़ी...जिस पर मोगरे ही मोगरे हों..., नीचे साफ सुथरी पक्की क्यारी और बाड़ी पर लगा एक सफेद गेट।
घर के पिछवाड़े की बाड़ी छोटी टहनियों को गूँथ कर पापा ने रामू की मदद से बनाई थी। छोटी मोटी यहाँ वहाँ मुड़ी टहनियाँ कैसे तो पंक्ति में बँध गई थी। धीरे धीरे सँभल कर मैं उनपर हाथ चलाती। चिकनी, फिर खुरदुरी...बीच में काँटे। एक कोने से हिलाओ तो मिट्टी फिसल कर सरक सरक नीचे गिरती।
आँख बंद कर फेफड़ों को फैला कर भरी पूरी एक साँस लेती....और मार्च एप्रिल का जायका मेरे जहन में समा जाता...। पूरे साउँड और विश्अल एफेक्ट्स के साथ।
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महीना मार्च ही है। गर्म हवायें भी हैं। बड़ी सी गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील थामे....प्यारी सी गुड़िया को रियर सीट में बैठा कर...फूलों की क्यारियों के बीच से गुजरते हुए.....कैसे तो मन फिर उसी दोपहरी के लिए तरसा है.......।




7 comments:
बेजी!
आप ने मेरा बचपन याद दिला दिया। मैं ने भी अपनी छोटी बहनों और एक अविस्मरणीय मित्र के साथ मार्च के महीने में पचेटे उछाले और खेले हैं।
बहुत सुन्दर अभिव्यक्त किया है... पूरी पोस्ट समाहित हो गई-पूरे साउँड और विशाल एफेक्ट्स के साथ...
क्या कहूँ,चित्र और विवरण ने ऐसे बाँधा कि बिलकुल खो सी गयी उसमे... बहुत देर तक उससे निकलने को मन ही नहीं कर रहा था........लाजवाब...
अपने बचपन की याद का सुंदर प्रस्तुतीकरण ... पढकर बहुत अच्छा लगा।
लगातार लिखते रहने के लिए शुभकामनाएं
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
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मार्च का उदास मौसम ,खिलने को आतुर आम के बौर औरआपकी पोस्ट ,मन बचपन को याद कर कसक उठा
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Jai...Ho....
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