Thursday, February 12, 2009

इंतज़ार


आँखें कैसी तो थक जाती हैं राह तकते तकते। और फिर दरवाज़े पर खामोश आहटें सुनाई देने लगती हैं। चहल कदमी और किसी के आने का अंदेशा। बाहर साये रंग पहनने लगते हैं.....फिर जाने कैसे तो लगता है यह वही है जिसका इंतज़ार था। एक आशावाद, कि धुंधली लकीरे साफ होकर दरवाज़ा खटखटा देंगी। पर दस्तक कोई नहीं देता। बजता हुआ संगीत कान से टकराकर लौट जाता और पढ़ते हुए किताब के अक्षर काले श्वेत बेमतसब साँचों में ढल जाते। वक्त चलते चलते थक कर विश्राम करने लगता और इंतज़ार लंबा खिंचने लगता।

इंतज़ार की अजीब सी नि:शब्दता है। जैसे किसी खाली कमरे का सन्नाटा हो। जहाँ पहले तो खुद के ही आवाज़ की प्रतिध्वनि सुनकर वह सब सुनाई देने लगता है जो सुनना चाहते हैं। और फिर .... इनकी गूँज खुरेद खुरेद कर बनाती हैं संशय और डर की दरारें। विराम में विश्राम नहीं...और थकान में नींद। साया और छाया के खेल के बीच सपना एक व्याकुल , अशांत बिंब बन जाता।

वही आवाज़ फिर एक बार, कोई मुलाकात, कोई वादा, कोई निश्चित सौदा। होता है इंतज़ार किसी खिड़की से...किसी दरवाज़े पर दस्तक सा। फोन की घंटी, किसी सुपरिचित चाल की आहट सा, कभी खाँसती सी कोई गला साफ करती आवाज़ सा।

इंतज़ार के चेहरे का रंग समय के साथ उतरते किसी बेहद श्रंगार किये चेहरे से उतरते रंग की तरह बदसूरत सा है। पोता हुआ रंग और काजल के फैलने पर एक विकृत स्वरूप।
उम्मीद की कोख में जन्म लेता है इंतज़ार... । साथी के आने की उम्मीद, किसी खत में अपेक्षित शब्दों को ढूँढ़ने की उत्सुकता , बेसब्री में एतबार किया प्यार....और ना जाने होता है किस किस का इंतज़ार।

मरती हुई आँखों में होता है जीवन का ....तो कभी अपनी साँसें छोड़ देने का इंतज़ार। शुष्क हाथों को स्पर्श का इंतज़ार। लंबी लाईन में किसी अपने के लिए किसी सौगात को ढूँढ़ लेने का इंतज़ार। किसी अजनबी में कभी अपनेपन का इंतज़ार। थोड़ी समझदारी का, थोड़ी सहानुभूति का इंतज़ार। कभी क्षमा का तो कभी मोक्ष का इंतज़ार।

किसी सेतु की तरह है इंतज़ार...। कभी पार भी पहुँचता है ....और फिर उम्मीद की वजह बनता है इंतज़ार।

पर अक्सर धुँध में खोये टूटे पुल सा होता है...जिसके छोर पर पहुँच दौड़ कर लौटता है....या फिर डूब जाता है इंतज़ार।

10 comments:

pawanchandan said...

इंतजार इंतजार और इंतजार
बड़ा खराब लगता है इंतजार
जार जार रूला देता है
रूह तक हिला देता है
सच कहा आपने
एक बात हम कहें
आप जरा अपने ब्‍लॉग के नीचे देखें
चौखट पर एक व्‍यंग्‍य रचना पढ़ें
और इंतजार के जाल से निकल कर व्‍यंग्‍य का आनन्‍द लें। हां हां, एक प्रतिक्रिया भी दें।

tanu sharmaa... said...

सब कुछ वोही...जो इस वक्त मेरे अंदर...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अन्त नही है इन्तजार का,
जीवन भर ही चलता है।
मजा बहुत देता रहता है,
कभी-कभी यह खलता है।।

विनय said...

बिल्कुल सही लिखा है, शब्द अच्चे दिये हैं

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गुलाबी कोंपलें

मीनाक्षी said...

यकीन है , उम्मीद है तो इंतज़ार भी है... देखो कब मज़िल मिलती है... मेरे इंतज़ार को इतने सुन्दर रूप में बयान करने का बहुत बहुत शुक्रिया...

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

आँखें कैसी तो थक जाती हैं राह तकते तकते। और फिर दरवाज़े पर खामोश आहटें सुनाई देने लगती हैं
सही लिखा है.
badhiy abhivyakti. dhanayawad.

रंजना said...

वाह !! इन्तजार के उलझे सभी धागों को सुलझाकर सामने रख दिया आपने....सुंदर आलेख..........

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर.....

राकेश खंडेलवाल said...

वही आवाज़ फिर एक बार, कोई मुलाकात, कोई वादा, कोई निश्चित सौदा। होता है इंतज़ार किसी खिड़की से...किसी दरवाज़े पर दस्तक सा। फोन की घंटी, किसी सुपरिचित चाल की आहट सा, कभी खाँसती सी कोई गला साफ करती आवाज़ सा।

बहुत सुन्दर

poemsnpuja said...

आपका लिखा जैसे मेरे अन्दर की ही गूँज है. बहुत अपना सा लगा हर एक शब्द. शुक्रिया.