
कभी कैसे तो सबकुछ बहुत खूबसूरत हो जाता है। जैसे कोहरे के बीच से सवेरा बादलों को धकेलता हुआ निकलता है। हल्की बूंदाबांदी के बीच से किरण निकल रंगों सी बिखर जाती है। उदर में उठी पहली हलचल, किसी अनजान घबराये बच्चे का पूरे विश्वास से उँगली थाम लेना , बाबूजी को याद करते ही फोन पर उनकी आवाज़ सुनना। लंबी सी जिंदगी में पता नहीं कितने होते हैं ऐसे बिन पाखंड के क्षण। रेत की धूल में गुम किसी हीरे की तरह कहीं धूल में ही सने हुए।
कब बुलाने पर आते हैं...कहाँ इनके लिए कोई आयोजन होता है...कभी किसी के उदास चेहरे पर सिसकियों से उभर आते हैं....और किसी के कँधों पर ठिठक कर रुक जाते हैं...
कोई युक्ति नहीं...कोई षडयंत्र नहीं...खूबसूरती की करवट की तरह...कोई बेहद आम पल खास हो जाता है। ढूँढने वाले ढूँढ़ते है इनके पीछे काम करते हुए मकसद.... इरादे...आँकते हैं इनकी ताकत...पूछते हैं इनकी जरूरत....
परत-दर-परत कैसे तो खुले इनका राज़..
...किसी जादू की तरह...खुदा की तरह...महसूस होते है यह क्षण...
ऐसा लगता है जैसे सभी तरंगें एक लय में बँध गई हो...और होता है अनुनाद....एक संगीत ऐसा...जो जीवन से बेहतर दिखाई देता है....
बहुत कम...पर होते हैं जीवन में ऐसे क्षण....किसी मिलावट के बिना...हर पाखंड़ से अछूता...
ऐसे आँसू की तरह...जिसका दर्द किसी और सीने में उठता है....
....जब जीवन अपलक ठिठक रुक जाता है....और इंसान सदा के लिए ऋणी हो जाता है....




5 comments:
खूबसूरत पलों को बड़ी खूबसूरती से पिरोया है .....
ज़िन्दगी का ऐज़ाज समेट लिया है
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गुलाबी कोंपलें
बहुत कम...पर होते हैं जीवन में ऐसे क्षण....किसी मिलावट के बिना...हर पाखंड़ से अछूता...
ऐसे आँसू की तरह...जिसका दर्द किसी और सीने में उठता है....
और बाकी के पाखंड से भरे क्षणों को जीने की ताकत यही कुछ क्षण दे जाते हैं।
जब जीवन अपलक ठिठक रुक जाता है, और इंसान सदा के लिए रिणी हो जाता है ,,,,
क्या इन सादा-सी लगने वाली पंक्तियों में कोई बनावट ढूँढ सकता है ...?
विचारों की शुद्धता और मन की पाकीज़गी से पूर्ण
आपका आलेख मन को द्रवित कर गया ....
चाहते हुए भी आगे कुछ नही कह पा रहा हूँ ........
ढेरों दुआएं . . . . . .
---मुफलिस---
उस एक क्षण को अलग अलग माहौल में बड़ी खूबसूरती से ढूँढा है आपने.
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