
तुम्हारे साथ सफर तय करना मुझे अच्छा लगता है। पर मैं तुम्हारा साया नहीं हूँ।
मैं तुम्हारे आगे या पीछे नहीं चलना चाहती। मैं चाहती हूँ हम अपनी राह चल सके। तुम्हारे लिए मैं जड़े बन नमी खोज लाऊँ, पत्तियों सा जादू रचाऊँ...तुम खिल सको....बिल्कुल अपने रंगों में.....। मुझे तुम अच्छे लगते हो क्योंकि तुम्हे मेरे रंग पर फख्र है कि यह बिल्कुल मेरा है...।
मुझे तुम अच्छे लगते हो। बहुत अच्छे लगते हो। मेरा ध्यान तुम्हारे रंग, ढंग और अदा पर नहीं है। बल्कि उस अनुभूति पर है जो तुम्हारे मेरे पास होने पर होती है। मुझे आश्रित होना पसंद नहीं। मैं उनमुक्त हूँ। तुम्हारा होना उस रौशनी सा है....जहाँ मैं अपने सहारे खुद खोज सकती हूँ। मुझे तुम्हारी कही हुई सब बातें याद नहीं है। लेकिन तुम्हारी खामोशी में उठे सभी भाव मेरे अंतरंग में दर्ज हैं। अक्सर मैं जानती हूँ तुम्हारी सोच...तुम्हारा दर्द...तुम्हारी अनुरक्ति....। अक्सर मैं इंतज़ार करती हूँ इसकी अभिव्यक्ति की...। पर फिर भी इसके मायने बहुत नहीं है...।
तुम कहते हो मैं समंदर हूँ... । लहरों की सतह से नीचे तल तक...हर जगह अलग। तुम हर बात समझते नहीं। मुझे तुम अच्छे लगते हो क्योंकि तुम्हारा प्यार समझ का मोहताज नहीं।
मुझे तुम आकाश से लगते हो। जिसका बिम्ब आँखों में सजा कर मैं सुंदर बन जाती हूँ। मैं उछल कर तुम से मिलना चाहती हूँ। और तुम मेरी अठखेलियों को आगोश में समेट लेते हो। मुझे तुम अच्छे लगते हो क्योंकि... मेरी गहराइयों से भी तुम्हे एतराज़ नहीं है...।
मैं तुम्हारे व्यक्तित्व पर हावी नहीं होना चाहती। जानती हूँ तुम मुझसे बिल्कुल अलग हो। मुझे तुम अच्छे लगते हो कि तुम अपनी पहचान के पीछे मेरी पहचान छिपाना नहीं चाहते।
अच्छे लगने की कितनी सारी तो वजह है। में सोच सोच कर और लिख सकती हूँ.....।
........................................
और तुम......
....बेवजह....बेशर्त मुझे प्यार करते हो।




8 comments:
अच्छे लगने की बेहिसाब वजहें गिनाई जा सकती हैं पर सबका अंत में मतलब यही होता है कि जब कोई अच्छा लगता ही है तो वजहें अपने आप आ जाती हैं.
बहुत सुंदर लिखा है आपने
काबिले तारीफ ....अपनी अपनी पहचान ...अपने अपने अस्तित्व के लिए जो लिखा .....वो काबिले तारीफ है ...और साथ ही आपस में जुदा हुआ प्यार ... वाह
अनिल कान्त
मेरा अपना जहान
क्या बात है..बहुत प्रवाहमय गद्य. बेहतरीन.
bhawnao ka bahav bahut khubsurat
मैं खुद से अधिक
सहेजती हूँ तुम्हें,
आखिर तुम मेरे ही तो
पुनर्जन्म हो।
कहीं कहीं मुझें ऐसा लगता है कि आपने मेरी भावनाओं के साथ मेरे प्रेम को शब्द दे दिए है, मैं आभारी हूं आपकी जिसने वाक्यों के जरिये अनजाने में ही सही पर मेरी भावनाओं का शब्द संचार दिया, ऐसा नहीं है कि मैं अपनी भावना को व्यक्त करने में असमर्थता व्यक्त कर रहीं हूं पर आपकी संवेदना काबिले-गौर है... सच पूछो तो, हर काव्य देह की पीड़ा है.., विचलित विचार है केवल मन..!
bahut achchha likhti hun aap...!
बहुत खूब ...बेशर्त प्यार ही सच्चा प्यार है !!!!!!!
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