
याद का क्या है ... आ जाती है। कभी किसी रंग पर...तो कभी किसी ढंग पर सवार। किसी गाने की बीच की धुन की तरह...तो कभी उन गाते हुए शब्दों के जज़्बे की तरह। कभी मिल जाती है कोई आवाज़ बिल्कुल किसी और से ....और उसके जायके में आता है याद का स्वाद। हँसते समय नाक के ऊपर पड़ी झुर्रियों में सरक, तो कभी मस्ती भरी हँसी में सिमट। कभी छेड़ जाती है...जैसे खुशबू और फिर रुक कर जब लेते हैं गहरी सी साँस...समा जाती है पूरे जहन में याद। याद आहटों की तरह सुनाई देती है....जिस्म पर रोंगटों की तरह खड़ी होती है। नींद में चुपके से कोई सपना पहन कर आती है तो कभी इंतज़ार बन जाती है। याद चिंता की तरह सताती है....माँ की आवाज़ सा सुनाई देती है...बाबूजी के हाथों की तरह उठा कर कँधों से दुनिया दिखाती है। किसी सहेली की तरह साथ चलती है....साथ में हँसती है...और साथ में रो देती है...
बारिश के बाद की भीनी खुशबू सा महकती है....सुबह उठी चिड़ियों सा चहकती है....
मेरी छोटी उँगली पकड़ याद बीते रस्ते फिर दिखाती है.....
याद का चश्मा पहन सब चित्र उभर आते हैं....लगता है छू लूँ
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याद छू कर कहीं छिप जाती है.....




9 comments:
Hm ! Now tnis one doesn't really need an opinion ...
बहुत सुंदर भाव भरा ख्याल है ...हाँ याद का क्या है .....याद आहटों की तरह सुनाई देती है
"चिराग अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए"
वाकई यादों की जो तस्वीर आपने खींची है उसने कई पुरानी यादों को ताजा कर दिया। पिताजी की डांट भी याद आई और उसके बाद मिलने वाले मां के दुलार की भी। दूर रह रही बहनों की राखी याद आई तो भाई का स्नेह भी। दोस्तों की मस्ती भी मानस पटल पर उभर आई। कम शब्दों में बढ़िया और प्रभावशाली रचना। बधाई।
बहुत अच्छा लिखा है
याद का चश्मा पहन सब चित्र उभर आते हैं....लगता है छू लूं
याद छू कर कहीं छिप जाती है.....
सचमुच याद को बखूबी दर्शाया है आपने अपनी रचना में .....बहुत अच्छी लगी
याद का चश्मा पहन सब चित्र उभर आते हैं....लगता है छू लूँ
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याद छू कर कहीं छिप जाती है.....
बहुत सुंदर।
सुन्दर-बेहतरीन!!
बहुत ख़ूब, आपकी लेखनी का तो मैं पहले से ही प्रशंसक हूँ
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गुलाबी कोंपलें | चाँद, बादल और शाम | तकनीक दृष्टा/Tech Prevue | आनंद बक्षी | तख़लीक़-ए-नज़र
अदभुत....बिल्कुल सुंदर तितली सा......
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