Sunday, January 4, 2009

विगत


समय रुकता नहीं है, चलता चला जाता है। पेड़ के तने में जैसे एक और गोला...एक वर्ष का जीवनचक्र बीते हुए जीवनकाल में अंकित होकर लुप्त हो जाता है। लोग ,संदर्भ, संजोग मिलते हैं और बिछड़ जाते हैं। सब कुछ हमेशा नाटकीय नहीं होता। कभी कभार हाँ...। जैसे किसी हादसे में किसी का गुजर जाना....या नई नौकरी की तलाश में विस्थापित हो जाना। इन लोगों का जाना याद रहता है। शायद इसी याद के खातिर लोग समारोह का आयोजन करते हैं। थोड़ा समारोह और थोड़ा संदर्भ याद रह जाता है।

पर अक्सर समय के गुजरने का पता नहीं चलता। जैसे चलती बस में बैठे बैठे फ्रेम बदलते रहते हैं। देखते देखते सूरज डूब जाता है। नीला आसमान....गुलाबी सुनहरा...फिर काला...। कुछ फ्रेम जो पसंद आते हैं आँखों से निहार कर रूह से ठठोल कर देखते हैं। थोड़ा इन्हे मन से सोचते हैं। फिर याद के पन्नों में हल्के से सँभाल लेते हैं। यूँ लगता है यह गुजर नहीं सकते। इन्हे संजो लेने का अजीब सा अहंकार मन में होता है।
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अचानक से पता चलता है इनके चले जाने का...जब इन्हे छूने का मन होता है और यह हाथ नहीं आते....।

7 comments:

मोहन वशिष्‍ठ said...

सच कहा आपने समय कभी भी किसी के लिए नहीं रूकता

pintu said...

bahut achchi bat kahi hai aapne!

मीत said...

Good one .. Doctor !

प्रशांत मलिक said...

अचानक से पता चलता है इनके चले जाने का...जब इन्हे छूने का मन होता है और यह हाथ नहीं आते....।

aah!! kya baat kahi hai aapne..

Mired Mirage said...

फिर ये पल कभी कभी सपनों में ही आते हैं।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सही कहा!! अच्छा लिखा है.

शोभा said...

सही कह रही हैं। बधाई सुन्दर चिन्तन के लिए।