Tuesday, December 30, 2008

गुजरता समय


गुजरा समय विदा होना चाहता है। जैसे मैं कोई ठहरा हुआ पड़ाव हूँ और वह मुझसे मिल कर आगे निकल जाना चाहता हो। जैसे हम चॉक और स्लेट की तरह मिले और कुछ शब्द, कुछ स्वर...कुछ खाके , कुछ लकीरें खींच कर फिर डस्टर से मिटा आगे के लिए साफ कर लें। समय को गुजर जाने की आदत है। उसे लगता है उसके पीछे से लोग नयी पुताई कर सब नया कर लेते हैं। पहले चूना फिर एशियन पेंट्स के नये तरीके के रंग...सब नया।

जब से होश सँभाला है एक ही कैनवास है.....। आटे में पड़ा हाथ , माँ की दुलार भरी चपत...पापा की उँगली...भाई की पतंग....। पहले प्यार के खिले फूलों के रंग....पहली जुदाई का गम....। ना जाने और कितने गहरे हल्के रंगों में सजी है यह कैनवास। करीब से देखने पर पहचानती हूँ हर गुजरे समय को। समय जो रंग छोड़ गये ....जिनपर मैं कोई पुताई नहीं कर सकी।

समय पर हमेशा मैं चित्र बनाती रही। रंग चढ़ाती रही। पर ये कभी नज़र नहीं आये। हर साल यह यूँ ही परायेपन के साथ गुजर जाता है.....

मेरे पुराने कैनवास पर कुछ नये निशान छोड़कर...

Friday, December 19, 2008

मन का अरण्य


उनसे मिलना हुआ था जैसे किसी और महाद्वीप से आई हवा हो। मैं रुकी थी थोडी और गहरी साँस लेने के लिए। उसकी खुशबू में जैसे उस मिट्टी की सौंधी खुशबू थी जहाँ से मैं विस्थापित हुई थी। जानती थी मैं इस महाद्वीप का हिस्सा हूँ। मेरे पास अपनी ज़मीन थी, जिसका मौसम और मिज़ाज अलग था। मैं द्वीप के उस टुकड़े सी थी जो पानी के पास था। जो गीला था और जहाँ दूसरे किनारे की कई सौगाते बिखरी पड़ी थी। उस नन्हे पौधे की तरह जिसका बीज शायद दूसरे महाद्वीप से ही तैरते पहुँचा हो और अब यहाँ का हिस्सा हो गया हो। मेरे और उनके बीच एक समंदर था... लहरें थी जो उनके आसपास की तरंगें मुझ तक पहुँचा रही थी।

उन्हे देखा तो लगा वो एक भरे पूरे बूढ़े बरगद से थे। हरे भरे अपनी जड़ो के भीतर अपनी झुर्रियों के बीच एक अजीब सी उदासीनता से घिरे हुए। मेरी तरफ मुड़ा चेहरा स्नेहासिक्त था। ऐसा लगा था बहुत पहले से मैं उन्हे जानती हूँ। जैसे पहचान मेरे अंतरंग को तो याद थी पर मेरी यादाश्त से गुम थी।

मुझे लगा था वे मुस्कुराये थे। और एक पल को लगा था कि काश मैं सचमुच कोई छोटी सी चिड़िया होती जो उनकी ड़ाल में सुरक्षित किसी घोंसले में रहती। उनकी आँखें नम थी। उस नमी में देखा था मैने अपना स्वरूप। बरगद का ही एक कमज़ोर और बौना स्वरूप। बौखलाई थी अपना ही चेहरा देखकर। पता नहीं कैसे बरगद पर उगती हैं जटायें, कैसे उभरती हैं झुर्रियाँ....। मैं तैयार नहीं थी।

जब पूछा था...मिलोगी मुझसे। कुछ अहंकार में ही कहा था...अरे नहीं...किस लिए। मेरे अहंकार का स्वर मेरे अंतरंग की आवाज़ से ऊँचा था। उनकी आवाज़ मुस्कुराई थी। जैसे जानती हो कि फिर लौटूँगी उन तक अपनी पहचान खोजते हुए।

कुछ वक्त बीता है। मेरी जड़ें कुछ भीतर उतरी हैं। कुछ चिड़ियों ने मेरी टहनियों पर घोंसले बनाये हैं। मेरी हरी ड़ालियाँ भूरी हुई हैं.....उभरी हैं उनपर हल्की रेखायें....

आज हवा फिर उस महाद्वीप से इस तरफ ही चली है....वही खुशबू फिर मेरे अस्तित्व में घुली है......

...........और मैं उनसे मिलना चाहती हूँ।

Tuesday, December 2, 2008

आई हैव नो रिग्रैट्स

मुंबई के ब्लास्ट्स के शोक के बीचोबीच मेरा ध्यान खींचा उस नौजवान आतंकवादी ने जिसने कहा उसे किसी बात का अफसोस नहीं है। निहत्थे निर्दोष लोगों की बेवजह जान लेने का अफसोस उसे क्यूँ नहीं है?!! उसकी आत्मा मर गई है या उसका दिमाग काम नहीं करता?!! उसके आँखों से टपकती नफरत में जनून था....और एक तेज़ दिमाग....


हम कब तक बीमारी छोड़ लक्षणों से जूझेंगे?!! क्या हम थोड़ा सा समय भी इन नौजवानों की मानसिकता समझने में नहीं लगायेंगे?!!


आतंकवाद को मिटाने के लिये आतंकवादी की मानसिकता समझना पहली सीढ़ी है।

आम आदमी को आतंकवादी बनाने के पीछे के कारणों को समझने की मेरी कोशिश......






http://www.youtube.com/watch?v=GHHVUtYfIGc



http://www.youtube.com/watch?v=xlBhWs1sti0





जब मुझे लगता है
मैने जो किया सही है
फिर उसकी वजह से
कुछ गलत ही
क्यों ना हुआ हो...

जब मुझे दर्द होता है
और आक्रोश में
करती हूँ वार
उसपर...जो मुझे लगता है
मेरा दुश्मन...

जब घेर लेते हैं
न्याय के प्रहरी
और माँगते हैं
सही और गलत का हिसाब
और साबित करते हैं
मुझे गलत....

जब मैं चाहती हूँ
कोई देखे मुझपर बीते
अन्याय को
और महसूस कर सके
मेरे रिसते घावों का दर्द
तब करती हूँ मैं एक चोट...

और तब कटघरे में
खड़े रहने पर
अपना जुर्म कबूल कर
कहती हूँ
चीख कर
"आई हैव नो रिग्रैट्स"