
गुजरा समय विदा होना चाहता है। जैसे मैं कोई ठहरा हुआ पड़ाव हूँ और वह मुझसे मिल कर आगे निकल जाना चाहता हो। जैसे हम चॉक और स्लेट की तरह मिले और कुछ शब्द, कुछ स्वर...कुछ खाके , कुछ लकीरें खींच कर फिर डस्टर से मिटा आगे के लिए साफ कर लें। समय को गुजर जाने की आदत है। उसे लगता है उसके पीछे से लोग नयी पुताई कर सब नया कर लेते हैं। पहले चूना फिर एशियन पेंट्स के नये तरीके के रंग...सब नया।
जब से होश सँभाला है एक ही कैनवास है.....। आटे में पड़ा हाथ , माँ की दुलार भरी चपत...पापा की उँगली...भाई की पतंग....। पहले प्यार के खिले फूलों के रंग....पहली जुदाई का गम....। ना जाने और कितने गहरे हल्के रंगों में सजी है यह कैनवास। करीब से देखने पर पहचानती हूँ हर गुजरे समय को। समय जो रंग छोड़ गये ....जिनपर मैं कोई पुताई नहीं कर सकी।
समय पर हमेशा मैं चित्र बनाती रही। रंग चढ़ाती रही। पर ये कभी नज़र नहीं आये। हर साल यह यूँ ही परायेपन के साथ गुजर जाता है.....
मेरे पुराने कैनवास पर कुछ नये निशान छोड़कर...




