Wednesday, September 24, 2008

मन की माटी


उर्वर ज़मीन....जिसकी कोख में कितने ही बीज निद्रा में डूबे हुए । नमी की बरसात में...प्यार पला ...नये बीज हवा में चले आये ,सोये बीज आँख मल कर उठे...अंकुर फूटे.....नये कोंपल....। गीली मिट्टी में नन्हे जड़ो ने पाँव रखे... बात बनी, भाव बने, याद बनी, साथ पले.....। नन्हे अंकुर पौधे बने....वे बड़े...फूल खिले...। धीरे धीरे पेड़ों की छाया....सपनों के घोंसले...छनी धूप और लंबे होते साये। एक जंगल पनप गया। घास, झाड़, झुरमुट ...जंगली फूल...बूढ़े बरगद...। ज़मीन जिंदा हो रही थी जंगल की नब्ज़ में....और आसमान में छूट रहे थे कितने अरमान सपनों के घोंसले से.....। गीली ज़मीन के सीने में जड़ें उतर रही थी। और लगातार रेखायें उभर रही थी। गहराती जड़ों के गहराते अहसास जंगल को संकल्प दे रहे थे...एक जिजीविशा ...एक जिद...जिंदा होने के लिए...। मिट्टी जड़ों के नीचे कतार लगा कर खड़ी थी...जड़ों को पकड़ जिंदगी बन जाने के लिए.....।


जंगल का ...उसमें रह रहे हरियाली का, घोंसलों का, सपनों का,बात का ,भाव का, याद का....सबकी अपनी एक आयु थी....जिसे भोग लेने के बाद उन्हे बीत जाना था....पर गीली मिट्टी पर उभरे निशान समय के साथ गहरे हो रहे थे....

मिट्टी जीवन के बीज सहेज रही थी....उसे इंसान बना रही थी....

ताकि फिर नमी के आने पर एक जंगल खड़ा कर सके.....

Tuesday, September 16, 2008

टू टाई और नॉट टू टाई...

पश्चिमी संस्कृति की बहुत सी बातें हैं जो हमने गाँठ बाँध ली है,लेकिन टाई का जवाब नहीं। स्कूल के बच्चों से लेकर दूल्हे के गले पर...फिर स्मार्ट एक्सीक्यूटिव से लेकर न्यूस रीडर तक...टाई बिल्कुल गरदन के करीब है। हो सकता है अजित जी टाई का सफर ढूँढ़ निकाले....पर खुद टाई से सफर करने वालों की सँख्या में लगातार बढ़ौतरी हो रही है। इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की फर्स्ट एड़ की किताबों में पहली लाईन...."लूसन द टाई" हो गई है। सोचो तो यह कोई साजिश का हिस्सा लगती है। उन्मुक्त,जंगली को पालतू बनाने की साजिश। जैसे कोई पट्टा जो बता सके वो किसका वफादार है। किस स्कूल का, किसका पति,किसका मुलाजिम.....टाई एक स्टेटमेंट है। टाई एक गिफ्ट रैपर के ऊपर बाँधे 'बो' जैसा है। टाई बाँधना एक कला है। ऐसी कला जो अगर ठीक से सीख ली गई तो यह खुद इस बात का प्रमाण है की आप सिखाये जा सकते हैं। जो इंसान ऐसी प्रामाणिक बँदिशे कबूल करे वो बाँधा जा सकता है। चाहे किसी का कोई भी 'टेक' हो यह ऐसी रस्सी सी है जिसका सिरा खींच दो तो इसे पहनने वाला माथा ठेक लेता है। त्री पीस सूट और स्मार्ट टाई में खड़े जेन्टल मैन की टाई को ज़रा ध्यान से देखिये... एक पूरी सभ्यता के सही गलत नियमों का इस्तेमाल कर तह कर रखी गठरी पर बाँधी गाँठ सी दिखेगी। स्कार्फ से शुरु हुई बात आज बहुत आगे बढ़ गई है। कहाँ यह ठंड से बचाती थी और कहाँ इसे पहनते पहनते पसीने छूट जाते हैं। मैं झूट नहीं बोल रही....ज़रा भी इंटरनेट पर तहकीकात करिये...आपको आश्चर्य होगा की इस समस्या का अनुपात क्या है...यह समस्या साक्षात क्या है....। दिस नॉट इस नॉट गुड़।

http://www.youtube.com/watch?v=9T6xBfq77hg


हम भारतीय हैं....हमने पगड़ी पहनना छोड़ दिया, टोपी उतार दी...धोती दूर की...कुर्ता पायजामा सब कैश्युल और एतनीक...और फिर ड़ाला है गले में फंदा.....

चलो कोई तो जगह है जहाँ नेता सही ट्रेंड सेट कर रहे हैं....टाई नहीं शौल पहन रहे हैं....

चलो कोई नहीं...टाई हैस टू भी टाइड़...बट....ऐसा नहीं हो सकता की कम से कम "इन सपोर्ट ऑफ कॉसस लीडिंग टू सूसाइड्स ड्यू टू हैगिंग" जैसा कोई स्लोगन ही एन्डौर्स कर लें....

अंटिल इट हैपन्स...स्टे टाइड

Sunday, September 7, 2008

अपेक्षा


उस दिन भी माँ ने टोका था। दिनभर गलियों में घूमना अच्छी बात नहीं है। छोटी सी बिना बाँह की फ्रॉक पहन मैं माँ की बात अनसुना कर फुदक कर बाहर भागी थी। रस्सी कूदते कूदते अपने दोस्त के घर। पता नहीं माँ को मेरे दोस्तों से क्या परेशानी थी। होमवर्क, क्लासवर्क सब स्कूल में ही कर लेती थी। पर माँ चिढ़ कर कहती....कहीं भी जाकर पसर जाना अच्छी बात नहीं। कहीं भी कहाँ जा रही थी। दोस्त के पास....मैने उसकी कलाई पर चूढ़ी तोड़कर दोस्ती पक्की करने की रस्म निभाई थी। माँ कहाँ समझेगी। मैने आजतक उनकी किसी सहेली को दोस्त सा नहीं पाया था। व्यवहारिक रिश्ते...। जहाँ मुस्कुराना, बतियाना, मिलना मिलाना सब किसी आफत के समय की तैयारी के लिए । ऐसा नहीं था की मुसीबत के समय यह रिश्ते एक दूसरे के काम नहीं आते थे। लेकिन इनकी नींव अपेक्षा थी। कहाँ माँ समझती मेरे मासूम अपेक्षारहित रिश्ते।

दोस्तों के साथ सब भूल जाती थी । बस याद रहता था तो वह समय। औरों के लिए बहुत तेज़ी से गुजरता हुआ मेरे लिए ठहर जाता था। इमली में थोड़ा सा नमक लगाकर एक हाथ में पकड़ चाटते हुए ....दूसरे हाथ से इमली के कटे बीज से अपनी पारी चलती।

याद है उस दिन अचानक से वह चुप हो गई थी। जैसे आराम से आल्ती पाल्ती मारकर बैठी बैठी ही वो सावधान हो गई हो। उसने अपनी फ्रॉक घुटनों के नीचे की थी। उन्मक्त सी उसकी हँसी के जैसे अचानक पर काट दिये हों।

किसी के पास होने का आभास होने पर मैं मुड़ी थी। शायद उसकी दादी थी।

सफेद साड़ी, चश्मा जिसमें से दो काले धागे पीछे जा रहे थे। पता नहीं मुझे क्यों बैल याद आ रहे थे...ऐसा बैल जिसका आक्रोश नाक से गुजरे रस्सियों के हाथ में लगाम सा था।

उनकी नज़र चुभ रही थी। मैं महसूस कर सकती थी...पहले चेहरे पर...फिर फ्रॉक पर....मेरे बालों में लगा रिबन खुला हुआ था। हाथ...हाथ चिपचिपे थे...इमली...और नमक। चप्पल तो घर में ही छूट गई थी। उनकी नज़र मेरे पैरों पर आकर रुक गई थी। मिट्टी से सने पैर....कुछ धूल मेरे आसपास थी।

वो कोई अलग भाषा में बहुत धीरे लेकिन बहुत साफ तरीके से कुछ बोली थी। अजीब बात थी... पहली बार ही मैने यह भाषा सुनी थी। सुनी भी और अनसुना भी नहीं कर सकी। बल्कि वह गूँज रही थी। अपनी दोस्त की तरफ देखा था। पर एक अजीब सा परायापन उसकी आँखों में उतर रहा था। उसने क्या कहा मुझे नहीं सुनाई दिया। अपनी रस्सी पकड़ ज़ोर से उठकर भागी थी। जैसे मैं उस भाषा, नज़र को पीछे छोड़ देना चाहती थी।

माँ बाहर ही खड़ी मिल गई थी। क्या हुआ पूछा था। पर मुझे खुद पता नहीं था हुआ क्या। मैं रो रही थी....सुबककर...माँ पूछ रही थी कुछ कहा तुम्हारी दोस्त ने....

मैं समझ नहीं पा रही थी की उसने कुछ कहा क्यों नहीं......