मैं जिस कोने पर खड़ी हूं वहाँ से ऐसा दिखता है। कैसा दिखता है?.... और जैसा भी दिखता है क्या जरूरत है दृष्टि के इस कोण को दिखाने की। मेरे और किसी के भी दृष्टिकोण का महत्व क्या है ....और इसे बिना पूर्वाग्रहों के देखना क्यों जरूरी?
....अगर सामने की चीज़ छोटी हो तो उलट पुलट कर हर ऐंगल से उसकी तस्वीर बनाई जा सकती है। तोड़ फोड़ जोड़ गुना कर जाना जा सकता है की चीज़ क्या है, क्यों है, कैसी है। हर कोई इसे अपनी समझ के हिसाब से अर्थ दे सकता है। इस अर्थ का व्यक्ति की समझ, बुद्धि और भावना से संबंद्ध हो सकता है लेकिन दृष्टि से नहीं।
पर अक्सर बातों का , विषयों का विस्तार बहुत होता है। सैटलाइट इमेजस की तरह जरूरी है अलग अलग दृष्टि से देखे गये दृष्यों को स्कैन कर , सुपरइम्पोस कर समझने की चेष्ठा की जाए की दृष्य वास्तव मे है क्या। धीरे धीरे ही सही...लेकिन दृष्य के डायमेंशंस....हर आयाम से परीचित होने की कोशिश हो।
हर दृष्टिकोण का महत्व है क्योंकि एक कोने से देखा गया सच कभी संपूर्ण नहीं हो सकता।
Wednesday, August 20, 2008
Monday, August 11, 2008
कल के साथ कल...कुछ पल
पापा की कितनी बातेबिलकुल दादा जैसी है
वो जब मुझसे मिलते हैं
पापा जैसे लगते हैं.....
दादी के थके चेहरे से
ऐसे स्नेह उमड़ता है
मुझे देखकर उनकी आँखों में
सपना सा कुछ उगता है
मेरे नाना
सब बदमाशी समझते हैं
रंगे हाथ पकड़ कर मुझको
बस मन ही मन हँसते हैं
मामा और अम्मा के झगड़ेरूठे मनते किस्से सपने
कहाँ रूठना कहाँ मनाना
नानी से मैने जाना है
मुझे निहारो
मुझे सहेजो....
उँगली पकड़
रास्ता दिखा दो
गोदी बिठाकरमुझे तुम सँभालो
मैं अंकुर हूँ...
तुम जड़ो का सहारा
तेरी झुर्रियों में
मेरे कल का
नक्शा...
छिपा है...
Thursday, August 7, 2008
मेरा गाँव मेरी आँखों से...
मेरी रूह
यहाँ की मिट्टी
में गूंदी
नूर के बूंद
सी है

नदि के किनारे
घने पेड़ों के साये
.......
कहीं कमल भी
खिले थे
.....
किस्से कहानी
नाव में सवार
इसी किनारे से
कई बार चले थे

यूँ लगता है
इन पेड़ों के पीछे
वे साथी छिपे हैं
जो बचपन की पगडंडियों
में मिले थे

बिजली की तारों पर
बैठा बुलाता
कोई शगुन अच्छा
बतला रहा था

बचपन की तस्वीर
फिर जिन्दा हुई है
बच्चों तुम्हारी
नादानियों में

मेरा आँगन मेरे
गाँव में है खुलता
वहाँ वह
बाँह खोले खड़ा है

दीवार फाँद
रौशनी के
जतन में

बिजली के खँबें से भी
जीवन
लिपटा
खड़ा है

चूल्हे की तपिश से पहले की सुस्ति

पुरानी लकड़ी
पर नये मशरूम

जड़ों में अरवी
छिपा कर रखी है

ग्रेपफ्रूट से लदा हुआ
....उर्वर.

कैसे बड़ा होता है पपीता...

पहाड़ो के ऊपर....

चट्टान से सटकर खड़ा हूँ

ये रास्ते

ये पहाड़ी हवायें

मेंढक ने अपने
अंडे दिये हैं



छोटी छोटी यादें
बन रही है
मासूम मन में

मुर्गी के पीछे

सुपारी का पेड़

गीली हवायें

नाचती बूंदें

काली मिर्च की बेल...
ऊपर पहुँचने की जल्दी है..

कुआँ

घिरनी

गहराता अहसास

छना आसमान

नहर..

बहता पानी

काई...
जिंदगी...हर जगह

आसमाँ को....

...ढकते हुए...

...हरे पत्ते...

पेड़ की गोदी में
नारियल

मेरा गाँव

बूंदें यहाँ
हवा पर झूलें...
जिंदगी हर जगह
आँखें खोले...
मेरा गांव...
माँ की छाँव....
यहाँ की मिट्टी
में गूंदी
नूर के बूंद
सी है

नदि के किनारे
घने पेड़ों के साये
.......
कहीं कमल भी
खिले थे
.....
किस्से कहानी
नाव में सवार
इसी किनारे से
कई बार चले थे

यूँ लगता है
इन पेड़ों के पीछे
वे साथी छिपे हैं
जो बचपन की पगडंडियों
में मिले थे

बिजली की तारों पर
बैठा बुलाता
कोई शगुन अच्छा
बतला रहा था

बचपन की तस्वीर
फिर जिन्दा हुई है
बच्चों तुम्हारी
नादानियों में

मेरा आँगन मेरे
गाँव में है खुलता
वहाँ वह
बाँह खोले खड़ा है

दीवार फाँद
रौशनी के
जतन में

बिजली के खँबें से भी
जीवन
लिपटा
खड़ा है

चूल्हे की तपिश से पहले की सुस्ति

पुरानी लकड़ी
पर नये मशरूम

जड़ों में अरवी
छिपा कर रखी है

ग्रेपफ्रूट से लदा हुआ
....उर्वर.

कैसे बड़ा होता है पपीता...

पहाड़ो के ऊपर....

चट्टान से सटकर खड़ा हूँ

ये रास्ते

ये पहाड़ी हवायें

मेंढक ने अपने
अंडे दिये हैं



छोटी छोटी यादें
बन रही है
मासूम मन में

मुर्गी के पीछे

सुपारी का पेड़

गीली हवायें

नाचती बूंदें

काली मिर्च की बेल...
ऊपर पहुँचने की जल्दी है..

कुआँ

घिरनी

गहराता अहसास

छना आसमान

नहर..

बहता पानी

काई...
जिंदगी...हर जगह

आसमाँ को....

...ढकते हुए...

...हरे पत्ते...

पेड़ की गोदी में
नारियल

मेरा गाँव

बूंदें यहाँ
हवा पर झूलें...
जिंदगी हर जगह
आँखें खोले...
मेरा गांव...
माँ की छाँव....
Tuesday, August 5, 2008
केरल के एक गाँव में बारिश में भीगा सा...
Saturday, August 2, 2008
सिगरेट

एक सिरे पर सुलगी हुई चिंगारी को आग समझ कई बार कश लेता रहा। उसे लगता था जैसे थोड़ी सी आग साँसों को गरम कर दिल के भीतर बहते सैलाब को तपा कर,जला कर खाक कर देगी। आग को पीकर, घुँए को बाहर फेंकते हुए यूँ ही महसूस करता जैसे कब से गीली उसकी रूह धीरेधीरे सँभल रही है...अपना पूर्वाकार पा रही है...।
पर यह सिगरेट भी कागज़ के टुकड़े में बंद आग के छलावे के सिवा कुछ ना था...। जिस में नशा था, भटकाव था,बहक थी....गर्मी नहीं थी...सुकून नहीं था।
एनिग्मा
एक तरंग से उत्पन्न असीम लहरें...और उन लहरों के झूलों पर उछलते हुए कितने बुलबुले...हवा को बाजुओं में भर..कुछ देर के लिए उनमें रंग भर फिर से सतह पर...तरल मात्र..
आशय... हर बुलबुले का आशय होना चाहिए। विज्ञान, सिद्धान्त और प्रकृति के नियम के अनुरूप....
आशय उन लहरों और बुलबुलों का भी होना चाहिए जो उसकी आँखों में लगातार उठती गिरती है....
सपनीली आँखों में गहरी उतरती इन लहरों में आशय ढूँढे कैसे...?!
आशय... हर बुलबुले का आशय होना चाहिए। विज्ञान, सिद्धान्त और प्रकृति के नियम के अनुरूप....
आशय उन लहरों और बुलबुलों का भी होना चाहिए जो उसकी आँखों में लगातार उठती गिरती है....
सपनीली आँखों में गहरी उतरती इन लहरों में आशय ढूँढे कैसे...?!
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