Thursday, May 15, 2008

डेजा वू

ऐसी शाम इससे पहले भी आई है। जैसे किसी गुजरी सी शाम का दुहराव हो। हर बात , हर राज़ यहाँ कुछ पहचाना सा। यहाँ की गलियाँ भी पुरानी सी। कोई बात होने वाली है। ऐसा ही मन बार बार कहता है। एक लम्हे का सिरा पकड़ सरकते हैं और छूटने पर भी बात खामोश रहती है।
तपा हुआ बरसात को तरसता हुआ। लम्हा यूँ ही खिसकता हुआ।

तभी जानी पहचानी पुरानी वह चीज़ दिखती है......वही चिंगारी जिसने कभी आग नहीं पकड़ी है।