Sunday, April 20, 2008

पतझड़

किताब पुरानी थी। कबाड़ में देते देते वापस उठा ली थी। ना जाने क्या सोचकर पन्ने पलट दिये। किताब में से कई सारे सूखे पत्ते नीचे उतर आये। मुड़े, सूखे छोटे बड़े..। नज़र बाहर गई थी। फिर पतझड़ था। हर बार कितनी बेरुखी से पेड़ इन्हे झाड़ देता है। नये हरे पत्तों के खातिर पुराने पत्तों से सब मोह खत्म। आज भी....। आँगन पत्तों से भरा हुआ था। शाख इन्हे झाड़कर अँगडाई ले रही थी। लगता था अभी उबासी भर कर नींद में कुछ देर। तब तक, जब तक बूँदबूंद बरस कर नूर नन्हे कोंपल को जगा ना दे। किताब में रखे पन्ने पिछले साल गीले ही उतार लिये थे। फिर एक भारी सी किताब ढूँढ ना जाने किन अलग थलग पड़े किस्सों के बीच दफन कर दिये। सोचा था हरे रह जायेंगे। आज ये बेजान ही हाथ लगे थे।