नींद के पास रात फटकती उससे पहले ही ख्याल ने आ दबोचा। फिर यादों के छोटे प्यालों में छलक कर सामने । हाथ बढ़ाने भर की देर थी...और फिर नशे में ।मालूम था नशे की आदत छूटते छूटते फिर लग जाती है। बस... टस से मस नहीं हुई। रात जहाँ थी वहीं रोक ली। ख्याल के गुजरने का इंतज़ार था। अजीब सा लम्हा हाथ में था। एकदम खाली। रूठा सा। बहलाती रही। सहलाती रही। वह भी मुँह फेर कर बिचका कर खड़ा रहा। थका सा लगा तो थोड़ी नींद सामने की....। उसे भी जिद सिर्फ ख्याल की थी...बस यही और कुछ नहीं। कैसे दूँ वह ख्याल जिसे खुद अपना होश नहीं हो। आवारा .....विद्रोही, अपने घाव, कुरूपता कुछ भी छिपाये बिना....ठीक सामने। सच के कोने काटकर, सलीके से फाइल करने की आदत है। ऐसे अलग अलग रंग , आकार में कटे फटे ख्याल बेतरतीब सामने फैले हुए। लम्हे को कस कर पकड़े हुए इंतज़ार करती रही....। पहर बदलता गया। लम्हा खड़ा ही रहा। पता नहीं कब आँख लग गई। उठी तो सर भारी था...पर ख्याल का नामोनिशाँ नहीं था।
.....क्या सच में चला गया?!!
Saturday, March 15, 2008
Thursday, March 6, 2008
स्मृति की खोह में कुछ पल
हर दिन को गोल गोल कर के सोचती हूँ रात को धकेल दूँगी । बहुत दूर। फिर इसी सिरे को पकड़ नई सुबह तो नहीं होगी। पर धकेलते धकेलते थक भी जाओ....कहाँ सरकता है दिन। नई सुबह होती है...किसी नई पोशाक की तरह...जिसमें पुराने कपड़े की झालर लगी हो।
शायद अभी इसी मोड़ कुछ और सुस्तायेगा...। करवट लेने में भी आलस है इसे। सोचती हूँ किसी पगडंडी से पीछे ही चली जाऊँ। किसी पुरानी दुनिया में। समय का कारवाँ यहाँ रूका है....लौट कर साथ हो लूँगी।
बस की खिड़की वाली सीट पर। पहाड़ी रास्ता । रावतभाटा से कोटा तक का। गर्म हवा। जिसमें जंगल महकता था।झाड़ियाँ, बेर के कितने पेड़, हरा रंग थोड़ी थोड़ी दूरी पर और गहरा जाता। हल्के नीले होने तक। खिड़की पर चेहरा रख कर बाहर देखती।....लोहे की बारियाँ...धूप में थोड़ी तपी सी...मेरे स्पर्श से शीतल होती हुई। उनका कड़ा स्वरूप मेरी दृष्टि....और शायद मेरी कल्पना पर भी एक सीमा खींच देती।
तपा तपा सा जंगल। भूरी , काली झाड़ियाँ महीन छोटी पत्तियों से सजी हुई। कहीं बीच बीच में जैसे कोई कैम्पफायर के लिये आग जलाई हो। टेसू के फूल आग की लपटों सा उठते हुए। ज़मीन एकदम रूखी सूखी। घास जैसे वहीं खड़ी खड़ी भुन गई हो। बीच बीच से कोई चट्टान अपना सर ऊपर उठाती हुई। फिर जैसे कुदरत ने प्यार से हाथ फेर कर नन्हे नीले पीले रंग के जंगली फूलों से सजा दिया हो।
बगल वाली सीट पर बजाज अंकल की खर्राटों की आवाज़। पिछली सीट पर रोते हुए मुन्नु की। पीछे से बन्टू का बन्दर वन्दर की कोई कविता। मेरी नज़र जैसे जैसे दूर जाती...यह सब आवाज़ें मंद पड़ जाती।
हवा का खिड़कियों तक आकर कानों में फुसफुसा जाना। कोई उड़ती पत्ती का आकर कोई चुगली कर जाना। टहनियों का हाथ से तने को पकड़ कर गुनगुनाना। पत्तियों का आपस मे गपशप करना। नन्ही चिड़िया का चींचीं करना...फिर फु्र्र फुर्र उड़ जाना। फिर लगता जैसे हवा की बीन पर ही कोयल कोई धुन छेड़ रही हो।
आठ साल की मैं ....और पूरी दुनिया जैसे सामने हो। मुझे लगता अभी चंपक से चीकू, शेर कछुआ ,मोर.... सब चले आयेंगे। जंगल में कोई सभा होगी। शेर चट्टान पर से दहाड़ेगा। कोई कलकल बहता झरना होगा। उसमें तैरती कोई मछली। कहीं भालू सुस्ताया होगा। कहीं मधुमक्खी छत्ते में शहद बनाती होगी।
जंगल में ही एक पूरा जंगल उगा लेती। ढ़लान पर आती तो लगता भालू के पीठ पर बैठ उतर रही हूँ। चढ़ते हुए बुदबुदाती ज़रा सँभल के हाथी।
पके लाल बेर पेड़ में लाल बत्ती की तरह सजे हुए से। मुँह में स्वाद उतर आता। जीभ से उतारा लाल छिलका...खुरदुरा नन्हा सा बीज....मम्म!! और वहाँ थोड़ी दूर पर पेड़ से लटकी जलेबियाँ। हल्की गुलाबी...थोड़ी खुली हुई सी।काले बीज सफेद गूदे को सरका कर मुँह निकालते हुए। पक्की इमलियाँ। और हाँ....वह टिमरू ही है ना....मैला सा पीले रंग का......
बैग में हाथ ड़ालकर काटे हुए काले सिंगाड़े निकाल लेती। चलो वह नहीं यही सही। भूख जो लगी है।
रास्ते में काफी घुमाव है। जगह जगह दिख जाता है...खतरनाक मोड़। मुझे तलाश है । पिछली बार तो दिखा था....इस बार....।
हाँ....वह रहे। मोर... साथ में मोरनी। पिहआँ... बादल हैं ये शायद नाचे...। पर वह पहले दो कदम सरक कर...फिर जैसे रनवे पर भाग कर...उड़ान भर कर दूर।
लंगूर क्यूँ नहीं दिखे। होने चाहिये थे। होंगे।मुझे मालूम था। झुंड एक ही जगह पहुँच जाता है। इनकी पूँछ देखकर तुरंत हनुमानजी की पूँछ की लँबाई पर विश्वास हो जाता ।
और चेहरे....एकदम काले।
कल्पना फिर उड़ान भरने लगती। किसी दिन जरूर कोई गड़बड़ की होगी इन बंदरों ने। फिर सजा मिली होगी......सब का मुँह काला कर दो। जब सुधरेंगे तब हटा देना। ढीठ बंदर माने ही नहीं होंगे। रह रहकर रंग पक्का हो गया होगा।
बस बहुत धीरे सरक रही है...धुमाव, चड़ान....ढ़लान.....
मुझे नींद आ रही है.....
चलो वापस.....
दिन कुछ आगे बड़ा क्या ? कहाँ खिसका...कारवाँ वही है....खड़ा हुआ। रुका हुआ।
चलो जाना होगा.......फिर गोल करो...और धकेलो.....
शायद आज के धक्के से....यह लुढ़क ही जाये.....और कल एक नई सुबह...।
शायद अभी इसी मोड़ कुछ और सुस्तायेगा...। करवट लेने में भी आलस है इसे। सोचती हूँ किसी पगडंडी से पीछे ही चली जाऊँ। किसी पुरानी दुनिया में। समय का कारवाँ यहाँ रूका है....लौट कर साथ हो लूँगी।
बस की खिड़की वाली सीट पर। पहाड़ी रास्ता । रावतभाटा से कोटा तक का। गर्म हवा। जिसमें जंगल महकता था।झाड़ियाँ, बेर के कितने पेड़, हरा रंग थोड़ी थोड़ी दूरी पर और गहरा जाता। हल्के नीले होने तक। खिड़की पर चेहरा रख कर बाहर देखती।....लोहे की बारियाँ...धूप में थोड़ी तपी सी...मेरे स्पर्श से शीतल होती हुई। उनका कड़ा स्वरूप मेरी दृष्टि....और शायद मेरी कल्पना पर भी एक सीमा खींच देती।
तपा तपा सा जंगल। भूरी , काली झाड़ियाँ महीन छोटी पत्तियों से सजी हुई। कहीं बीच बीच में जैसे कोई कैम्पफायर के लिये आग जलाई हो। टेसू के फूल आग की लपटों सा उठते हुए। ज़मीन एकदम रूखी सूखी। घास जैसे वहीं खड़ी खड़ी भुन गई हो। बीच बीच से कोई चट्टान अपना सर ऊपर उठाती हुई। फिर जैसे कुदरत ने प्यार से हाथ फेर कर नन्हे नीले पीले रंग के जंगली फूलों से सजा दिया हो।
बगल वाली सीट पर बजाज अंकल की खर्राटों की आवाज़। पिछली सीट पर रोते हुए मुन्नु की। पीछे से बन्टू का बन्दर वन्दर की कोई कविता। मेरी नज़र जैसे जैसे दूर जाती...यह सब आवाज़ें मंद पड़ जाती।
हवा का खिड़कियों तक आकर कानों में फुसफुसा जाना। कोई उड़ती पत्ती का आकर कोई चुगली कर जाना। टहनियों का हाथ से तने को पकड़ कर गुनगुनाना। पत्तियों का आपस मे गपशप करना। नन्ही चिड़िया का चींचीं करना...फिर फु्र्र फुर्र उड़ जाना। फिर लगता जैसे हवा की बीन पर ही कोयल कोई धुन छेड़ रही हो।
आठ साल की मैं ....और पूरी दुनिया जैसे सामने हो। मुझे लगता अभी चंपक से चीकू, शेर कछुआ ,मोर.... सब चले आयेंगे। जंगल में कोई सभा होगी। शेर चट्टान पर से दहाड़ेगा। कोई कलकल बहता झरना होगा। उसमें तैरती कोई मछली। कहीं भालू सुस्ताया होगा। कहीं मधुमक्खी छत्ते में शहद बनाती होगी।
जंगल में ही एक पूरा जंगल उगा लेती। ढ़लान पर आती तो लगता भालू के पीठ पर बैठ उतर रही हूँ। चढ़ते हुए बुदबुदाती ज़रा सँभल के हाथी।
पके लाल बेर पेड़ में लाल बत्ती की तरह सजे हुए से। मुँह में स्वाद उतर आता। जीभ से उतारा लाल छिलका...खुरदुरा नन्हा सा बीज....मम्म!! और वहाँ थोड़ी दूर पर पेड़ से लटकी जलेबियाँ। हल्की गुलाबी...थोड़ी खुली हुई सी।काले बीज सफेद गूदे को सरका कर मुँह निकालते हुए। पक्की इमलियाँ। और हाँ....वह टिमरू ही है ना....मैला सा पीले रंग का......
बैग में हाथ ड़ालकर काटे हुए काले सिंगाड़े निकाल लेती। चलो वह नहीं यही सही। भूख जो लगी है।
रास्ते में काफी घुमाव है। जगह जगह दिख जाता है...खतरनाक मोड़। मुझे तलाश है । पिछली बार तो दिखा था....इस बार....।
हाँ....वह रहे। मोर... साथ में मोरनी। पिहआँ... बादल हैं ये शायद नाचे...। पर वह पहले दो कदम सरक कर...फिर जैसे रनवे पर भाग कर...उड़ान भर कर दूर।
लंगूर क्यूँ नहीं दिखे। होने चाहिये थे। होंगे।मुझे मालूम था। झुंड एक ही जगह पहुँच जाता है। इनकी पूँछ देखकर तुरंत हनुमानजी की पूँछ की लँबाई पर विश्वास हो जाता ।
और चेहरे....एकदम काले।
कल्पना फिर उड़ान भरने लगती। किसी दिन जरूर कोई गड़बड़ की होगी इन बंदरों ने। फिर सजा मिली होगी......सब का मुँह काला कर दो। जब सुधरेंगे तब हटा देना। ढीठ बंदर माने ही नहीं होंगे। रह रहकर रंग पक्का हो गया होगा।
बस बहुत धीरे सरक रही है...धुमाव, चड़ान....ढ़लान.....
मुझे नींद आ रही है.....
चलो वापस.....
दिन कुछ आगे बड़ा क्या ? कहाँ खिसका...कारवाँ वही है....खड़ा हुआ। रुका हुआ।
चलो जाना होगा.......फिर गोल करो...और धकेलो.....
शायद आज के धक्के से....यह लुढ़क ही जाये.....और कल एक नई सुबह...।
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