
सुबह के तीन बजे थे। डॉ सुनीति पेशियन्ट देखकर लौटी थी...और मैं अपने पेशियन्ट के रिपोर्ट का इंतज़ार कर रही थी।
केरल की डॉ सुनिति के चेहरे पर एक अलग सा नूर है। सुंदरता की परिभाषा में शायद वे खरी ना उतरें। किंतु संवेदना
से भरा सौम्य चेहरा देखकर यू ही तस्सली हो जाती है। यकीन से कह सकती हूँ की दर्दी उन्हे देखकर स्वयं को सुरक्षित हाथों में महसूस करता होगा।
चाय की घूँट पीते हुए मैं देख रही थी....वे किसी ख्याल में गुम होती जा रही थी।
"आई विश आई वॉस नॉट पोस्टड इन आई सी यू । 15% लेफ्ट वेन्ट्रीकुलर इजेक्शन फ्रैक्शन....ऐन्ड ही इस स्माइलिंग ऐट मी।"
पन्द्रह प्रतिशत लेफ्ट वेन्ट्रीकुलर इजेक्शन फ्रैक्शन का मतलब था कि दर्दी गँभीर हालत में था। किसी भी क्षण कुछ भी हो सकता था। पूरी रात जूझ कर वह उन्हे जिंदा रख पाई थी। यह जानते हुए की ऐसा बहुत देर तक सँभव नहीं हो सकता।
"यू नो डॉ बेजी आई हैड दिस सीरियन पेशियन्ट....आई कुड नेवर पुट हिम आउट ऑफ माई माइन्ड।"
वो उदास हो रही थी। उनकी आवाज़ भर्राने लगी थी। मैं देख सकती थी , वो मुझसे बात जरूर कर रही थी...किंतु खुद एक साल पहले अजमान के एक अस्पताल के आई सी यू पहुँच गई थी।
"वो सिर्फ पैंतिस साल का था। अजमान में देख कर आश्चर्य हुआ था। पूछा था दुबई में रहते हुए अजमान क्यों आये। उसने मुस्करा कर कहा था...मैं बेगम को परेशान नहीं करना चाहता था। उसे बताये बिना आया हूँ। तकलीफ नज़रंदाज़ भी नहीं कर सकता था। आप दवा लिख दीजिये...जो बोलोगी मैं करूँगा...पर मैं स्वस्थ रहना चाहता हूँ।
पैंतिस साल का वह...तीन बच्चों का बाप था। बड़ा बेटा 10 साल का , बीच की बेटी थी जिसे मल्टिपल स्क्लीरोसिस था और इस बजह से चल फिर नहीं सकती थी। छोटा बेटा दो महीने का था।
ऐसा खूबसूरत नौजवान ....वो ग्रीक गौड्स नहीं होते.....गोरा, काले घुँघराले बाल, लँबा चौड़ा...देखो तो यूँ भी निहारने का मन कर जाये... और उसकी मुस्कुराहट....इतनी प्यारी और मीठी...
देखकर वह बीमार नहीं लगता।
इ सी जी मशीन लगाते ही मेरा दिल बैठने लगा था। मेरे चेहरे पर उभरी चिंता देखकर वो ही बोला था....कि उसे मालूम है उसकी हालत इतनी ठीक नहीं है....वजह का भी अंदाज़ा है....की मैं कार्डियोलौजिस्ट को बुला लूँ। फोन पर मेरा हाथ पहुँचता इससे पहले बीप से मेरी निगाह इ सी जी मॉनीटर पर गई थी...वो कौलैप्स हो रहा था....
फोन छोड़ सिस्टर को बुलाया। डोपामीन, डोब्यूटामीन...एवरीथिंग आई न्यू आई हैड़ टू गीव...और वह थोड़ा स्टेबल हुआ। डॉ सुब्रमणियम ने केस देखते ही रिकवरी पर शक जताया। अमेरिकन हॉस्पिटल से स्पेशलिस्ट बुलाये गये। बेगम बच्चों को अकेला छोड़ पास थी। ही नीडड हॉर्ट ट्राँसप्लांट......। कहाँ से होता यह सँभव....।
मेरी ड्यूटी थी हर बारह घंटे....
वह इंजीनियर था ....बुद्धिमान और समझदार... अपने रिपोर्ट वह समझता था....सब समझने के बावजूद उसे उम्मीद थी...मुझसे....
अपनी प्यारी सी मुस्कुराहट देकर पूछता....,"व्हाट मोर कैन यू डू फॉर मी डॉ...."
मैं बौखलाती... आशा के दो शब्द कहती...और वो मान लेता।
डॉ बेजी!वो जीना चाहता था। उसे अपने दर्द से शिकायत नहीं थी। एक ललक थी जिंदा रहने के लिए। जैसे जिंदगी से खूबसूरत और कोई चीज़ नहीं। वो हारा नहीं था...बेबस था....। और मैं उससे भी ज्यादा।
इट वॉस हिस ग्रेस ...इन पेइन ऐन्ड....ही वास अलाइव...ऐव्ड लव्ड एवरीथिंग ऐबाउट लाइफ.....
मुझे मालूम था जीवन और मृत्यु के बीच के आँखमिचौली का खेल बहुत देर नही चल सकता...पर मन नहीं मान रहा था। उसकी बेगम नमाज़ पढ़ती और मैं प्रार्थना करती। आई सो डेस्परैटली वान्टड ए मिरैकल...। मेरे हाथ में कुछ नहीं था....। और उसकी उम्मीद में कोई कमी नहीं थी। वो अब भी पूछ रहा था....,"थिंक ऑफ ऑल ऑप्शन्स...व्हाट मोर कैन यू डू फॉर मी...सेव मी डॉ...आई वाँट टू लिव...।"
तीन दिन...ई सी जी देखकर विश्वास करना मुश्किल था... अब भी वह जीवित था....हिस शीयर डिसायर टू स्टे अलाइव....
इ सी जी के बीप बीप अब बैकग्राउंड साउंड बन चुके थे। मेरी आँखे फिर भी लगातार उसके चेहरे और मौनीटर के बीच घूमती थी। ब्रैडिकार्डिया अगेन।
पर अचानक कुछ बदल गया था उसके चेहरे पर। बेगम को बुलाया था पास। प्रेयर रूम जाकर नमाज़ पढ़ने को कहा। मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया था....वही मुसकुराहट...पर बेरंग सी....
मेरे पास और दवाईयाँ जोड़ने के लिये नहीं थी। उसकी धड़कन लगातार कम हो रही थी। पहली बार मौत के लिए स्वीकृति देख रही थी। हार नहीं....एक विनीत सहमति....।
धड़कन कम होकर रुक गई। मेरी आगे की सब कोशिश नाकाम। वो जा चुका था।
उसका शरीर भूलता नहीं मुझसे.....देखते ही देखते फीका पड़ते पड़ते मोम हो गया जैसे.....ग्रीक गौड़ की मोम की मूर्ती हो जैसे...
सँभाला था उसकी बेगम को.... उसके जाते ही खुद को रोक नहीं पाई....फूट फूट कर रोई थी....
जीवन की हर इच्छा, हर सिद्धांत,अभिमान, अहंकार....मृत्यु के सामने कितने बौने पड़ जाते हैं...."
डॉ सुनीति की आँखे नम हो आई थी ...
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चाय खत्म हो गई थी...सिस्टर रिपोर्ट लेकर आई थी....और तभी पोन बजा था....
"डॉ सुनिति ,आई सी यू पेशियन्ट इस गोइंग इन ब्रैडिकार्डिया....."




7 comments:
when we know that the person before us couldn't survive any more and he says I want to live ...it's so painful to listen these words... jaise paighle shisehe kaan me pad rahe ho.n...!
Can understan Beji... ! it's untolerable. very sensitive post
shayad hum doctoron ka jeevan hi aisa hota hai ,hai na,iccu se patient zinda aaye tho hamari khushi kathikana nahi rehta aur mar jaye tho hamare andar bhi kuch mar sa jata hai kahi uske saath,hamari koshishe ya hamari sawedana.chahe jitna karein patient se ek bhavnik nata jud jata hai,jaise wo hamara rishtedar ho.the most horribal part i hate about my professionis when any patient dies on operation table,aisa lagta hai sab vyartha hai,hamari padhai sab kuch.bahut achha lekh raha.
रोज इन दर्दो से गुजर कर वापस यही लौटना .....ओर वही तटस्थता बनाये रखना .....शायद इसे ही डॉ का अनुभव कहते है ना !
बहुत अच्दी कहानी है।एक एक शाब्द से लगता है कि सब भोगी सच है। इतनी अच्छी कहानी के लिए पुन: बधाई
शायद इसीलिए कहा जाता है कि मृत्यु जीवन का सबसे बडा सत्य है।
maf kijiyega lekin agar doctor wakai itne sanvedansheel hein to unhe mera naman.
वर्षाजी,
संवेदनशील डॉक्टर,इंजीनियर या कवि होते हों ऐसा नहीं है....इंसान या तो संवेदनशील होता है या नहीं होता...और कई बार संवेदनाओं की भी एक कीमत चुकानी पड़ती है...और इसीलिए कई बार खो जाती है....
रोज़मर्रा की जिंदगी में ही हम संवेदना के कितने मौके गँवा देते हैं...।
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