
उर्वर ज़मीन....जिसकी कोख में कितने ही बीज निद्रा में डूबे हुए । नमी की बरसात में...प्यार पला ...नये बीज हवा में चले आये ,सोये बीज आँख मल कर उठे...अंकुर फूटे.....नये कोंपल....। गीली मिट्टी में नन्हे जड़ो ने पाँव रखे... बात बनी, भाव बने, याद बनी, साथ पले.....। नन्हे अंकुर पौधे बने....वे बड़े...फूल खिले...। धीरे धीरे पेड़ों की छाया....सपनों के घोंसले...छनी धूप और लंबे होते साये। एक जंगल पनप गया। घास, झाड़, झुरमुट ...जंगली फूल...बूढ़े बरगद...। ज़मीन जिंदा हो रही थी जंगल की नब्ज़ में....और आसमान में छूट रहे थे कितने अरमान सपनों के घोंसले से.....। गीली ज़मीन के सीने में जड़ें उतर रही थी। और लगातार रेखायें उभर रही थी। गहराती जड़ों के गहराते अहसास जंगल को संकल्प दे रहे थे...एक जिजीविशा ...एक जिद...जिंदा होने के लिए...। मिट्टी जड़ों के नीचे कतार लगा कर खड़ी थी...जड़ों को पकड़ जिंदगी बन जाने के लिए.....।
जंगल का ...उसमें रह रहे हरियाली का, घोंसलों का, सपनों का,बात का ,भाव का, याद का....सबकी अपनी एक आयु थी....जिसे भोग लेने के बाद उन्हे बीत जाना था....पर गीली मिट्टी पर उभरे निशान समय के साथ गहरे हो रहे थे....
मिट्टी जीवन के बीज सहेज रही थी....उसे इंसान बना रही थी....
ताकि फिर नमी के आने पर एक जंगल खड़ा कर सके.....




4 comments:
Bahut accha likha hai.
'...उसे इंसान बना रही थी,..'कितनी हरियाली है इस प्रक्रिया में । और ताजगी भी ।
बेहतरीन तहरीर है...
सुंदर भाव और सुंदर अभिव्यक्ति .
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