Tuesday, September 16, 2008

टू टाई और नॉट टू टाई...

पश्चिमी संस्कृति की बहुत सी बातें हैं जो हमने गाँठ बाँध ली है,लेकिन टाई का जवाब नहीं। स्कूल के बच्चों से लेकर दूल्हे के गले पर...फिर स्मार्ट एक्सीक्यूटिव से लेकर न्यूस रीडर तक...टाई बिल्कुल गरदन के करीब है। हो सकता है अजित जी टाई का सफर ढूँढ़ निकाले....पर खुद टाई से सफर करने वालों की सँख्या में लगातार बढ़ौतरी हो रही है। इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की फर्स्ट एड़ की किताबों में पहली लाईन...."लूसन द टाई" हो गई है। सोचो तो यह कोई साजिश का हिस्सा लगती है। उन्मुक्त,जंगली को पालतू बनाने की साजिश। जैसे कोई पट्टा जो बता सके वो किसका वफादार है। किस स्कूल का, किसका पति,किसका मुलाजिम.....टाई एक स्टेटमेंट है। टाई एक गिफ्ट रैपर के ऊपर बाँधे 'बो' जैसा है। टाई बाँधना एक कला है। ऐसी कला जो अगर ठीक से सीख ली गई तो यह खुद इस बात का प्रमाण है की आप सिखाये जा सकते हैं। जो इंसान ऐसी प्रामाणिक बँदिशे कबूल करे वो बाँधा जा सकता है। चाहे किसी का कोई भी 'टेक' हो यह ऐसी रस्सी सी है जिसका सिरा खींच दो तो इसे पहनने वाला माथा ठेक लेता है। त्री पीस सूट और स्मार्ट टाई में खड़े जेन्टल मैन की टाई को ज़रा ध्यान से देखिये... एक पूरी सभ्यता के सही गलत नियमों का इस्तेमाल कर तह कर रखी गठरी पर बाँधी गाँठ सी दिखेगी। स्कार्फ से शुरु हुई बात आज बहुत आगे बढ़ गई है। कहाँ यह ठंड से बचाती थी और कहाँ इसे पहनते पहनते पसीने छूट जाते हैं। मैं झूट नहीं बोल रही....ज़रा भी इंटरनेट पर तहकीकात करिये...आपको आश्चर्य होगा की इस समस्या का अनुपात क्या है...यह समस्या साक्षात क्या है....। दिस नॉट इस नॉट गुड़।

http://www.youtube.com/watch?v=9T6xBfq77hg


हम भारतीय हैं....हमने पगड़ी पहनना छोड़ दिया, टोपी उतार दी...धोती दूर की...कुर्ता पायजामा सब कैश्युल और एतनीक...और फिर ड़ाला है गले में फंदा.....

चलो कोई तो जगह है जहाँ नेता सही ट्रेंड सेट कर रहे हैं....टाई नहीं शौल पहन रहे हैं....

चलो कोई नहीं...टाई हैस टू भी टाइड़...बट....ऐसा नहीं हो सकता की कम से कम "इन सपोर्ट ऑफ कॉसस लीडिंग टू सूसाइड्स ड्यू टू हैगिंग" जैसा कोई स्लोगन ही एन्डौर्स कर लें....

अंटिल इट हैपन्स...स्टे टाइड

5 comments:

vijay gaur/विजय गौड़ said...

गांठ बांध ली गयी टाई का किस्सा दिलचस्प लगा। पसंद आया।

सचिन मिश्रा said...

Bahut accha laga.

Neeraj Rohilla said...

वाह कई पुरानी यादें ताजा हो गयी,

कालेज में कैम्पस सेलेक्सन, सेमिनार और प्रोजेक्ट डेमो के समय बहुत से लोग आते थे टाई बंधवाने :-)

फ़िर किसी भी शादी में जा कर देख लीजिये, अगर आपको अच्छी टाई बांधनी आती है तो आपकी बडी डिमांड है, बिल्कुल एक सेलिब्रिटी की तरह :-)

चाय, कोला, समोसा सब हाजिर है बैठे ही, बस आप टाई बांधते रहें बैठकर :-)

Shastri said...

अपन ने तो कक्षा 10 पास करते ही टाई से अलविदा कह दिया था. शादी पर लोगों ने फिर पहनाया तो आगे के लिये शर्ट त्याग कर कुर्ते पर आ गये. अब देखते हैं कि टाई से झगडना पडेगा क्या!!



-- शास्त्री

-- समय पर प्रोत्साहन मिले तो मिट्टी का घरोंदा भी आसमान छू सकता है. कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर उनको प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)

Udan Tashtari said...

बढ़िया-दिलचस्प!