Sunday, September 7, 2008

अपेक्षा


उस दिन भी माँ ने टोका था। दिनभर गलियों में घूमना अच्छी बात नहीं है। छोटी सी बिना बाँह की फ्रॉक पहन मैं माँ की बात अनसुना कर फुदक कर बाहर भागी थी। रस्सी कूदते कूदते अपने दोस्त के घर। पता नहीं माँ को मेरे दोस्तों से क्या परेशानी थी। होमवर्क, क्लासवर्क सब स्कूल में ही कर लेती थी। पर माँ चिढ़ कर कहती....कहीं भी जाकर पसर जाना अच्छी बात नहीं। कहीं भी कहाँ जा रही थी। दोस्त के पास....मैने उसकी कलाई पर चूढ़ी तोड़कर दोस्ती पक्की करने की रस्म निभाई थी। माँ कहाँ समझेगी। मैने आजतक उनकी किसी सहेली को दोस्त सा नहीं पाया था। व्यवहारिक रिश्ते...। जहाँ मुस्कुराना, बतियाना, मिलना मिलाना सब किसी आफत के समय की तैयारी के लिए । ऐसा नहीं था की मुसीबत के समय यह रिश्ते एक दूसरे के काम नहीं आते थे। लेकिन इनकी नींव अपेक्षा थी। कहाँ माँ समझती मेरे मासूम अपेक्षारहित रिश्ते।

दोस्तों के साथ सब भूल जाती थी । बस याद रहता था तो वह समय। औरों के लिए बहुत तेज़ी से गुजरता हुआ मेरे लिए ठहर जाता था। इमली में थोड़ा सा नमक लगाकर एक हाथ में पकड़ चाटते हुए ....दूसरे हाथ से इमली के कटे बीज से अपनी पारी चलती।

याद है उस दिन अचानक से वह चुप हो गई थी। जैसे आराम से आल्ती पाल्ती मारकर बैठी बैठी ही वो सावधान हो गई हो। उसने अपनी फ्रॉक घुटनों के नीचे की थी। उन्मक्त सी उसकी हँसी के जैसे अचानक पर काट दिये हों।

किसी के पास होने का आभास होने पर मैं मुड़ी थी। शायद उसकी दादी थी।

सफेद साड़ी, चश्मा जिसमें से दो काले धागे पीछे जा रहे थे। पता नहीं मुझे क्यों बैल याद आ रहे थे...ऐसा बैल जिसका आक्रोश नाक से गुजरे रस्सियों के हाथ में लगाम सा था।

उनकी नज़र चुभ रही थी। मैं महसूस कर सकती थी...पहले चेहरे पर...फिर फ्रॉक पर....मेरे बालों में लगा रिबन खुला हुआ था। हाथ...हाथ चिपचिपे थे...इमली...और नमक। चप्पल तो घर में ही छूट गई थी। उनकी नज़र मेरे पैरों पर आकर रुक गई थी। मिट्टी से सने पैर....कुछ धूल मेरे आसपास थी।

वो कोई अलग भाषा में बहुत धीरे लेकिन बहुत साफ तरीके से कुछ बोली थी। अजीब बात थी... पहली बार ही मैने यह भाषा सुनी थी। सुनी भी और अनसुना भी नहीं कर सकी। बल्कि वह गूँज रही थी। अपनी दोस्त की तरफ देखा था। पर एक अजीब सा परायापन उसकी आँखों में उतर रहा था। उसने क्या कहा मुझे नहीं सुनाई दिया। अपनी रस्सी पकड़ ज़ोर से उठकर भागी थी। जैसे मैं उस भाषा, नज़र को पीछे छोड़ देना चाहती थी।

माँ बाहर ही खड़ी मिल गई थी। क्या हुआ पूछा था। पर मुझे खुद पता नहीं था हुआ क्या। मैं रो रही थी....सुबककर...माँ पूछ रही थी कुछ कहा तुम्हारी दोस्त ने....

मैं समझ नहीं पा रही थी की उसने कुछ कहा क्यों नहीं......

8 comments:

अफ़लातून said...

गजब

Ajay said...

It was a chance that I visited ur blog. And my visit has not been wasted....
Really, it is very well written.
Keep writing....

Udan Tashtari said...

कहानी जब खत्म हुई-एक आह सी निकल गई-और कहानी.......लगा-जैसे अब शुरु हुई है!!!

-झंकझोर देने वाला लेखन!!!! क्या बात है!

संगीता पुरी said...

पढ़ लिया .... क्या कहूं.....शब्द नहीं हैं मेरे पास !

Dr. Amar Jyoti said...

सोचने को विवश करता है आपका सँस्मरण्।

मीनाक्षी said...

गज़ब ही नही...अजब भी... बचपन की ऐसी याद आजतक ज़िन्दा...!!

विक्रांत बेशर्मा said...

बहुत अच्छी पोस्ट है!!!!!! आपने अपने संस्मरण में जीवन दाल दिया !!!!!!

अनूप भार्गव said...

सुन्दर , इमानदार चित्रण....