Monday, August 11, 2008

कल के साथ कल...कुछ पल

पापा की कितनी बाते
बिलकुल दादा जैसी है
वो जब मुझसे मिलते हैं
पापा जैसे लगते हैं.....






दादी के थके चेहरे से
ऐसे स्नेह उमड़ता है
मुझे देखकर उनकी आँखों में
सपना सा कुछ उगता है





मेरे नाना
सब बदमाशी समझते हैं
रंगे हाथ पकड़ कर मुझको
बस मन ही मन हँसते हैं


मामा और अम्मा के झगड़े
रूठे मनते किस्से सपने
कहाँ रूठना कहाँ मनाना
नानी से मैने जाना है




मुझे निहारो
मुझे सहेजो....
उँगली पकड़
रास्ता दिखा दो



गोदी बिठाकर
मुझे तुम सँभालो
मैं अंकुर हूँ...
तुम जड़ो का सहारा



तेरी झुर्रियों में
मेरे कल का
नक्शा...
छिपा है...

5 comments:

ghughuti said...

बहुत सुन्दर! आपके गाँव के फोटो भी देखे थे, टिप्पणी नहीं कर पाई थी। आपका गाँव बहुत सुन्दर है। कभी अवसर लगा तो केरल जाऊँगी।
घुघूती बासूती

Advocate Rashmi saurana said...

bhut sundar parichy diya hai. badhai ho.

दिनेशराय द्विवेदी said...

फिर चित्र काव्य। बधाई।

neelima sukhija arora said...

bahut sundar, aapka gaon bhi bahut sundar hai aur parivar usse bhi pyara.

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा, क्या बात है!आनन्द आ गया.नाना नानी, दादा दादी सबकी याद हो आई.