पापा की कितनी बातेबिलकुल दादा जैसी है
वो जब मुझसे मिलते हैं
पापा जैसे लगते हैं.....
दादी के थके चेहरे से
ऐसे स्नेह उमड़ता है
मुझे देखकर उनकी आँखों में
सपना सा कुछ उगता है
मेरे नाना
सब बदमाशी समझते हैं
रंगे हाथ पकड़ कर मुझको
बस मन ही मन हँसते हैं
मामा और अम्मा के झगड़ेरूठे मनते किस्से सपने
कहाँ रूठना कहाँ मनाना
नानी से मैने जाना है
मुझे निहारो
मुझे सहेजो....
उँगली पकड़
रास्ता दिखा दो
गोदी बिठाकरमुझे तुम सँभालो
मैं अंकुर हूँ...
तुम जड़ो का सहारा
तेरी झुर्रियों में
मेरे कल का
नक्शा...
छिपा है...




5 comments:
बहुत सुन्दर! आपके गाँव के फोटो भी देखे थे, टिप्पणी नहीं कर पाई थी। आपका गाँव बहुत सुन्दर है। कभी अवसर लगा तो केरल जाऊँगी।
घुघूती बासूती
bhut sundar parichy diya hai. badhai ho.
फिर चित्र काव्य। बधाई।
bahut sundar, aapka gaon bhi bahut sundar hai aur parivar usse bhi pyara.
बहुत उम्दा, क्या बात है!आनन्द आ गया.नाना नानी, दादा दादी सबकी याद हो आई.
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