यहाँ की मिट्टी
में गूंदी
नूर के बूंद
सी है

नदि के किनारे
घने पेड़ों के साये
.......
कहीं कमल भी
खिले थे
.....
किस्से कहानी
नाव में सवार
इसी किनारे से
कई बार चले थे

यूँ लगता है
इन पेड़ों के पीछे
वे साथी छिपे हैं
जो बचपन की पगडंडियों
में मिले थे

बिजली की तारों पर
बैठा बुलाता
कोई शगुन अच्छा
बतला रहा था

बचपन की तस्वीर
फिर जिन्दा हुई है
बच्चों तुम्हारी
नादानियों में

मेरा आँगन मेरे
गाँव में है खुलता
वहाँ वह
बाँह खोले खड़ा है

दीवार फाँद
रौशनी के
जतन में

बिजली के खँबें से भी
जीवन
लिपटा
खड़ा है

चूल्हे की तपिश से पहले की सुस्ति

पुरानी लकड़ी
पर नये मशरूम

जड़ों में अरवी
छिपा कर रखी है

ग्रेपफ्रूट से लदा हुआ
....उर्वर.

कैसे बड़ा होता है पपीता...

पहाड़ो के ऊपर....

चट्टान से सटकर खड़ा हूँ

ये रास्ते

ये पहाड़ी हवायें

मेंढक ने अपने
अंडे दिये हैं



छोटी छोटी यादें
बन रही है
मासूम मन में

मुर्गी के पीछे

सुपारी का पेड़

गीली हवायें

नाचती बूंदें

काली मिर्च की बेल...
ऊपर पहुँचने की जल्दी है..

कुआँ

घिरनी

गहराता अहसास

छना आसमान

नहर..

बहता पानी

काई...
जिंदगी...हर जगह

आसमाँ को....

...ढकते हुए...

...हरे पत्ते...

पेड़ की गोदी में
नारियल

मेरा गाँव

बूंदें यहाँ
हवा पर झूलें...
जिंदगी हर जगह
आँखें खोले...
मेरा गांव...
माँ की छाँव....




16 comments:
bejod mel hai shabdon aur chitron ka.adbhut rachna
बहुत प्यारा है यह गाँव ।
बहुत ही सुन्दर प्यारा सा गाँव हैं। आपका मन मोह लिया। केरला जाने का बड़ा मन होता है । पर कभी जा नही सका।
बूंदें यहाँ
हवा पर झूलें...
जिंदगी हर जगह
आँखें खोले...
मेरा गांव...
माँ की छाँव....
बहुत उम्दा लिखा ।
मेरे सपनो का गाँव ठीक ऐसा ही है..काश सपने मे ही पंछी बन उस गाँव का एक फेरा लगा आऊँ...:)
बहुत सुन्दर है आपका गांव
अन्तरजाल पर एक नई विधा खोज दी है, आप ने। चित्र-काव्य।
आप का चित्र-काव्य पसंद आया।
सुन्दरम्! शिवम् ! सत्यम्!
इसे देख लगता है जीवन शाश्वत है वह भी सदा से था और सदा ही रहेगा। जीवन खुदा भी है।
bahut hi sundar beji...apni mitti ki mehek mil jaaye aur kya chahiye......
Beautiful. Simply beautiful.
sab kuch sahej laayin na aap?? bahut acchha kiya:)
What an idyallic, lyrical post of an almost paradise like village of our Bharat -
Beautiful Beji :)
Lovely post !
खूब - चित-पट चित्रपट
बड़े ही मनोरम चित्र और सुन्दर कमेन्ट्री. आनन्द आ गया. कौन सा गाँव है?
एक गाँव जो मेरे भीतर भी बसा है.....आप का जवाब नही...जिस तरह से आपने महसूस किया ...ऐसा लगा शायद हर किसी को लगा आप उनकी कहानी कह रही है ......तभी तो हम आपके बड़े फैन है जी.......
यूँ लगता है
इन पेड़ों के पीछे
वे साथी छिपे हैं
जो बचपन की पगडंडियों
में मिले थे
बहुत खूब । वाह कितने सुन्दर और विशिष्ट ढ़ंग से आपने अपने गाँव की सैर करवाई। मुझे तो लगा मैने भी गाँव की सैर कर ली। बहुत-बहुत बधाई।
बेजी आप और आपका गांव बेजोड़ हैं। किसी गांव को ऐसी कविता मिल जाए तो वह कविता ही हो जाए।
ek gaon saakar ho utha aankhon ke saamne....
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