
एक सिरे पर सुलगी हुई चिंगारी को आग समझ कई बार कश लेता रहा। उसे लगता था जैसे थोड़ी सी आग साँसों को गरम कर दिल के भीतर बहते सैलाब को तपा कर,जला कर खाक कर देगी। आग को पीकर, घुँए को बाहर फेंकते हुए यूँ ही महसूस करता जैसे कब से गीली उसकी रूह धीरेधीरे सँभल रही है...अपना पूर्वाकार पा रही है...।
पर यह सिगरेट भी कागज़ के टुकड़े में बंद आग के छलावे के सिवा कुछ ना था...। जिस में नशा था, भटकाव था,बहक थी....गर्मी नहीं थी...सुकून नहीं था।




10 comments:
उलझी हुई बात का अंदाज़ भी खूब है
सिगरेट भले ही छलावा हो , भीगी रूह का पूर्वाकार पाना तो छलावा न रहा होगा ।
सहमत
aflaatoon ji ne bhi kya baat kahi hai.. :)
आदमी अब चैन से सिगरेट भी न पिये? क्या पिये? एक लिस्ट तैयार करके आप डालियेगा?
आखिर किसी को कब मह्सूस होगा कि ये सिर्फ़ आग का छलावा है और कुछ नहीं.... नशा है, भटकाव है.. सुकून नहीं?
u better stay away from manly pursuits. If it creates problem in ur personal life kindly settle it there only . one has to be mature to appreciate good things in life . over indulgence , ofcourse, cant be advocated, but please let me have my puff.
कई बार कोशिश की सिगरेट से नेह लगाने की पर बदबू बहुत आती है।
वाह...क्या सोच है...क्या बात है...बहुत खूब.
नीरज
ऐसा ही है [याने छलावा]-welcome back doc saab - manish
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