थोड़ी देर की छुट्टी लेकर निकली। जून का महीना वैसे तो दुबई मे सबसे गर्म नहीं होता। पर दस बजे की सूरज की किरणे झुलसाने की जिद पर सी थी। कार की स्टियरिंग तपी हुई थी। हाथ में एक काला ऑफिस बैग था। मैं इस बैग को कम ही इस्तेमाल करती हूँ। छोटे बड़े खानों वाले इस बैग को जैसन हमेशा सहेज सँभाल कर रखते हैं। एक पेन, पेन्सिल, कुछ सफेद कागज़,पासपोर्ट, आइडेन्टीफिकेशन के लिये कुछ बाकी डॉक्यूमेन्टस। मेरे हाथ में मुझे ही यह बैग काफी अजीब सा लग रहा था। पर आज शायद जरूरत थी।
हाउस कॉन्ट्रैकट रेन्यूअल एक झंझट बना काम बनता जा रहा है। प्रापर्टी लॉ मे नये नये लॉ ऐड़ हो रहे हैं....आखिरी वाले के अनुसार पाँच प्रतिशत से ज्यादा रेंट किसी साल में बढ़ाया नहीं जा सकता। दो तीन दिन रियल एस्टेट के मैनेजर से बात करने पर इतना अंदाज़ा तो लग ही गया की बात इतनी आसानी से नहीं बनेगी। वह जो रेंट की डिमांड रख रहा था पूरी 50 परसेंट ज्यादा थी।
कार को एक शॉपिंग मॉल की पार्किंग में छोड़ा। आगे टैक्सी से जाने का इरादा था। ऑफिस डेरा के नैफ सूक़ के पास था। संकरी गलियाँ, लोग , दुकानों और गाड़ियों का मेला सा लगा रहता है वहाँ...। दुबई का असली बंबई यहाँ है।
दो टैक्सी वालों ने मेरा होना नज़रअंदाज किया। तीसरे को शायद तरस आया और वो रुक गया।
कैम्री के स्टियरिंग व्हील के पीछे दुबई ट्राँसपोर्ट की यूनिफॉर्म पहने एक लँबा चौड़ा सुरूप नौजवान पठान था।
“किदर जायेगी...हम पहले ही बोलता है इस समय शारजाह नहीं जायेगा...।”
“नहीं डेरा सूक़”
“रहम करो मैडम...उधर चला गया तो वापस कैसे आयेगा?”
मैं बेचारी नज़रों से देख रही थी.....शायद इसका दिल पसीज जाये....
“लड़की लोगों को कैसा मना करेगा...चलो बैठो... ”
मेरे बैठते ही रेड़ियो चैनल 89.1 पर किया। खुद कुछ गुनगुनाता रहा...। मैं भी सोचने लगी किस तरह मैनेजर से बात करनी है। जैसन ने कहा था व्यवहार कुशलता से अपनी बात मनवा कर आना। नियम का पालन करवाने के लिये व्यवहार कुशलता की जरूरत मेरी समझ से बाहर थी। काम पर वापस भी पहुँचना था। पता नहीं आते समय कोई टैक्सी मिलेगी या नहीं...।
“तुम इंडिया का है....?”
“हाँ”
“क्या टेंशन है?”
“कुछ नहीं”
“इंडिया में किदर?”
“केरल”
“लगता नहीं है...तुम उर्दू साफ बोलता है...”
“हम्म”
“नैफ सूक़ मे कहाँ जाने का?”
“अल मनल शापिंग सेंटर”
“रास्ता मालूम ?”
“नहीं!!...आपको नहीं पता?!!!”
"फिर टेंशन”
“मुझे थोड़ी जल्दी थी”
“तुमको होगा....जिंदगी को कोई जल्दी नहीं है…
तुम कुछ जरूरी काम करने को जाता है। तो टेंशन नहीं करने का। टेंशन करेगा तो सब गड़ बड़ हो जायेगा। सोचो सीट का लेदर फट गया। मैं सोचेगा कि फट गया। अब कोई हाथ रखेगा... और फटेगा। फिर पूरा फट जायेगा। तो क्या होगा फट जायेगा ना?”
चौढ़ा माथा,साफ चेहरा, उभरे नाक नक्श,शालीन सी दाढीं और मूँछ ....एक मुस्कुराहट जैसे चेहरे पर स्थाई रूप से रहती हो....
उसकी गहरी हँसी से मेरा ध्यान टूटा
“अभी सोचो जैसा मैं बोलता। थोड़ा फटा है। आज काम खत्म कर के पकड़ के सिल देगा। सिलेगा ऐसा ही धागा से। दिखेगा भी नहीं। बस किसी कू पता नहीं चलेगा।
ठीक हो जायेगा ना मैड़म....?”
“हम्म”
“होगा ही....सब दिमाग में है। दिमाग ठीक है तो सब ठीक होगा।“
“हम्म”
“अभी कुछ दिन पहले एक आदमी हमारा गाड़ी मे बैठा । हम कुछ भी बोलता वो बोलता हम्म । हँसता नहीं , मुस्कुराता नहीं। हम ने बोला तुम बहुत अच्छा आदमी है। वो बोला हम्म। बोला पाकिस्तानी बहुत खराब होता है। वो बोला हम्म। हम बोला इंडिया वाले जितना नहीं। वो बोला हम्म। हमकू अच्छा नहीं लगा हमने बोला तुम कैसा आदमी है। वो बोला हम्म। हम हाथ जोड़ा और बोला तुम सच्ची का महान आदमी है।”
मेरी हँसी छूट गई।
“ऐसा ना मैडम। जिंदगी का क्या पता ...आज है....कल नहीं...जब हँस सकती हँसने का....”
“तुम पाकिस्तान से हो?”
वह हँसा..., “हाँ...डर गया?”
“नहीं तो!”
“हम पाकिस्तान का पठान है। हमकू आसान काम अच्छा नहीं लगता। जैसा गाड़ी चलाना, नौकरी करना....”
“फिर?”
“मुश्किल काम पसंद है....कोई वो काम नहीं करेगा तो हम करेगा....”
“अच्छा?”
“हां!....बम फोड़ेगा, आदमी मारेगा, लूटेगा...बम बन जायेगा...।”
“अरे नहीं....!!”
“नहीं जैसा कुछ नहीं मैडम.... बात क्या है उससे हमको कोई मतलब नहीं है....काम मुश्किल है तो हम करेगा....लूटने मारने का काम मुश्किल होता है
और पठान के पास दिमाग कम होता है बस पाँच परसेंट...”
“काफी है ना....वैसे भी बहुत कम लोग पाँच परसेंट दिमाग इस्तेमाल करते हैं...”
“कैसा मैडम है तुम....?!!”
अचानक ही गँभीर मुद्रा में आ गया
“अभी हँस के बात कर रहा है। गाड़ी साइड में कर के एक मारेगा। तुम्हारा काला बैग लेकर भाग जायेगा। तुमको लगता है नहीं करेगा?!”
एक पल के लिये मैं सहमी...उसने तुरंत भाँप लिया और हँसने लगा....एक ठहरी ठहरी सी गहरी हँसी
“तुम डर गया मैडम?”
“नहीं तो!”“
नहीं डरा तो डरो....अभी ज़माना ऐसा है। सब डरता है। इंडिया वाला पाकिस्तान से डरता है, पाकिस्तान खुद का लोगों से, शौहर बीवी से डरता है, बीवी बच्चा से डरता है.... और बच्चा बम से डरता है, पिस्तौल से डरता है....इंसान से डरता है.....
पर टेंशन नहीं करने का...
अभी देखो...जिंदगी मे सबको टेंशन है। हमकू है,तुमको है....। तुम हमारा गाड़ी मे बैठता और हम हमारा टेंशन भूल जाता। तुम्हारा टेंशन हमारा सर पर। कितना लोग बैठता । कितना टेंशन हम ले सकता। लोग ऐसा बैठता है जैसा मातम मनाता है। किस लिये। इंसान को इंसान दिखता नहीं....सबको मशीन समझता है...”
“बच्चे हैं आपके?”
“है ना....बच्चा है...बीवी है...माँ बाप है....लेकिन हम उनको दो साल मे तीस दिन के लिये मिलता.....आप लोगों को रोज़ मिलता...आपको टेंशन कम हमकू भी कम....
एक आदमी टेंशन करता ,उसका टेंशन सबको मिलता...हँसता वह भी सबको मिलता...दुनिया अच्छा नहीं है...पर इतना तो है कि हम पाकिस्तान का कम अक्कल पठान है फिर भी तुम्हारा बैग नहीं लिया......”
मैं अब सहजता से मुस्कुराने लगी थी
“तो नो टेंशन....आपका जगह आ गया....अभी हँसा ना ऐसा हँस कर बात करना...सब ठीक हो जायेगा।
अल्लाह हाफिज़”
बैग सँभाल कर उतरी और पता नहीं क्यूँ लग रहा था कि कॉन्ट्रेक्ट रैन्यूवल में दिक्कत नहीं आयेगी।
Tuesday, June 24, 2008
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14 comments:
ठीक ही कहा उस टॅक्सी ड्राइवर ने इंसान.. अब इंसान से ही डरने लग गया है
नो टेन्शन, अच्छा दर्शन है।
असल बात बतायी ही नहीं? कांट्रेक्ट रेन्यूअल का क्या हुआ?
बहुत सही कहा उसने..
टेंसन नहीं लेने का.. :)
प्रमोद जी,
मुस्कुराते मुस्कुराते और व्यवहार कुशलता का असर इतना हुआ की रेंट 8 प्रतिशत बढ़ा....मैं मुस्कुराते हुए ही 5 पर अड़ी थी...पर महसूस हुआ कोर्ट तक जाना होगा और शायद फ्लैट छोड़ना भी पड़े....मुस्कुराते हुए मान कर लौटने लगी तो मैनेजर ने जो कि सिरिया से है , अचानक अपने कंपनी का नया लोगो सामने कर के पूछा कैसा है.....अच्छा है...अल्लाह हाफिज़ कहते हुए सोच रही थी लोग इतने बुरे भी नहीं हैं.....नो टेंशन
सच्ची कहूं बेजी जी..
आपका ये सारा पोस्ट एक तरफ और आपका ये कमेंट एक तरफ..
सच में लोग इतने बुरे भी नहीं होते हैं.. :)
....सोच रही थी लोग इतने बुरे भी नहीं हैं.....नो टेंशन
“कैसा मैडम है तुम....?!!”
“अभी हँस के बात कर रहा है।तो तुमको लगता है बुरा नईं है.. अभी बेनामी बनके तुमको गाली दे के भाग जाएगा तुमको लगता है नहीं करेगा?!”
हा हा हा
नई करेगा...टेंशन नहीं करने का...बिलकुल नहीं।
बहुत दिनोँ के बाद आपने यादोँ को बँटा - बडा अच्छा लगा बेजी जी -
वहाँ की और बातेँ भी लिखियेगा, दीलचस्प लगतीँ हैँ दूर देस की बातेँ
स स्नेह्,
-लावण्या
जब भाग्य से ऐसा दार्शनिक ड्राइवर मिला तो काम तो होना ही था। वैसे साऊदी अरब में हमें भी सहायता करने को सदा सामने आने वाले बहुत से पाकिस्तानी मिले थे।
घुघूती बासूती
dilchasp laga aapka ye waakya..agli post ka intzar rahega.
khuda aapki khvahisho ko pura kare......Aameen...
हम तो पढ़ कर मुस्कुरा रहे हैं.. एकदम वही भाषा जैसी पुरानी हिन्दी फिल्मों में पठान बोला करते थे।
:)
जब ड्राइविंग नही सीखी थी, टैक्सी ही एक मात्र सहारा था इधर उधर जाने का.. ,,,, एक साल तक टैक्सी राइड के हमारे भी कई अनुभव हैं जो सबसे कीमती हैं....
सही ही तो है-नो टेंशन. उससे क्या होने जाने वाला है..वाकई लोग उतने बुरे भी नहीं होते, सो अगेन-नो टेंशन.
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