Wednesday, June 18, 2008

बदल सकेगा आदर्श ?!

अबोध गुस्से में था। अनुभव हमेशा ही धीर गँभीर तरीके से उसकी हर बात का खण्डन कर देता। जहाँ अबोध हर नये पल को जिज्ञासा और रुचि से देखता, अनुभव हर नये पल को किसी पुरानी सिनेमा की रील की तरह । अनुभव को आगे आने वाले सीन की हर बात मालूम थी। किसी पिक्चर को बार बार देख कर जैसे उसके नायक नायिका का हर डायलॉग, उनके कपड़े, जगह सब याद हो जाते हैं। अनुभव ऐसा कब और क्यों हो गया अबोध को नहीं पता था। अबोध नये नये लम्हे की पहचान ढूँढने से पहले उसपर पहचान थोप देने के खिलाफ था। अनुभव अबोध की हर बात के सामने विवेक का कार्ड पलट देता। इससे बेहतर जवाबी कार्ड अबोध के पास नहीं था। आदर्श थोड़ी दूर से अबोध और अनुभव को देख रहा था। सोच रहा था काश अबोध कभी ना बदले। पर उसे याद था वह समय जब अनुभव भी अबोध था....। कितना रोया था अनुभव, हठ करके अपनी बात मनवानी चाही थी.....फिर अड़ गया था....पर कहाँ टिक सका था आदर्श के सामने....।
और ज्ञान से विवेक बनाने के यत्न में अनुभव अपनी सरलता खो आया था।

आदर्श दुआ माँग रहा था कोई उसे भी थोड़ा बदल दे। इससे पहले कि अनुभव विवेक का बोझ अबोध के कँधों पर रख उसे भी अपने जैसा बना दे...।

5 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

excellent!! बहुत ही बढ़िया

PD said...

अच्छा लिखा है आपने..

Advocate Rashmi saurana said...

bhut hi aacha.likhati rhe.

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने पूरा बीजगणित का सवाल परस दिया ठीक 'लीलावती' (भास्कराचार्य की गणित की पुस्तक) की तरह।

Udan Tashtari said...

इससे पहले कि अनुभव विवेक का बोझ अबोध के कँधों पर रख उसे भी अपने जैसा बना दे...।

--बहुत बढ़िया पीस-पूरा दर्शन है. बधाई.