ऐसी शाम इससे पहले भी आई है। जैसे किसी गुजरी सी शाम का दुहराव हो। हर बात , हर राज़ यहाँ कुछ पहचाना सा। यहाँ की गलियाँ भी पुरानी सी। कोई बात होने वाली है। ऐसा ही मन बार बार कहता है। एक लम्हे का सिरा पकड़ सरकते हैं और छूटने पर भी बात खामोश रहती है।
तपा हुआ बरसात को तरसता हुआ। लम्हा यूँ ही खिसकता हुआ।
तभी जानी पहचानी पुरानी वह चीज़ दिखती है......वही चिंगारी जिसने कभी आग नहीं पकड़ी है।
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7 comments:
आप हर वक्त इतना दार्शनिक क्यों कर रहती हैं? ...या रह सकती है? कमाल है! थोड़ा शवासन किया कीजिये.
मोटा पेट होने की वजह से मैं हमेशा इस आसन में रहा करता हूँ.
चिंगारी ही रहे तो बेहतर है। उसे कुरेदा जा सकता है, ढका जा सकता है , दबाया जा सकता है। शोला बनी तो ये तो पक्का है कि कहानी को खत्म होना है..... और कहानी का खत्म होना भला किसे अच्छा लगता है....
वाह!! अजदकी पोस्ट टाईप लगी. दो बार नाम चेक किया कि बेजी के ब्लॉग पर हैं या अजदक पर. :)
गहरी बात है.
क्या बात है. वाह !
......वही चिंगारी जिसने कभी आग नहीं पकड़ी है।
बहुत ख़ूब.
बेजी बहुत सी बातें है जो कहना चाह रही हैं पर जो कह रही हैं वो शायद कहना नहीं चाहती
aap kuch hi lines mein bahut kuch kah deti hain...very nice.
आपकी बातों में जो दार्शनिकता का पुट है, वह कविता की सुन्दरता बढा देता है।
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