Thursday, May 15, 2008

डेजा वू

ऐसी शाम इससे पहले भी आई है। जैसे किसी गुजरी सी शाम का दुहराव हो। हर बात , हर राज़ यहाँ कुछ पहचाना सा। यहाँ की गलियाँ भी पुरानी सी। कोई बात होने वाली है। ऐसा ही मन बार बार कहता है। एक लम्हे का सिरा पकड़ सरकते हैं और छूटने पर भी बात खामोश रहती है।
तपा हुआ बरसात को तरसता हुआ। लम्हा यूँ ही खिसकता हुआ।

तभी जानी पहचानी पुरानी वह चीज़ दिखती है......वही चिंगारी जिसने कभी आग नहीं पकड़ी है।

7 comments:

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

आप हर वक्त इतना दार्शनिक क्यों कर रहती हैं? ...या रह सकती है? कमाल है! थोड़ा शवासन किया कीजिये.
मोटा पेट होने की वजह से मैं हमेशा इस आसन में रहा करता हूँ.

अजित वडनेरकर said...

चिंगारी ही रहे तो बेहतर है। उसे कुरेदा जा सकता है, ढका जा सकता है , दबाया जा सकता है। शोला बनी तो ये तो पक्का है कि कहानी को खत्म होना है..... और कहानी का खत्म होना भला किसे अच्छा लगता है....

Udan Tashtari said...

वाह!! अजदकी पोस्ट टाईप लगी. दो बार नाम चेक किया कि बेजी के ब्लॉग पर हैं या अजदक पर. :)

गहरी बात है.

मीत said...

क्या बात है. वाह !
......वही चिंगारी जिसने कभी आग नहीं पकड़ी है।
बहुत ख़ूब.

neelima sukhija arora said...

बेजी बहुत सी बातें है जो कहना चाह रही हैं पर जो कह रही हैं वो शायद कहना नहीं चाहती

pallavi trivedi said...

aap kuch hi lines mein bahut kuch kah deti hain...very nice.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपकी बातों में जो दार्शनिकता का पुट है, वह कविता की सुन्दरता बढा देता है।