Sunday, April 20, 2008

पतझड़

किताब पुरानी थी। कबाड़ में देते देते वापस उठा ली थी। ना जाने क्या सोचकर पन्ने पलट दिये। किताब में से कई सारे सूखे पत्ते नीचे उतर आये। मुड़े, सूखे छोटे बड़े..। नज़र बाहर गई थी। फिर पतझड़ था। हर बार कितनी बेरुखी से पेड़ इन्हे झाड़ देता है। नये हरे पत्तों के खातिर पुराने पत्तों से सब मोह खत्म। आज भी....। आँगन पत्तों से भरा हुआ था। शाख इन्हे झाड़कर अँगडाई ले रही थी। लगता था अभी उबासी भर कर नींद में कुछ देर। तब तक, जब तक बूँदबूंद बरस कर नूर नन्हे कोंपल को जगा ना दे। किताब में रखे पन्ने पिछले साल गीले ही उतार लिये थे। फिर एक भारी सी किताब ढूँढ ना जाने किन अलग थलग पड़े किस्सों के बीच दफन कर दिये। सोचा था हरे रह जायेंगे। आज ये बेजान ही हाथ लगे थे।

7 comments:

vijayshankar said...

आपने मस्तिष्क में संवेदनशीलता का एक ढांचा खड़ा कर लिया है. इस खोल से अगर आप जल्द बाहर न आयीं तो आपकी रचनात्मकता आहिस्ता=आहिस्ता शून्य हो जायेगी. अपने आप से प्रश्न कीजिये कि लोग आपको किस बात के लिए सराह रहे हैं. लोगों को दूसरों की तारीफ करके ख़त्म करना अच्छी तरह आता है. मेरी बात थोड़ा कड़वी लग सकती है लेकिन मैं यह समझता हूँ कि अगर आप रचनात्मकता के इस मकाम तक आ गयी हैं तो आपको कुछ सचेत होना होगा. और आपका यहाँ तक आना यूँ भी इतना हमवार न रहा होगा. किसीसे से भी बेहतर आप जानती हैं.

मेरे मशविरे को अन्यथा न लीजियेगा. आपके पास कविता की अच्छी भाषा नहीं है. सबसे पहले इस पर काम कीजिये. गद्य में लिखना लोग आसान समझते हैं. लेकिन वह और भी दुष्कर है. अगर गद्य की भाषा सुधारनी है तो आप हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़िये, 'वाणभट्ट की आत्मकथा' या 'अनामदास का पोथा वगारह'.

आपका शुभचिन्तक. शुभकामनाओं के साथ.

Beji said...

विजयजी आपकी बात मीठी तो नहीं है...पर क्या करूँ सच है। आप यहाँ से कहे बिना भी गुजर सकते थे,रुक कर मार्गदर्शन देने का शुक्रिया।

बाकी तारीफ और निन्दा...बनने वालों को तो दोनो ही बना सकते है। जो इनसे खत्म हो जाये वो बनने के लिये बना ही नहीं था।

रही बात संवेदनशीलता की...आप सच कह रहे हैं कि यहाँ तक आना हमवार नहीं था। किन्तु शायद इनके बिना मैं यहाँ आती भी नहीं।
इस खोल से निकलने का इंतजार मुझे भी है...क्योंकि यह कवि के बनने की नहीं व्यक्तित्व के बनने का सफर है।

Udan Tashtari said...

बहुत ही सुन्दर संवेदनशील पोस्ट. सही दिशा है, बहुत अच्छा लिख रहीं हैं. बिना विचलित हुये लिखती रहें. आपको पढ़ना अच्छा लगता है.

Pramod Singh said...

घबराइये नहीं. लिखे चलिये. कमेंट बहुत मर्तबे न करता होऊं, मगर एक नज़र मार मैं ज़रूर जाता हूं. और इतने तोल-भाव के चक्‍कर में नहीं पड़ता. वैसे पढ़ने को मैंने भी हजारी प्रसाद नहीं पढ़ा है. पढ़ने को प्रसाद भी नहीं पढ़ा है. मगर देखने को यह ज़रूर देखता हूं कि जिन्‍होंने पढ़ा है वह हिंदी को आसमान तक नहीं ले गए हैं. दरअसल कहीं नहीं ले गए हैं. हिंदी विमर्श के स्‍तर पर मर चुकी ज़ुबान है. नेट पर बीच-बीच में हमारे जैसे लोग उसे ग्‍लूकोज़ दे रहे हैं यही अपने में बड़ी बात है.. जोर लगा के हइसा.. लगे रहिये, डाक्‍टरनीजी..

pallavi trivedi said...

आज पहली बार पढ़ आपको...काफी अलग अंदाज़ है आपके लिखने का! खूबसूरत शब्द,खूबसूरत भाव!

सुभाष said...

आज अचानक पढ़ते पढ़ते आपके ब्लॉग तक पहुच गया, पढ़ कर काफ़ी अच्छा लगा, बस इसी तरह अपनी कलम को गति प्रदान करते रहिये

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बाकी तारीफ और निन्दा...बनने वालों को तो दोनो ही बना सकते है। जो इनसे खत्म हो जाये वो बनने के लिये बना ही नहीं था।
आपके इस ख़्याल से मैं इत्तफ़ाक़ रखता हूँ.
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डा.चंद्रकुमार जैन