नींद के पास रात फटकती उससे पहले ही ख्याल ने आ दबोचा। फिर यादों के छोटे प्यालों में छलक कर सामने । हाथ बढ़ाने भर की देर थी...और फिर नशे में ।मालूम था नशे की आदत छूटते छूटते फिर लग जाती है। बस... टस से मस नहीं हुई। रात जहाँ थी वहीं रोक ली। ख्याल के गुजरने का इंतज़ार था। अजीब सा लम्हा हाथ में था। एकदम खाली। रूठा सा। बहलाती रही। सहलाती रही। वह भी मुँह फेर कर बिचका कर खड़ा रहा। थका सा लगा तो थोड़ी नींद सामने की....। उसे भी जिद सिर्फ ख्याल की थी...बस यही और कुछ नहीं। कैसे दूँ वह ख्याल जिसे खुद अपना होश नहीं हो। आवारा .....विद्रोही, अपने घाव, कुरूपता कुछ भी छिपाये बिना....ठीक सामने। सच के कोने काटकर, सलीके से फाइल करने की आदत है। ऐसे अलग अलग रंग , आकार में कटे फटे ख्याल बेतरतीब सामने फैले हुए। लम्हे को कस कर पकड़े हुए इंतज़ार करती रही....। पहर बदलता गया। लम्हा खड़ा ही रहा। पता नहीं कब आँख लग गई। उठी तो सर भारी था...पर ख्याल का नामोनिशाँ नहीं था।
.....क्या सच में चला गया?!!
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4 comments:
शायद जगह बदलने के मोह में दुबई से निकलकर कहीं और गया हो?
आप तो नैनो को पकड़ लेती हैं। ये ख्याल कैसे छूट गय़ा।
जी नही, ख्याल कहीं नहीं जाता.....बस उसमें एक कड़ी और बड़ जाती है...हम सोचते है कि शायद वह ख्याल चला गया।लेकिन जो नया ख्याल है वह पहले ख्याल का ही प्रतिबिंम्ब ही तो होता है।शायद रूप ही बदलता है।
सच के कोने काटकर, सलीके से फाइल करने की आदत है। ham nahi sudherenge...hai na ?
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