Thursday, March 6, 2008

स्मृति की खोह में कुछ पल

हर दिन को गोल गोल कर के सोचती हूँ रात को धकेल दूँगी । बहुत दूर। फिर इसी सिरे को पकड़ नई सुबह तो नहीं होगी। पर धकेलते धकेलते थक भी जाओ....कहाँ सरकता है दिन। नई सुबह होती है...किसी नई पोशाक की तरह...जिसमें पुराने कपड़े की झालर लगी हो।
शायद अभी इसी मोड़ कुछ और सुस्तायेगा...। करवट लेने में भी आलस है इसे। सोचती हूँ किसी पगडंडी से पीछे ही चली जाऊँ। किसी पुरानी दुनिया में। समय का कारवाँ यहाँ रूका है....लौट कर साथ हो लूँगी।

बस की खिड़की वाली सीट पर। पहाड़ी रास्ता । रावतभाटा से कोटा तक का। गर्म हवा। जिसमें जंगल महकता था।झाड़ियाँ, बेर के कितने पेड़, हरा रंग थोड़ी थोड़ी दूरी पर और गहरा जाता। हल्के नीले होने तक। खिड़की पर चेहरा रख कर बाहर देखती।....लोहे की बारियाँ...धूप में थोड़ी तपी सी...मेरे स्पर्श से शीतल होती हुई। उनका कड़ा स्वरूप मेरी दृष्टि....और शायद मेरी कल्पना पर भी एक सीमा खींच देती।

तपा तपा सा जंगल। भूरी , काली झाड़ियाँ महीन छोटी पत्तियों से सजी हुई। कहीं बीच बीच में जैसे कोई कैम्पफायर के लिये आग जलाई हो। टेसू के फूल आग की लपटों सा उठते हुए। ज़मीन एकदम रूखी सूखी। घास जैसे वहीं खड़ी खड़ी भुन गई हो। बीच बीच से कोई चट्टान अपना सर ऊपर उठाती हुई। फिर जैसे कुदरत ने प्यार से हाथ फेर कर नन्हे नीले पीले रंग के जंगली फूलों से सजा दिया हो।

बगल वाली सीट पर बजाज अंकल की खर्राटों की आवाज़। पिछली सीट पर रोते हुए मुन्नु की। पीछे से बन्टू का बन्दर वन्दर की कोई कविता। मेरी नज़र जैसे जैसे दूर जाती...यह सब आवाज़ें मंद पड़ जाती।

हवा का खिड़कियों तक आकर कानों में फुसफुसा जाना। कोई उड़ती पत्ती का आकर कोई चुगली कर जाना। टहनियों का हाथ से तने को पकड़ कर गुनगुनाना। पत्तियों का आपस मे गपशप करना। नन्ही चिड़िया का चींचीं करना...फिर फु्र्र फुर्र उड़ जाना। फिर लगता जैसे हवा की बीन पर ही कोयल कोई धुन छेड़ रही हो।

आठ साल की मैं ....और पूरी दुनिया जैसे सामने हो। मुझे लगता अभी चंपक से चीकू, शेर कछुआ ,मोर.... सब चले आयेंगे। जंगल में कोई सभा होगी। शेर चट्टान पर से दहाड़ेगा। कोई कलकल बहता झरना होगा। उसमें तैरती कोई मछली। कहीं भालू सुस्ताया होगा। कहीं मधुमक्खी छत्ते में शहद बनाती होगी।

जंगल में ही एक पूरा जंगल उगा लेती। ढ़लान पर आती तो लगता भालू के पीठ पर बैठ उतर रही हूँ। चढ़ते हुए बुदबुदाती ज़रा सँभल के हाथी।

पके लाल बेर पेड़ में लाल बत्ती की तरह सजे हुए से। मुँह में स्वाद उतर आता। जीभ से उतारा लाल छिलका...खुरदुरा नन्हा सा बीज....मम्म!! और वहाँ थोड़ी दूर पर पेड़ से लटकी जलेबियाँ। हल्की गुलाबी...थोड़ी खुली हुई सी।काले बीज सफेद गूदे को सरका कर मुँह निकालते हुए। पक्की इमलियाँ। और हाँ....वह टिमरू ही है ना....मैला सा पीले रंग का......

बैग में हाथ ड़ालकर काटे हुए काले सिंगाड़े निकाल लेती। चलो वह नहीं यही सही। भूख जो लगी है।

रास्ते में काफी घुमाव है। जगह जगह दिख जाता है...खतरनाक मोड़। मुझे तलाश है । पिछली बार तो दिखा था....इस बार....।

हाँ....वह रहे। मोर... साथ में मोरनी। पिहआँ... बादल हैं ये शायद नाचे...। पर वह पहले दो कदम सरक कर...फिर जैसे रनवे पर भाग कर...उड़ान भर कर दूर।

लंगूर क्यूँ नहीं दिखे। होने चाहिये थे। होंगे।मुझे मालूम था। झुंड एक ही जगह पहुँच जाता है। इनकी पूँछ देखकर तुरंत हनुमानजी की पूँछ की लँबाई पर विश्वास हो जाता ।

और चेहरे....एकदम काले।

कल्पना फिर उड़ान भरने लगती। किसी दिन जरूर कोई गड़बड़ की होगी इन बंदरों ने। फिर सजा मिली होगी......सब का मुँह काला कर दो। जब सुधरेंगे तब हटा देना। ढीठ बंदर माने ही नहीं होंगे। रह रहकर रंग पक्का हो गया होगा।

बस बहुत धीरे सरक रही है...धुमाव, चड़ान....ढ़लान.....

मुझे नींद आ रही है.....

चलो वापस.....

दिन कुछ आगे बड़ा क्या ? कहाँ खिसका...कारवाँ वही है....खड़ा हुआ। रुका हुआ।

चलो जाना होगा.......फिर गोल करो...और धकेलो.....

शायद आज के धक्के से....यह लुढ़क ही जाये.....और कल एक नई सुबह...।

5 comments:

Udan Tashtari said...

धकेलिये....बस, इसी धकेलन का नाम जीवन है.

ajay kumar jha said...

beji,
aap badee kharaab hain, aapne bataayaa hee nahin ki aap kaa koi alag drishtikon bhee hai. aaj pehlee hee baar pahuncha hoon ab to yaheen rahungaa.

Mired Mirage said...

मैं भी यात्रा में बीच में ही गाड़ी रोककर सबकुछ देखना, छूना, सूँघना चाहती हूँ । आज भी वैसे ही मंत्रमुग्ध तकती हूँ जैसे कई दशक पहले । यह रचना कुछ अपनी सी लगी ।
घुघूती बासूती

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

aap bahut achchha likhti hain...aapki bhasha bhi jivnt...achchh lga...pahli bar idhr aaya mam

DR.ANURAG ARYA said...

अद्दभुत विवरण ,शब्दों की सही पकड़ ,कभी भी ठहराव नही........सचमुच आप की यात्रा दिलचस्प है.