Saturday, February 16, 2008

अलसाई भोर

अलार्म बज चुका था। करवटों में ही उलझी हुई थी अँगडाईयाँ। ध्रुव तारा खिड़की पर खड़ा चिड़ा रहा था। भोर को अभी समय था। कच्ची जिंदगी रसोई में पड़ी थी। आज करवटों को सुलझाने का मन नहीं था।

चादरों के नीचे आश्वस्त साँसें। मीठे सपनों में बुदबुदाते नन्हे होंठ। बिस्तर के आलिंगन में सोये सपने। मीठी नींद में खोये अपने।

उलझी अँगड़ाईयों को करवटों के साथ ही उतारा। खिड़की पर पड़े कोहरे को कुछ साफ किया। ओस के दो बूंद की आशा। नल से बहता पानी।

गुनगुनी रसोई में चाय की केतली। कुछ ताज़गी पकाने की कोशिश। परात में रखी कच्ची सब्जियाँ। जिन्दगी आँच पर चड़ने को तैयार।

खिड़की से ध्रुव तारा बिना कहे ही चला गया। कबूतर ठिठुरता गुटरगू करता खिड़की पर।
चाय के कप में ठंडी पड़ी ताज़गी। आँख बंद कर...खिड़की के बाहर मोगरे के फूल। ओस में नहाई धूप पहन कर खड़ी घास। आँख खोली तो सरपट पार्किंग से निकलती गाड़ियाँ।
सूराख से छनी थोड़ी सी धूप जल्द उठाई। खाने के डिब्बे के बाजू में यह भी।

नन्ही बाहों से नींद उतारी। सपनों को तह कर सिरहाने रखकर। पलकों के भीतर सुबह उगते देखी।

करवटों को गरम पानी में भिगोया। थोड़ी नमी शवर से उठाई। रूह कितनी भीगी कितनी सूखी .....
आईने ने पहचान याद दिलाई। ज्यादा , कम पर सही टोन चड़ाकर..सुबह थोड़ी और आगे सरकाई।

5 comments:

Aflatoon said...

सुन्दर किन्तु कफ़ी तेज़ ।

Mired Mirage said...

वाह! बहुत सुन्दर सुबह रही आपकी । सदा ऐसी ही सुन्दर रहें ।
घुघूती बासूती

हर्षवर्धन said...

कितनी मस्त अलसाई भोर है।

DR.ANURAG ARYA said...

goya aapne to ek nazm bana di vo subah bhi.......

aapka najariya vakai juda hai.

Abhishek said...

बहुत सुंदर! बेहद रूमानी।
अलसाई सी लेखनी की बात ही कुछ और होती है!
तारीफ के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं, फिलहाल तो आपको अपने ब्लॉग रोल में जोड़ कर ही काम चलाते हैं!