Monday, February 11, 2008

टिफिन

पाँच साल की रेहाना के आँखों में आँसू थे। स्कूल का ब्रेक हो चुका था। रंग बिरंगे टिफिन लकड़ी के डेस्क पर खुल रहे थे। केक, नग्गेट्स,नूडल्स,पिज़ा,इड़ली,सैन्डविच…..नन्ही गोदियों में सँभले टिफिन्स से अलग अलग महक हवा में घुल रही थी। रिया भाग कर टीचर के पास आई थी, “मैम प्लीज़ ओपन माई टिफिन। "

रेहाना बुत बन कर खड़ी थी।

नन्ही रेहाना का रंग बिल्कुल उजला था। आँखे हल्की नीली। होंठ गुलाबी। बाल सुनहरे। कोई बहुत प्यारी सी गुड़िया लाइफसाइज़ में हो जैसे।

अजीब उदासी थी उन आँखों में। इतने भोले चेहरे पर भाव परिपक्व था। बिना एक भी सिसकी के उसकी आँखों से आँसू बह निकले थे।

"मैम रेहाना इस क्राइंग। " टीचर ने पास बुलाया। जमा किताबों के ऊपर हाथ रख,चश्मे के ऊपर से देखते हुए पूछा,"नाउ व्हाट हैपन्ड रेहाना?"

आँसू पोंछती हुई सँभली आवाज़ में रेहाना ने कहा,"माइ टम्मी इस हर्टिंग।"
"गो टू द क्लीनिक!"...टीचर की आवाज़ में चिढ़ थी।

रेहाना नज़र झुका कर स्कूल क्लीनिक की तरफ चली।

चलते हुए लग रहा था मानो अभी गिर जायेगी। हलकी फुल्की रेहाना कारीडोर में और भी असुरक्षित लग रही थी। अपनी मुट्टियाँ बाँध ना जाने कौन सा इरादा कस के पकड़ चल रही थी।

कल फिर डैडी देर से आये थे। दरवाजे पर ड्राइवर के साथ वह फिलिपिनो आंटी ही उनके लड़खड़ाते कदम छोड़ गई थी। वे नशे में थे। कुछ बुदबुदाते हुए फर्श पर ही ढेर हो गये थे।

मम्मी अपनी पार्टी से कुछ देर पहले ही लौटी थी... "माई लिटिल डार्लिंग....यू आर ऐन एंजल। " फिर मेड के हाथ पर्स थमा, पानी के साथ एक गोली ले बिस्तर पर लुड़क गई थी।
रेहाना का अपना बेड़रूम था। ढ़ेर सारे टेड्डी बेयर,बार्बी....हर तरह का खिलौना था वहाँ। उसे लगता था शायद मम्मी और डैडी उसे भी डॉल ही समझने लगे हैं।

कल भी रेहाना अपनी होमवर्क की किताब पकड़ कर सो गई थी। अलग अलग फलों की तस्वीर चिपकानी थी। पर रेहाना का होमवर्क मम्मी और डैडी के एजेन्डा में नहीं था।

क्लीनिक आ गया था। गहरी साँस लेकर रेहाना ने क्लीनिक का दरवाज़ा खोला। देखते ही नर्स ने उठा कर बेड पर लिटाया।

"शी लुक्स सो पेल। शी वुड़ हैव फेन्टड। गेट हर टिफिन।", नर्स ने आया को कहा।

ग्लूकोस पानी में मिलाकर रेहाना को दिया तो नर्स की आँखों में बरबस ही प्यार उमड़ आया। सफेद कपड़ों में नर्स रेहाना को बिल्कुल परी माँ सी लग रही थी। जिस हाथ से नर्स ने सँभाला था रेहाना उसपर ठेक लगा कर बैठ गई थी।


"इफ यू डोन्ट ईट..यू विल फेन्ट,फॉल सिक ऐन्ड कैनौट कौनसेन्ट्रट। ", नर्स प्यार से समझा रही थी।

रेहाना का टिफिन गुलाबी रंग का था। उस पर एक खूबसूरत सी जलपरी थी। साथ में एक मैचिंग गुलाबी बौटल।

"देयर विल भी अ केक
और देयर विल भी अ कुक्की"

नर्स गुनगुनाते मुस्कुराते हुए टिफिन खोल रही थी.......

............खुलते ही बासी खाने की दुर्गँध पूरे क्लीनिक में फैल चुकी थी।

9 comments:

नितिन व्यास said...

आपकी कलम में जादू है, कहानी बहुत अच्छी लगी

दिनेशराय द्विवेदी said...

बहुत सामयिक। बहुत दिनों बाद कोई कहानी पसंद आई। आप ने सच को अत्यन्त सुन्दर तरीके से चित्रित किया है।

अफ़लातून said...

मुझे तो यह रुलाने वाला वाकया लगा , कहानी नहीं ।

Poonam said...

दिल को छू गई.बहुत अच्छा लिखा है आपने.

Beji said...

@अफ़लातून
सच ही है....।

mamta said...

दिल को छू गयी।

Sanjeet Tripathi said...

आंखें भर आईं!!

Udan Tashtari said...

मर्मस्पर्शी!!

neelima sukhija arora said...

हकीकत इतनी तकलीफदेह क्यों होती है