Thursday, January 31, 2008

चलती बहस में मैं भी...

पिछले दिनों एक बहुत अहम बहस चली। पढ़ती रही पर समयाभाव के चलते कहीं भी बहुत सार्थक टिप्पणी नहीं कर सकी। सभी कह रहे थे...मुझे भी कहना था। पर देखो बहस खत्म भी हो गई।

इस बीच कुछ बहुत अहम बातें भी हो गई। प्रत्यक्षा दी की पुस्तक का छपना, रीता भाभी का ब्लॉग पर लिखना और तरकश सम्मान का घोषित होना (विजेताओं को बधाई)।

बात शुरु हुई तनुजी के किताब पढ़ने के शौक से । आगे चली ज्ञानजी के एतराज पर। इस एतराज पर विरोध दर्ज किया प्रत्यक्षादी ने। जिसका समर्थन किया प्रमोद जी ने। शिवकुमारजी ने कहा अपने घर और अपनी सच्ची सोच के बारे में पोस्ट ठेल रहे हैं। वो भी ऐसी जो सबकी समझ में आए । अभय जी ने अपने हल्के फुल्के रेस्पॉंस को डिफेंड किया। प्रत्यक्षादी समझाने और प्रमोद जी कनफ्यूस करने की कोशिश में लगे रहे। फिर अभयजी ने कड़वी बात मीठी की और रीता जी ने कहा कि औरतें इतनी जल्दी भिन्ना क्यों जाती हैं। जरा सी बात में ’नारी मुक्ति संगठन’ खड़ा हो जाता है। जिन्दाबाद मुर्दाबाद शुरू हो जाता है।

बहुत लोग समर्थन और विरोध करते रहे जिसमें से खासकर प्रियंकर जी, घुघूतिजी, रचनाजी और पारुल ने बहस आगे ले जाने में मदद की।

फिर इसे थोड़ा असहिष्णुता का,थोड़ा नारीवादी प्रलाप समझ नौनकनफ्रन्टेशनल होने की कोशिश में साइड़ में रख दिया।

दुख हुआ। जितने लोग इस बहस में थे काफी परिपक्व, समर्थ और विचार के धनी हैं। फिर भी इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकला।

लेट अस जस्ट एग्री टू डिसेग्री ....लिव एन्ड लेट लिव....होल्ड औन टू योर ओपिनियन....फेम्निस्टिक व्यूप्वाइंट..... आइ एम सॉरी .....ऐन्ड जस्ट लीव मी अलोन....
हाऊ डस इट मैटर एनिवे.....

बहस का इतना लंबा चलना और लोगों का अपना एक विचार होना ही सांकेतिक था कि यह बहस बहुत अहम है। बहस किस बात पर थी ...पता नहीं अलग अलग लोग क्या अंदाज़ा लगाते हैं।

क्या बहस तनु जी के किताब पढ़ने पर थी....
या ज्ञानजी के चाय की अपेक्षा पर....
नहीं तो प्रत्यक्षादी के किताबों की दुनिया पर....
या प्रमोदजी की अज़दकी शैली पर....
नारी के अधिकारों पर...
या अभयजी और ज्ञानजी की आत्मीयता पर....

बहुत आसान था इसमें से कुछ चुन लेना और फिर एक खेमे में खड़े हो जाना।

जहाँ तक मैने समझा....ज्ञान जी अपने घर आने पर भाभी को पास चाहते हैं किताबों को नहीं। ठीक है...समझ सकते हैं। आखिर साथ से ही भाव पनपता है। और भाव ही सब साहित्य की बुनियाद है।

प्रत्यक्षादी को इस प्राइवेट भाव से आपत्ति नहीं थी....उन्हे इस सोच से आपत्ति थी की पत्नी रसोई छोड़ कर कोई सार्थक साहित्य पर बहस करे तो यह भयोत्पादक है। प्रत्यक्षादी का विरोध समझ आता है क्योंकि ज्ञान जी की बात से ऐसे महसूस होता है कि साहित्य और ज्ञान किसी भी विषय पर हो उससे स्त्री का कोई भी रिश्ता उसके रसोई के रिश्ते से तुच्छ है। उन्होने यही बात कहने की कोशिश भी की।
"अब यह भी क्या सीन होगा कि सण्डे को सवेरे आप डाइनिंग टेबल पर इडली का इन्तजार कर रहे हैं पर भरतलाल (मेरा भृत्य) और रीता (मेरी पत्नी) का संवाद चल रहा है - "बेबी दीदी, साम्भरवा में कौन कितबिया पड़े? ऊ अंग्रेजी वाली कि जौन कालि फलाने जी लिआइ रहें अउर अपने साइन कई क दइ ग रहें?" (बेबी दीदी, साम्भर में क्या पड़ेगा? वह अंग्रेजी की किताब या कल फलाने जी की आटोग्राफ कर दी गयी नयी पुस्तक)।
भाई जी/बहन जी; इतना पढ़ें तो भोजन बनाने को समय कब मिलेगा?"


दूसरी एक और बात पर ज्ञानजी ने इशारा किया। किताबें पढने और इसका जिन्दगी से क्या रिश्ता है उस पर-

उन्ही के शब्दों में
"ज्यादा पढ़ने पर जिन्दगी चौपट होना जरूर है - शर्तिया! जो जिन्दगी ठग्गू के लड्डू या कामधेनु मिष्ठान्न भण्डार की बरफी पर चिन्तन में मजे में जा सकती है, वह मोटी मोटी किताबों की चाट चाटने में बरबाद हो - यह कौन सा दर्शन है? कौन सी जीवन प्रणाली?"


कितने भी हल्के फुल्के अंदाज़ में क्यों ना कही गई हो बात गंभीर ही कही थी।

किताब लिखता कौन है? और पढ़ता कौन है? क्यों हैं? इससे क्या हासिल किया जा सकता है।
सिर्फ मनोरंजन के लिये फेमिना, पराग, गृहलक्ष्मी वगैरह पढ़ा जाता है।

पर फिक्शन, उपन्यास, व्यंग्य, कवितायें........

मैनेजमेन्ट की किताबें, सेल्फ इमप्रूवमेन्ट की किताबें....

कम्प्यूटर के तकनीकी ज्ञान....

साइंस के अविष्कारों पर....

साइकोलोजी पर....

इंजीनियरिंग पर...

रोगों पर....रोगियों के अनुभव पर....निदान पर....

हार पर...जीत पर...

देश पर....राज्य पर....

गीता, बाइबल, कुरान भी किताबें ही हैं ना.....

और इन्हे पढ़ने से भय का उत्पादन हो तो यह बहुत अजीब बात है। इस बात का कोई समर्थन करे इसके पहले विरोध करना जरूरी है। इस बात का स्त्री और पुरुष होने से भी खास रिश्ता नहीं था।

किताब में सरस्वती का वास है.....कैसे कह दें की इससे भय फैलेगा...

अच्छे लिक्खाड़ों के नाक पर गुस्सा रहता है। ऐसा ही कुछ प्रियंकर जी ने कहा था। मन हुआ कहने का सही कह रहे हैं। जो अच्छा लिखते हैं अक्सर अपने सिद्धान्तों के अनुसार अपने जीवन का दर्शन तय कर चुके होते हैं। कोई भी जब इस बुनियादी सिद्धान्त को चुनौती दे तो गुस्सा भी स्वाभाविक है। जो कलम से वफादार होते हैं.....वह कलम इस्तेमाल कर अपने विचार का पूरजोर समर्थन भी करते हैं।

फिर भी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा यह नहीं था।

बहुत सहजता और भोलेपन में कही बात कि .....
बल्कि अगली किसी पोस्ट में अभय अगर यह बतायें कि उनकी पत्नीजी को बहुत बढ़िया खिचड़ी (मेरा सर्वाधिक प्रिय भोजन) बनानी आती है तो मुझे प्रसन्नता होगी!
यह फिर उनके इस विचार का समर्थन करती है कि बीवी अपनी सृजनात्मकता रसोई में पहले फिर(?) साहित्य में दिखाये तो बेहतर है।

ज्ञान जी अपने घर में क्या चाहते हैं उनपर है। अभयजी ने तनुजी को क्यूँ पसंद किया भी उनपर है। इस विषय में जाहिर है कि तनुजी या रीता जी को किसी बाहरी समर्थन की जरूरत नहीं है। प्रत्यक्षादी कितनी किताबें पढ़े, लिखें और खाना बनाये कि नहीं भी उनपर है।

किन्तु ज्ञानजी ने अपना यह विचार एक सार्वजनिक ब्लॉग पर सभी के पढ़ने के लिये रखा है। विचारों मे बड़ी ताकत होती है....इन्सान को जकड़ सकने का दम। किताबों में लिखे जिन शब्दों के गहन अध्ययन से उन्हे परहेज है....उन्ही शब्दों का इस्तेमाल कर उन्होने यह जताने की कोशिश की कि किताबी ज्ञान खास तौर पर जो बीवियों को हासिल हो किस तरह जीवन में उथलपुथल मचा सकता है।

मेरी पत्नी रोज कहेंगी - तुम्हारा बीएमआई वैसे भी बहुत बढ़ गया है। दफ्तर में बहुत चरते हो। ऐसा करो कि आज खाने की बजाय हम पाब्लो नेरूदा के कैप्स्यूल खा लेते हैं। सलाद के लिये साथ में आज नयी आयी चार मैगजीन्स हैं। लो-केलोरी और हाई फाइबर डाइट ठीक रहेगा तुम्हारे लिए।
विरोध इस बात का था। बहस का सबसे अहम मुद्दा भी यही था।

बहस होनी भी जरूरी थी। हम सब पहले एक व्यक्ति हैं। फिर एक पारिवारिक इकाई। फिर शायद कोई छुटपुट गुट। और फिर समाज।

व्यक्ति की सोच उसको और उसके परिवार को प्रभावित करती है। यही सोच जब बहुत सारे गुट में छा जाती है तो समाज पर असर करती है। किसी भी सोच को समाज का एक सच बनाने से पहले उसे फिर सिरे से सिरे तक सोचना चाहिये। फिर समाज में ऐसी कई सोच व्याप्त है जिसे हमें चुनौती देनी चाहिये। बदलने की कोशिश करनी चाहिये।

विचार को विचार समझ कर उस पर बहस करना बहुत परिपक्वता का काम है। जज़्बात में बात अक्सर उलझ जाती है। दुख की बात है कि इस बहस को पूरा कर कुछ निष्कर्ष नहीं निकल सका।

अपने ही ब्लॉग पर टिप्पणी कर ज्ञानजी ने दो बातें कही-

1.सम्भव है कि गुण सूत्रों में पुरुष होने का अहं हो। उसे बीन बीन कर बाहर करना जरूरी है - बतौर सतत चेतन रहते हुये।
यह बात वाकई गौर फरमाने की है। पुरुष होने का अहं गुण सूत्रों में किस कदर बैठ सकता है। और सतत चेतन रह कर ही खदेड़ा जा सकता है। यह जरूरी भी है। अगर वाकई इस अहं से पुरुष बँधा हुआ हो तो उसे अपने जीवनसाथी के संपूर्ण व्यक्तित्व से परिचित होने का मौका नहीं मिलेगा। और शायद दाँपत्य के सबसे खूबसूरत पलो से वह वँचित रह जाये।

2.पारुल जी, रचना जी - आपने मेरी पत्नी से अपेक्षाओं के बारे में पूछा/चर्चा की। धन्यवाद।
मैं काफी सोच कर यह लिख रहा हूं। कहीं पुरुषवादी से परिवारवादी के सलीब पर न चढ़ा दिया जाऊं। रीता न होतीं तो मेरा लड़का जीवित न होता और जीवन के थपेड़ों से मैं स्वयम या तो ल्यूनाटिक एसाइलम में होता या एसेक्टिक होता। परिवार दो चक्कों की गाड़ी पर चल रहा है और रीता वाला चक्का मुझसे कहीं ज्यादा मजबूत है।
मेरी पत्नी पुस्तकों से दूर नहीं हैं और मैं लगभग सभी पोस्टों उनके पठन के बाद ही पब्लिश करता हूं। वे मेरी पोस्ट के सभी कमेण्ट और कई अन्य ब्लॉग पढती भी हैं। उन्हे मैं ब्लॉग लेखन के लिये बार बार कहता रहा हूं; पर उन्हें कम्यूटर प्रयोग से रुचि नहीं हैं। धीरे धीरे हो रही है। अब लगता है कि यदा कदा उनकी पोस्ट अपने ब्लॉग पर प्रस्तुत कर दिया करूं।


बस बात इतनी ही थी। अगर ज्ञानजी रीता भाभी को किताब, ज्ञान, अपनी पहचान से दूर नहीं रखते और अपने जीवन की गाड़ी का बेहतर पहिया उन्हे मानते हैं तो....
..तो सार्वजनिक तौर पर ऐसा विचार कि स्त्री (पत्नी) को इनसे दूर रहना चाहिये....नहीं प्रकट करना चाहिये। ज्ञानजी बहुत सुलझे हुए लोगों में से हैं....उनके सहज शब्दों में ताकत है....जीवन की किताब काफी बारीकी से पढ़ी है...पढ़ते आये हैं.....

......उनमें ताकत है की वह समाज को विचार दे सके....विचारधारा बदल सके.....

इसीलिये जरूरी है....बहुत जरूरी है कि वह पूरी जिम्मेदारी से अपने विचार रखे....
....बहुत से लोग हैं जो उनकी बातों का अनुकरण करना चाहते हैं....गाँठ में बाँधना चाहते हैं.....


ऐसे में कम से कम बहस करने के बाद उसका निष्कर्ष निकाल सकने की परिपक्वता उनसे अपेक्षित है।

16 comments:

Kakesh said...

हमने पढ़ लिया जी.

Parul said...

ये बात कहीं और कही जाती तो शायद उतना ध्यान न बाँटती…क्योंकि ज्ञान जी का ब्लोग हमेशा इमानदार बात कहता है,इसलिये ज़्यादा तक़लीफ़ हुई।
प्रमोद जी ने बहुत गोलगोल चक्कर खिलाये,प्रत्यक्षा जी की बात स्पष्ट सामने आयी…बारहाल मेरा तो ये मानना है कि किताबे जीवन में रंग भर देती हैं और किसी को भी ये अधिकार नही कि किसी व्यक्ति विशेष को इनसे वंचित रखे

Pramod Singh said...

ये अलग बात है कि बाद में भागकर अनिल लोगों को मुंबई बुलवाने का निमंत्रण-पत्र छापने में लगे हैं, लेकिन इस प्रसंग में उन्‍होंने भी एक पोस्‍ट लिखा था.. मैं शर्मिंदा हूं कि मेरी पंक्तियों से आप कन्‍फ़्यूज़ हुईं, मगर बेजी, माफ़ कीजिए, मैं यहां भी देख रहा हूं कि आप एटिच्‍यूड, माइंड सेट की बजाय फिर बात व्‍यक्ति और व्‍यक्तियों की ओर ले जा रही हैं. इस लंबे पोस्‍ट के आखिर तक पहुंचते-पहुंचते आदमी को इसकी याद रहेगी कि बात हो क्‍या रही थी?

और यहां बात के खत्‍म होने जैसी कोई बात नहीं है, लोग थोड़ा इधर-उधर ठंडा, सुस्‍ता रहे हैं.. यह आपलोगों की दुनिया (और उस दुनिया के अंदर का भी भारी आंतरिक कन्‍फ़्यूज़न) है तो आपका ज़्यादा फर्ज़ बनता है कि इस मसले की आंच और आग जिलाये रखें..

और भगवान के लिए उसे व्‍यक्ति विशेष का प्रसंग बनाकर दो कौड़ी का प्रश्‍न न बनने दें..

औरतें इतनी जल्दी भिन्ना क्यों said...

रीता जी ने कहा कि औरतें इतनी जल्दी भिन्ना क्यों जाती हैं। जरा सी बात में ’नारी मुक्ति संगठन’ खड़ा हो जाता है। जिन्दाबाद मुर्दाबाद शुरू हो जाता है।
is kathan kae baad kis baat ka mehtav hae ? kewal apni samay barbaadi haen unki "parivarik" post padh kar

Beji said...

प्रमोदजी आपके लिंक देने पर ही अनिलजी की पोस्ट पढ़ी। रह गई थी। सच में पढ़ने जैसी है।

हाँ , आप सही कह रहे हैं..बात मैं ऐटिट्यूड और माइन्ड सैट तक सीमित नहीं रख सकी। और बेवजह लंबाई में बात कुछ खो भी रही है।

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया पोस्ट है. शायद इसे पढ़कर इस मुद्दे पर बहस करनेवाले और चर्चा करनेवाले अपने-अपने स्टैंड पर दोबारा विचार करें. हो सकता है नहीं भी करें. लेकिन दोबारा विचार करने के लिए एक बार सोचेंगे जरूर.

notepad said...

हाँ यह बात भी सही है बहुत हद तक जो प्रमोद जी ने कहा - आप लोगों में भी आंतरिक कंफ्यूज़न वाली । लेकिन यहाँ कोई रजनीतिक एकजुटता टाइप नही है कि सब पहले अपने दिमाग साफ कर लें । जिसको जब जैसा अनुभव होता है, किसी स्थिति विशेष में जिस सत्य से साक्षात्कार होता है उसे कहता है ।
और यह कि ऐसे मुद्दे निबटाने की चाह इससे अलग खडे पक्ष में रहेगी ही । वक़्त वक़्त पर यह मुद्दा गर्म होता रहेगा , निश्चिंत रहें ।

Pratyaksha said...

बेजी , बात जितनी महीन है उतनी ही प्रगट भी है । स्त्री सेकेंड क्लास सिटिज़न नहीं लेकिन न सिर्फ पुरुष ऐसा कई बार सोचते हैं बल्कि औरतें भी इस बात को सहजता से स्वीकार करती रहती हैं , अगर कोई और रौशनी दिखाये तो आँखें बन्द भी कर लेती हैं ।कोई ब्लाईंड स्पॉट हो जैसे ।

इस विषय पर लगातार डायलॉग चलते रहना चाहिये । अगर किसी को एक बार भी सोचने और इंट्रोस्पेक्शन पर मजबूर कर पाये ..इतनी सार्थकता ला पाये तो सही ।बावज़ूद इसके किसी के पारिवारिक जीवन में कैसा और क्यों हस्तक्षेप ।

बेजी , बहस कोई खत्म नहीं हुई और शायद ओवर्टली और पब्लिकली न भी दिखे , लोगों के जीवन में हर दिन किसी न किसी रूप में ऐसे मुद्दे सर उठाते हैं । ज़रूरत है उसे कुछ मायनों में संतुलित तरीके से सामने लाते रहने की । कुछ कुछ रिले रेस जैसा ..पासिंग द बैटन । और ऐसी कवायदों को हल्के तौर पर महिला मुक्ति संगठन के नाम से ब्रैंड करके उसकी अहमियत खत्म करने की कोशिश अगर स्त्रियाँ ही करें तो उनके पुरुषों से आप कैसी और कितनी उम्मीद रखती हैं ? ये मुद्दे व्यक्तिगत मुद्दे नहीं । पर इन्हीं सम टोटल से larger whole बनता है इसीलिये हरेक छोटी ईकाई पर कुछ बुनियादी सोच बदलने की बात आती है ।
प्रमोदजी ने सही कहा , मसले की आग और आँच हमारे ही हाथ में है ।

Priyankar said...

ये लीजिए आपके बहस के बाघ को प्रमोद जी ने एक तीर से ढेर कर दिया .

ज्ञान की दहलीज से टकरा कर भावना का माथा पहले भी कई बार फूट चुका है .सो ऐटीट्यूड और माइंडसेट पर भी थोड़ा आलोकपात(बांग्ला में कहते हैं ऐसा) करें .

अभय तिवारी said...

सुधीजनों ने सही कहा है यह बहस ढेर होने वाली नहीं है.. शोले तो निकलते रहेंगे..

दिनेशराय द्विवेदी said...

निष्कर्ष निकाले ही जाने चाहिए। पर यह काम कौन करे? वैसे आप ने काफी काम खुद ही कर दिया है।

Gyandutt Pandey said...

ओह, यह सब पढ़ तो लिया। आत्मसात करने में समय लगेगा।
आखिर कम पढ़ने वाला समझेगा भी देर से। :-)
पर, गम्भीरता से कहूं तो अच्छी लगी यह पोस्ट। और शायद सोच के तरीके में कुछ बदलाव भी लाये।

Pramod Singh said...

गुणरत्‍न सर्वसंपन्‍न बड़केवाले के छोटके शिव भैया के बुद्धि-वैभव से आप मुग्‍ध हो रही हैं कि नहीं? दुबई से कुछ चिरईब‍ुद्धि ब्‍लॉगरत्‍न अवॉर्ड आप स्‍पॉंसर नहीं करवा सकती हैं?

अफ़लातून said...

----- में हाथ धोने से काम नहीं चलेगा । हाँलाकि हमें उस भूमिका में शोषण नहीं दिखता जहाँ हम शोषक हैं । अँग्रेजी द्वारा भेदभाव दिख जाता है। नर-नारी और जाति-भेद क्यों दिखने लगा?

Beji said...

टिप्पणियों को देर से प्रकाशित करने के लिये क्षमा चाहती हूँ। नेट के बीमार होते चाह कर भी अपने एकाउन्ट तक नहीं पहुँच पा रही थी।

anitakumar said...

आप ने बहुत बड़िया और बेलेंसड पोस्ट लिखी है, तर्क एकदम सटीक। बधाई। हां ये बात सच है कि बाहर से ये बहस शायद शांत हो जाए पर अदंर ही अदंर ये सतत चलती रहेगी। अगर ज्ञान जी कह रहे हैं कि आप की पोस्ट पढ़ने के बाद उनकी सोच में कुछ अंतर आएगा तो आप का लिखना साथर्क हो गया।