Tuesday, January 22, 2008

रिक्तता

किताब हाथों में पकड़ कब आँख लग गई उसे नहीं पता था। सड़क के किनारे लगे हुए इमारतों में एक खिड़की उसके घर की थी । कहने को घर था। एक छोटा सा कमरा। एक बिस्तर,फैली हुई कुछ किताबें,लापरवाही से उतारे जूते और मोजे और एक चाय का कप जिसमें थोड़ी चाय नीचे पड़ी पड़ी सूख चुकी थी। सिगरेट की गन्ध जैसे कोई जाने पहचाने अहसास सी उसके साथ थी। बाहर ठंड और उमस थी । कुछ उसके सुबह से पहने कपड़े ने सोंक ली थी। किताब यूँ ही उठाई थी। पहले पन्ने से आगे नहीं बढ़ पाया था। टेबल लैम्प ऑन था। नज़र लगातार खिड़की पर थी। आते जाते वाहन की रोशनी खिड़की पर चड़ कर उतर जाती। थोड़ी देर तक वो मद्धम होती रोशमी को देखता। फिर नये सिरे से नई रोशनी। हर बार ओझल हो जाती। उसके दिमाग का स्विच भी इसी तरह ऑन ऑफ हो रहा था। खाली घर। खाली अहसास। अजीब सी विरानी थी इस अकेलेपन में। थोड़ी सी रोशनी खिड़की पर थी। जो आती पर हाथ नहीं लगती। वो लगातार उसे देख रहा था। कोशिश कर शायद खींच कर घर के भीतर कर सके। सम्मोहन सी थी यह रोशनी। उसकी आँखों से नज़र मिलाकर अकेलेपन के निद्रा में उसे सुला कर जा चुकी थी।

4 comments:

Pramod Singh said...

यह खाली-खाली ख..ा..ल..ी हाइकू टाइप क्‍या सम्‍मोहन?

Parul said...

आपकी पिछ्ली कुछ पोस्टस पढ़ती हूं,महसूसती हूं…कमेंट कुछ भी नही कर पाती…॥

प्रभाकर पाण्डेय said...

रिक्तता---बस इतना ही कहूँगा - गागर में सागर भर दिया है आपने। अति सुंदर।

sat pal said...

its nice to see someone from india and pleasure to see ur interest in poetry. u can visit my blog meandghazal.blogspot.com
satpal khyaal