Tuesday, January 15, 2008

कतरा-कतरा

उसके मन के स्क्रीन पर लगातार कोहरा जम रहा था। ठहरते ठहरते कोहरा आँसू का रूप लेते तो वह झट पलक झपका कर उन्हे कोनों में धकेल देती। पलकों से धकेले आँसू कोनों पर हल्की सफेदी सी जमने लगे थे। उसने कार की रियर व्यू मिरर में देखा। नहीं आई मेकअप स्मज नहीं हुआ था। मिरर में ही देखा था वॉचमैन को....हमेशा की तरह मुश्तैदी से सलाम मार कर खड़ा था। स्टार्चड मुस्कुराहट उसके होठों पर थी...पता नहीं उसकी आँखें भी नम ही लग रही थी। कार में चढ़ने से पहले बिल्डिंग के रिमोट कंट्रोल्ड काँच के दरवाज़े में रिफ्लेक्शन देखा था। थ्री पीस व्लैक सूट, बालों में रेबन का चश्मा हेयर बैम्ड की तरह था,लौरियल की लिपस्टिक की लाली और कनसीलर से छिपाये आँखों के नीचे का खालीपन। करने को तो ब्यूटीपार्लर में खीरे के टुकड़े लगाकर इन काले सायों को दूर करना चाहा था। पर उसे ठीक से सोये हुए काफी दिन बीत गये थे। अपनी टोयोटा फौरच्यूनर के दरवाजे को बंद करते ही मन पर बाँधी पकड़ खुलने लगी थी।

रेड़ियो पर हाथ गया था। धुन...89.1...कतरा कतरा मिलती है ....

धुन से लटक फिर अपनी उदासी तक पहुँच गई थी। साड़े छह बजे शाम के। रात को अभी देर थी। सड़क आँसू के पीछे धुँधला रही थी। हाथ वाईपर के बटन पर गया था। फिर फीकी सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर उभर आई। यह छींटे यूँ वाईप नहीं हो सकते।

5 comments:

आस्तीन का अजगर said...

अच्छी वर्ड पिक्चर्स हैं मटेरिअल गर्ल !! जबसे कॉस्मेटिक इंडस्ट्री के प्रोडक्ट्स महंगे हुए हैं, तब से खुशी के आंसू अफोर्ड करने लायक कहाँ रहे? और दुःख के आंसुओं पर किसका बस चलता है? रेवलोन की परत के नीचे आत्मा का मार्मिक विलाप क्यों? क्या नहीं मिला? प्यार? प्यार मिला तो साथ नहीं मिला? साथ मिला तो कोई और धोखा? सब कुछ मिला तो वह मजा नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी? आख़िर ऐसा क्या हुआ?

Rohit Tripathi said...

AAp jaise logo ko dekhkar mujhe vishwas hi nahi hota ki. log itna acha kaise likh lete hai. kasam se shabdo mein bhav bahut saaf jahlak jate hai. bahut acha likh aaapne bahut hia acha...... aapke sare blog bahut ache hai,,,,,,, ek se badhkar ek :-)

yunus said...

अच्‍छा है । मैंने किसी फिल्‍म फेस्टिवल में कोई गुमनाम सी फिल्‍म देखी थी जिसमें एक शॉट था, लड़की कार से बाहर झांकती है, कैमेरे पर बारिश में भीगा शहर का कोना नज़र आता है । कैमेरा लड़की की आंखों में झांकता है और तब पता चलता है कि बारिश बाहर नहीं यहां भीतर हुई थी, लड़की के भीतर । बस वही शॉट याद आ गया । यकीन मानिए इस फिल्‍म का ना नाम याद आ रहा है और ना कहानी । ये सीन शायद मन पर छपा रह गया था ।

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर लिखा है । आँसू भी कितनी प्रकार के होते हैं । बहते आँसू, बाहर निकलने से रोके आँसू , कोरों में धकेले आँसू !
घुघूती बासूती

Lavanyam - Antarman said...

बहुत अच्छा लिखा है ... बेजी !

ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं

ये जीवन जैसे गम का तूफान है