Wednesday, December 26, 2007

वेयर डस दिस बस गो ?!


जो हुआ अच्छा हुआ....जो हो रहा है अच्छा हो रहा है....जो होगा अच्छा ही होगा....

मेरे जीवन के महामंत्र जैसा था। दिशा चुनने की जिम्मेदारी से मुक्त होने का एक आसान तरीका।

मैं उस बच्चे की तरह हूँ जो बस में सवार है...मालूम है कि कहीं जा रहे है....पर कहाँ कुछ पता नहीं...हर हाल में मज़े करना शौक है...और किस्मत से बस अच्छी है....

यहाँ वहाँ जब बस ठहर जाती है, मैं नज़र दौड़ा लेती हूँ....हाँ बड़ा सुंदर समा है...

बेजी , तुम कवियित्री हो....लेखिका...मैं आसपास देखने लगती हूँ....क्या हूँ बिल्कुल अंदाज़ा नहीं है किन्तु यह नहीं हूँ....। बेचैन हूँ...अचानक बस में बैठे बैठे सयानी हो गई हूँ....चिन्ता हो रही है बस कहाँ जा रही है...मासूमियत खो रही हूँ....पूछने लगी हूँ जो हो रहा है क्यों हो रहा है....

बस शुरु कहाँ हुई थी पूरा नक्शा सामने रख कर सोच रही हूँ.... सब पुराने गुजरे पड़ाव फिर जी आई हूँ शायद कम्पास मिल जाये... बस नहीं रुकी...चली जा रही है...मेरे साथ तो सब अच्छा ही हो रहा है....

बेचैनी किस बात की है...कोई सम टोटल एफेक्ट ऑफ हॉरमोनल इंम्बैलेंस...कुछ सपने जो पूरे नहीं हुए...या एक इमेज में रहने की घुटन....

लिखना मेरे लिये किसी गुप्त कोड को डिकोड करने जैसा है...अक्सर नहीं जानती क्या लिखने जा रही हूँ....तरंगों का अनुवाद शब्दों में हो सके इस लिये अपने दिमाग का लिमिटेड शब्दकोष सामने रख देती हूं....लिख कर पढ़ कर देखती हूँ कि क्या चाहती हूँ....

मुझे कौन पढ़ रहा है, मैं किस को पढ़ रही हूं.....कुछ निश्चित नहीं है,नियंत्रित नहीं है, अनुशासित नहीं है....कुछ ऊर्जा है जो या तो तीव्र होगी या क्षीण....

मैं अपनी अवस्था बदलना चाहती हूँ....

ड्राइवर की सीट पर बैठना चाहती हूँ....रास्ते का अंदाज़ा लगाना चाहती हूँ,पड़ाव निश्चित करना चाहती हूँ....

डैमिट वेयर ऐम आई ट्रैवलिंग टू....फॉर गॉड्स सेक गीव मी ए क्ल्यू?!

मम्मी पापा से मिलने जा रही हूँ...साथ ही बीते कुछ और पलों से भी.... पज़ल के सब टुकड़े मिल जाये तो तस्वीर शायद साफ नज़र आये.....

लेट मी सी इफ आइ कैन मेक सेंस आउट ऑफ दिस इन न्यू इयर!!

नया साल आप सभी के लिये शुभ हो!!

Saturday, December 22, 2007

दुबई में बलॉगर मीट के बहाने से

हिन्दी ब्लॉग जगत से जुड़ना अपनेआप में एक अनुभव रहा है। शब्दों में इतनी ताकत होती है कि वह इंसान की परतें बहुत आसानी से खोल देता है। हर नाम से...फिर चाहे वो बेनाम ही क्यों ना हो ....एक व्यक्तित्व जुड़ जाता है। शब्दों में जो दिखता है हम चेहरे में तलाशने की कोशिश करते हैं।

ब्लॉगर मीट काफी प्रचलित हो निकला है। जो लिखते हैं वो बहुत अच्छे से जानते हैं कि वो अपने ही शब्दों से दिखते नहीं हैं। जब वास्तव में मिलना होता है तो पज़ल के बाकी पीसस फट हाथ लग जाते हैं। यू ए ई में दुबई में हाईकू बहाना बनी। मीनाक्षी जी और अर्बुदा ने पूर्णिमाजी के नेतृत्व में मिलने का आयोजन किया। विध्याधरजी और स्वाती से शब्दों जितनी पहचान भी नहीं थी। दुबई का पौश इलाका...ग्रीन्स..जहाँ अर्बुदा और मीनाक्षीजी रहती हैं मिलना तय हुआ।
जयसन (लाल शर्ट में) मुझे और बच्चों को लेकर ग्रीन्स पहुँचे। वहाँ गौरव (सफ़ेद शर्ट) ,अर्बुदा के पति से मुलाकात हुई। पूर्णिमाजी अपने पति(आसमानी शर्ट) प्रवीणजी के साथ पहले ही पहुँच चुकी थी। हम हाईकू के बारे में सोचने समझने पार्टी हॉल में पहुँचे। और ब्लॉगर्स के पति पहली बार एक ही हालत से गुजरने वाले लोगों से मिल रहे थे। वे इस विमर्श में जुट गये कि ब्लॉगिंग रोग है कि नहीं। बहुत जल्द उकता कर जिन्दगी के अन्य पहलुओं पर बात होने लगी और फिर बच्चों की खिलखिलाहट के बीच चाय, दफ्तर और दोस्ती।



बच्चे बहुत खुश थे। स्लाइड्स, पार्क , दोस्त और पापा। दिस वास देयर डे। गुड़िया बीच में दौड़ कर आकर बोली ...योर मेरी कठपुतलियाँ फ्रेन्ड्स आर नाईस। जोयल भी बहुत खुश था। खेलने के लिये अर्बुदा के जुड़वा बच्चे ईशान और इला और मीनाक्षी जी के दोनो बेटे वरुण और विद्युत।



वरुण और विद्युत भी इस आक्रमण से खुश नज़र आ रहे थे। घर के हर कोने में बच्चे और खिलौने पहुँच रहे थे। विद्युत ईशान को सँभाल रहा था और वरुण मम्मी की ब्लॉगिंग के साईड एफेक्ट्स देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था।





जयसन का ध्यान वरुण और विद्युत ने तुरंत खींच लिया। वरुण शांत और संयत व्यक्तित्व और विद्युत का एलक्ट्रीफाइंग प्रेसेंस। वरुण की रुचि कविता, गिटार और चेस। विद्युत की रुचि ड्रम्स, ग्राफिक्स और पेन्टिंग। जयसन और दोनों का संवाद काफी देर तक चला। जयसन इस उम्र में इनकी सोच और समझ से प्रभावित हो रहे थे। कोशिश में लगे थे की जाने इसमें से कितनी सोच इनकी अपनी है और कितनी यहाँ वहाँ से उठाई हुई।विद्युत अपने पेन्टिंग्स का कलेक्शन दिखा रहा था। जयसन समझ रहे थे की इन बच्चों के पास ना सिर्फ समझ है बल्कि अपनी एक मौलिक सोच है। जीवन का यह खूबसूरत पड़ाव जहाँ सपने , आदर्श और दिशा का महत्व सबसे अधिक होता है। आवाज़ बदल जाती है और अंदाज़ की तलाश होती है।





वरुण को प्रकृति से प्यार है। हर बात को गहराई से सोचना उसकी आदत।









विद्युत का हाथ कलाकार का है। पेप्सी और कोक के डिब्बे भी उसके हाथों में कलाकृति का आकार ले लेते हैं।





इला और ईशान अर्बुदा के जुड़वा बच्चे हैं। इला चंचल है और ईशान नटखट और बातूनी। आंटी, अंकल,भैया ,दीदी और हाँजी कहते कहते बहुत जल्द हम सबके दिल से जुड़ गया।
जोयल वरुण के साथ चेस खेलते खेलते अय्ययो करूँ मैं क्या सुकु सुकु गा रहा था। वरुण जोयल की चाल पर हैरान था। करीबन बीस मिनट तक खेल चला फिर जोयल को मात दी।
गुड़िया बूगी वूगी के ताल पर नाचती रही। वह अपने आप में ही खुश थी।
इस दौरान हमारी बातचीत चल रही थी। हाईकू, भाषा, ब्लॉगिंग,हिन्दी...कई बातों पर चर्चा हुई। स्वाती लिखने की तरफ काफी गंभीर नज़र आई। अर्बुदा अपनी सुंदर मुस्कुराहट से जबतब रौशनी बिखेरती रही। मीनाक्षी जी का ध्यान खान पान और बाकी व्यवस्था पर था। विद्याधर जी कश्मीर और कश्मीरी पंडितों के बारे में बात कर रहे थे।
पूर्णिमाजी बिल्कुल अध्यापिका लग रही थी। विकी, अनुभूति, हाईकू और ब्लॉगिंग सब एकदम सहजता से समझा रही थी।
मीटिंग खत्म कर जब पहुँचे तो जयसन हाईकू और सुडुकू का अंतर समझना चाहते थे। बहुत सँभलकर पूर्णिमाजी से हिन्दी में बात करते रहे। गौरव इस दौरान बाकियों को चाय पिला चुके थे। और ईशान पूर्णिमा जी के पति की गोदी में कमफर्टेबली सीटड था।
वे सभी किसी एक रोग से ग्रसित रोगियों की फैमिली के सपोर्ट ग्रूप की तरह एक दूसरे को दिलासा और सहानुभूति दे रहे थे।स्वाती और पूर्णिमाजी को जल्दी थी सो वे जल्दी निकल गये।
हम पीछे रह गये। देखते ही देखते यह साथ घनिष्टता में बदलने लगा। पूरे परिवार के सभी लोग एकदूसरे में रम रहे थे। काफी अर्से बाद ऐसा होता देख रही थी। हर सदस्य अलग था और साथ रह कर खुश।
मीनाक्षी जी और अर्बुदा ने खाने के लिये रोका। हम इससे पहले कि उनके विचार बदले, जल्दी से मान गये। मीनाक्षी जी ने वाईन लीफ में चावल की फिलिंग कर स्टार्टर्स बनाये। चिकन और मटन भी फट तैयार हुआ। अर्बुदा के किचन में चावल, रोटियाँ, सूप, दाल और मटर पनीर पका। हम मेहमान नवाज़ी का आनंद ले रहे थे। भूख ,खाने की महक से बढ़ गई।
जब दस बजे सब टेबल के आसपास बैठे, नई दोस्तियाँ पनप चुकी थी। ईशान जयसन की गोदी में सो गया। जोयल का बुर्ज आल आरब से बड़ा होटल ब्लॉक्स से तैयार था। इला बिस्तर में जाकर सो गई। गुड़िया की पूरियाँ खिलौनों के बरतनों मे तल रही थी।
हम तीनों बिछड़ी सहेलियों की तरह मिल कर बेहद खुश थी और बात बेबात मुस्कुरा रही थी। जयसन और गौरव अपने बचपन के किस्से सुना रहे थे। वरुण डॉक्टर्स के जीवन के उतार चढ़ाव के बारे में जानना चाहता था। विद्युत दुबई और सउदी अहब में पले बच्चों का अंतर बता रहा था।
एक शाम ...ब्लागिंग का साइड इफेक्ट....नये रिश्तों की बुनियाद बन चुकी थी।

Monday, December 10, 2007

वो

कमरे में हल्का उजाला था। जैसे रात की रोशनी में साये सहमें खड़े हों। लकड़ी की अलमारी पूरी बंद नहीं थी। कोई कपड़े का गहरे रंग का लटका नाड़ा जैसे चढ़ते चढ़ते रह गया हो। लगता था कोई साँप अलमारी में घुसने को है। टेबल लैंप का बल्ब जल नहीं रहा था पर चाँदनी में बिल्ली की आँख सा चमक रहा था। खिड़की पर पर्दों के साये गुसुर फुसुर कर रहे थे...किसी साजिश की तैयारी हो रही हो जैसे।

उसके माथे पर पसीना था। गला सूखा हुआ। प्रिड्ज की आवाज़, कहीं पास के घर में कोई हँस रहा था शायद, पंखा बंद मनहूस चेहरा लटका कर खड़ा था।

वह कोई ऐसी चीज़ को तलाश रहा था जो उसे कुछ सुकून दे सके। देखे हुए सपने को फिर सिर्फ सपनों के अहसासों में बदल सके। तकिये को ही कस कर पकड़ा था। पलक झपकी नहीं और पूरा सपना रिवाइन्ड होकर आँखों में फिर चलने लगा।

तेज़ तूफानी हवायें। आसपास की हर चीज़ उखड़ कर उड़ रही थी। पर उसका ध्यान उधर नहीं था। उसके चेहरे का रंग सफ़ेद, आँख में ऐसा खौफ जो उसने जागते हुए कभी महसूस नहीं किया था।
ज़मीन पर दोहरा हुआ मुट्टियाँ बींच कर, आँख बंद कर तूफान में खड़ा था। डरा हुआ....डूबते हुए जैसे खुद ही उभरने की कोशिश कर रहा हो।

हवा का रुख ठीक उसकी तरफ था। सपाट बिखरी हवायें सिमटती गोल होती जा रही थी। तेजी से उसकी ओर। उसे हार का अंदाज़ा था शायद। उबलते आँसू पलकों से गिरे उससे पहले हवा में उड़ गये थे।

हवा ने उसे जड़ कर निचोड़ के उसकी जान सोंक ली.....वह गिरा था निढ़ाल होकर । पर देख सकता था। हवा दूर जा रही थी। फिर जैसे ठिठक कर रुकी। एक क्षण के लिये सब रुक गया। धूल का हर कण स्थिर हो गया। एक चेहरा उभर आया।

कभी भूल नहीं सकता उसको। उसके लंबे केश लहरा रहे थे। और वो हँसती हुई फिर तूफान बन गई।

Sunday, December 9, 2007

प्रात:काल झलक दिखला जा

(सुबह साढ़े पाँच बजे)

नेगी आउट हो गये । चलो अच्छा हुआ। वैसे भी शायद उन्हे डान्स करना नहीं आता।

हाँ । चारों में सबसे कमज़ोर वही थे।

मैं चाहता हूँ,प्राची जीत जाये।

भला क्यूँ?!

अच्छा नाचती है।

संध्या बेहतर नाचती है।

नाचती है पर बिल्कुल विनम्र नहीं है।

विनम्रता का नाचने से क्या संबंध?

संबंध है।

कैसा?!

कोई किसी भी चीज़ में अच्छा हो लेकिन विनम्रता एक ऐसा गुण है जो होना चाहिये।

आप जिसे घमण्ड समझ रहे हैं वह घमण्ड नहीं गर्व है। अपने गुण पर गर्व करना गलत है?

हाँ अगर किसी को ठेस पहुँचती हो तो…

ठेस पहुँचती ही क्यूँ है जो अच्छा है वो पूरे विश्वास और अभिमान से मस्तक ऊँचा करके खड़ा हो तो बुराई क्या है?

प्राची विनम्र है....अंग भी फिज़ूल में दिखाना पसंद नहीं करती...कुलीनता के लक्षण हैं यह।

दिस इस एबसर्ड...पहली बात तो संध्या ने कपड़े कभी इनएप्रोप्रियेट पहने ही नहीं....दूसरी बात प्राची कैब्रे करती है वो भी पूरे कपड़ों में....हू इस इनएप्रोप्रिएट....ऐन्ड हैविंग डबल स्टैन्डर्ड्स….सच तो यह है कि प्राची बच्ची है...अपनी रूमानियत से बाहर नहीं निकली....आप देखते रहिये कैसे पँख पहनेगी आगे ....वैसे भी बैक डोर एन्ट्री है....


प्राची दिन ब दिन बेहतर होती जा रही है...क्या तुम इस बात से इंकार कर सकती हो?

नहीं लेकिन मैं कौन कितनी तेजी से बेहतर हो रहा है नहीं देख रही....परफौर्मेन्स के दौरान कौन बेहतरीन है यह देख रही हूँ

संस्कार और पोटेन्शियल हो तो अच्छा बेहतर हो सकता है.....बेहतरीन हो सकता है
पोटेन्शियल देखने की क्या जरूरत है जब परफौरमेंस सामने हो...
कुछ भी हो...अगर बात पब्लिक वोटिंग पर है तो पब्लिक के नज़रिये को ध्यान में रखना होगा...

आपको क्या लगा...मैं प्राची और संध्या की बात कर रही हूँ...मैं पब्लिक की ही बात कर रही हूँ। जिनकी मानसिकता श्रेष्ठतम को भी सिर झुकाये ही देख सकती है। जो बेहतरीन को सामान्य के सामने सर झुकाने को बाध्य कर देते हैं। विनम्रता की आड़ में एक तरह से जबरदस्ती आदर की अपेक्षा करते हैं। अगर हम चाहते हैं की आगे जायें तो हमें इस मानसिकता को बदलना होगा। श्रेष्ठता जिस गुण में देखी जा रही है उस गुण को आंक सकने की अक्ल होनी चाहिये। आप खाना बनाने की कोई प्रतियोगिता करें तो क्या देखेंगे...खाने का स्वाद.पौष्टिक तत्व, बनाने की विधी, उसे परोसने की अदा,उसका रंग, महक, खुशबू….बनाने वाले के सौंदर्य से क्या लेना देना?

हाँ अगर खाना कोई और परोस रहा हो तो कोई लेना देना नहीं है। लेकिन अगर परोसने वाला भी वही है तो उसकी खूबसूरती भी मायने रखती है।
यहाँ तो हमें यह ग्रीन रूम ले जा रहे हैं, बिना मेक अप दिखा रहे हैं, उनका परिचय करवा रहे हैं....तुम्हे किसने कहा की सिर्फ डान्स की प्रतियोगिता है...?

बच्चों का दूध उबाला?

हाँ

पानी की बोतल भरी?

हाँ, मैं नहा के आता हूँ

(नास्ते के टेबल पर)....देखो घना कोहरा है,गाड़ी पहले ऑन करके थोड़ी देर रखना,फिर चलाना...ध्यान से...पार्किंग लाईट ऑन करके

वैसे जीतेगी तो प्राची ही....

आई कार्ड लिया...और पर्स...

शर्त?!

हाँ (हारकर) जब तक आप जैसे ही लोग हों वही जीतेगी....

तुम वोट करोगी?
मुझे और कोई काम नहीं है…

आप?

(एक शरारती मुस्कान के साथ) तुम्हे क्या लगता है ?!