Saturday, March 24, 2007

पत्रकार क्यूँ बने ब्लौगर- निष्कर्ष

जानती हूँ की आपमे से काफ़ी लोग चाह्ते हैं की अब इस सवाल को फ़िर से उठा कर और विवाद नही खडा़ किया जाये। किन्तु सवाल उछालना आसान होता है…जवाब ढूँढना मुश्किल । लक्ष्य जवाब था इसलिये उस तक पहुँचना मैं अपना दायित्व समझती हूँ ।

पिछले दिनों की बहस में कई लोगो ने हिस्सा लिया। काफ़ी तथ्य सामने आये। किन्तु ऐसा महसूस किया कि इस सवाल ने पत्रकार और ब्लौगर की दूरियाँ और बढा दी हो । इस प्रश्न के पीछे कदापि यह उद्देश्य नहीं था। यह अवांछित था। मै इस दूरी को बढाने मे अपने योगदान के लिये क्षमा मांगती हूँ ।

इस निष्कर्ष तक व्यक्तिगत रूप से पहुँचा गया है। आप में से जिसके भी विचार, शब्द और अवलोकन का इस्तेमाल यहाँ किया है मैं उनकी शुक्रगुजार हूँ ।

प्रश्न की पहली कमजोरी थी कि प्रश्न में पूर्वाग्रह था कि पत्रकार और ब्लौगर दो अलग तरह के जीव है। जबकि दोनों मे काफ़ी हद तक ओवरलैपिन्ग थी। पत्रकार होते हुए भी कुछ ब्लौगिन्ग सिर्फ़ ब्लौगर की ही तरह कर रहे थे। वे इस प्रश्न के दाय्ररे मे सिर्फ़ इसलिये थे क्यूँ कि पेशे से वह पत्र्कार थे।

रवीश जी के शब्दों में ,"ये आत्ममुग्धता का नया संस्करण है। जब से लिखने लगा हूं लगता है मुक्तिबोध या मोहन राकेश हो गया हूं। पता नहीं कहासे आ रही है यह ब्लागमुग्धता। एक चाहत सी उमड़ रही है कि मेरा लिखा अजर अमर होने वाला है। कहीं कोई आलोचक इनकी समीक्षा कर रहा होगा। किसी विश्वविद्यालय में कोई पीएचडी कर रहा होगा। विषय रवीश कुमार का ब्लागमन। क्या ब्लागमुग्धता से आप भी ग्रसित हो रहे हैं। मनोविज्ञान में इसका निदान अभी नहीं है। होम्योपैथी मे पता किया है। कोई ठीक जवाब नहीं दे रहा है। एक सुबह लगा कि काश अखबार निकलना बंद हो जाए और लोग सुबह उठ कर मेरा ही ब्लाग पढ़े। संसद में मेरे ब्लाग पर चर्चा हो। और चुनाव में मेरे ब्लाग को बजट में एलोकेशन देने का वादा हो। क्या मैं निरंकुश होने वाला हूं? क्या ब्लाग पर लिखना बंद कर दूं? ऐसा क्यों हो रहा है? मैं इनदिनों हर काम छोड़ कर ब्लाग पर लगा रहता हूं?" यह एक आम ब्लौगर की मानसिक दशा का एकदम सटीक वर्णन था ।

मेरा एक प्रश्न था- इनका लिखा दुनिया पढ़ती आयी है ,कहा दुनिया सुनती आयी है। नाम भी जाने पहचाने हैं। छपे शब्दों के जादू से तो यह पूर्वपरिचित हैं । फिर क्या वजह हुई कि यह ब्लौगिंग करने लगे???!!!
इस प्रश्न का उत्तर अनामदास जी ने काफ़ी खूबसूरती से दिया।
हमारे मुहल्ले का सबसे सफल हलवाई मिठाइयाँ, समोसे-कचौरी बनाने के बीच समय निकालकर अपने लिए रोज़ तवे पर चार फुल्के ज़रूर सेंकता था, बचपन में हम सोचते थे कि यह पागल तो नहीं, ढेर सारी तरह-तरह की मज़ेदार खाने-पीने की चीज़ें बनाता है और अलग से मेहनत करके सूखी रोटियाँ क्यों खाता है.

बात अब समझ में आती है, बेचारा हलवाई मिठाइयाँ तो बाज़ार की ज़रूरत पूरी करने के लिए बनाता था लेकिन उसे संतुष्टि फुल्के खाकर ही होती थी.
अब पड़ोस की किसी चाची ने तो उससे कभी नहीं कहा, "फुल्के हम घर की औरतें बनाती हैं, तू तो अपनी कचौरियाँ ही खा."



कुछ और जो प्रश्न थे-

क्या संपादकों ने इनके शब्दों को इस तरह अपाहिज किया है कि इन्हे अपनी सोच रखने का यह ज़रिया सूझा??
क्या यह दिये हुए विषयों पर बात कर के निराश हो चुके हैं....??
क्या जो लगाम नौकरी ने इन पर लगाई है....उसे बेलगाम कर बेबाक सोच हम तक पहुँचाना चाहते हैं?
क्या यह ब्लौगिन्ग को अपनी कुण्ठा निकालने का एक साधन मानते है?!!

इन सभी का जवाब हाँ मे था…पत्रकारो और ब्लौगर दोनों की तरफ़ से।
पत्रकारों का ब्लौगर्स ने काफ़ी खुशी से स्वागत किया था- जीतू भाई की रवीश जी को दी गई टिप्पणी -
"चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है। हम चिट्ठाकारों के बीच आपका आना विशेष प्रसन्नता की बात है। आपके व्यापक अनुभव से निश्चित ही चिट्ठाकारी समृद्ध होगी और इसे नई दिशा भी मिलेगी। "
से लगभग सभी चिट्ठाकारों का पत्रकारों की तरफ़ का शुरुआती रुख साफ़ दर्शाता है।

मेरी समीक्षा में मैने कहा था ,"अगर इन पत्रकारों के ब्लौग का अवलोकन किया जाये तो इनके बीच एक सामाजिक समता वाद साफ उभरता है । यह एकजुट हैं । "

इस बात का भी अभय जी ने खन्डन किया,"हो सकता है मेरी राय प्रमोद भाई से मेल खाये..क्योंकि वो मेरे दोस्त हैं और कई मसले ऐसे हैं जिस पर हम एक तरह से सोचते हैं और कई मसले ऐसे भी हैं जिस पर हमारी राय मुख्तलिफ़ हैं.. फिर रवीश कुमार से मेरा परिचय तक नहीं .. लेकिन उनके ज़्यादातर विचारों से मैं बराबर सहमत होता हूँ.. अविनाश से एक दफ़ा मिला हूँ.. पर उनसे कई मामलों में असहमतियां हो सकती हैं.. और बहुत सारी सहमति भी...लेकिन इस सहमति में कोई योजना नहीं है..""

और दूसरी ओर कुछ सामाजिक सरोकारों वाले लोग जो अखबारी दुनिया में आये तो थे अपने कुछ सरोकारों को ज़बान देने अपनी बात कहने के लिये मगर जिनके मुँह पर पट्टियां बाँध दी गईं हैं ताकि वो अपनी बात न कह सके.. और उन्हे आगे खड़ा कर के पीछे से बाज़ार अपनी बातों का टेप चला रहा है.. ये पत्रकार बाज़ार के द्वारा सताये गये हैं इसी लिये एक मंच मिलने पर ज़ोर ज़ोर से अपनी बात कहरहे हैं"

जहाँ तक मैं समझती हूँ हममें से अधिकांश लोग इस से सहमत है। काफ़ी लोगो को शायद इन्तज़ार भी था कि यहाँ यह पत्रकार ऐसी बातें कहेंगें जो यह बाज़ार और नौकरी की सीमाओ में रहकर नही कह पा रहे। काफ़ी हद तक रवीश जी इस लक्ष्य की ओर चल भी पडे। और जैसा की प्रमोद जी ने कहा हमें लगभग हर रोज़ ताज़ा गुलाब जामुन नसीब होने लगे।

फ़िर कब और कहाँ यह रुख बदला और क्यूँ ?

शायद इनका जवाब जीतेन्द्र जी की इन टिप्पणियों में है। सन्दर्भ है दो कवरेज का ।"

मै सबसे पहले यह जानना चाहूंगा कि नीलेश वाले मसले मे हमारे मीडिया वाले ब्लॉगर साथियों ने क्या किया?
क्या नीलेश से बात की गयी?
क्या उस रिपोर्ट पर कोई स्पष्टीकरण दिया गया?
क्या कोई कवरेज की गयी?

भैया कहना आसान है, और ये तो कोई नही मान सकता कि अविनाश भाई से कोई हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे मे पूछे और अविनाश भाई नारद के बारे मे बात करना भूल जाए। कैसे भूल गये भैया? अगर भूल भी गए तो कोई बात नही, नीलेश को कुछ कहो तो कम से कम, वो भी नही कहना तो चलो कोई बात नही, क्या अब भी हम कुछ उम्मीद रखें?
जिस तरह अगर आपको ब्लॉग मे तकनीकी दिक्कत आए और हम आपकी सहायता करने आगे ना आए, तो आपको बुरा लगेगा कि नही। ठीक उसी तरह आप ब्लॉगर है और मीडिया से है इसलिए मीडिया सम्बंधी बातों मे भी हमे उम्मीदे भी आपसे ही है।

अविनाश भाई, यदि हमने खबर को गलत तरीके से लिया तो आपने भी बात करके हमे साफ़ साफ़ नही बताया कि आखिर माजरा क्या था? कैसे एडीटर की कैंची सिर्फ़ नारद की बात पर चली, बाकी पर नही। स्पष्टीकरण तो आपको ही देना होगा, या नीलेश को।"

दो बातें थी-
• हिन्दी चिट्ठाकरिता का जिक्र्…नारद नदारद…जबकि बाकी सभी मुख्य लिंक मौज़ूद
• पत्रकारों का खास कवरेज


नारद की पत्रकारों से एक अपेक्षा थी…जो पूरी नहीं हुई। हिन्दी चिट्ठाकारिता का जो रूप मिडीया में दिखाया गया वह झूठ ना होकर भी पूरा सच नही था।
अविनाश जी ने इस बात का उत्तर देते हुए कहा था
"हिंदुस्‍तान में नीलेश ने मोहल्‍ले का प्रचार नहीं किया। बल्कि मोहल्‍ले के से जुड़े एक अदद अविनाश से इंटरनेट पर हिंदी ब्‍लॉग्‍स की बढ़ती धमक पर राय ली। कोई बता दे कि एक भी बात मैंने अपनी प्रशस्ति में गायी हो। अब बिना किसी परिचय के नीलेश ने मुझसे ही बात करने की ज़रूरत क्‍यों समझी, ये तो नीलेश से ही पूछा जाना चाहिए। उसके बाद आरोप लगाना चाहिए।"

कुछ भी साबित करने की दिलचस्पी भी मेरी नही है ।

सोचने वाली बात है की नारद को अपेक्षा थी जो पूरी नहीं हुई।
अविनाश जी की ही दूसरी टिप्पणी ,"जब इनकी परिधि के बाहर कोई चमकता हुआ-सा दिखता है, इन्‍हें घबराहट होने लगती है। " भी सोचने पर मजबूर करती है।
क्या यहाँ प्रतिस्पर्द्धा का कोई मुद्दा है??
प्रतिस्पर्द्धा से तो अधिकतर प्रोडक्ट में उन्नति ही आयी है। इसलिये अगर ऐसा है भी तो यह हिन्दी के लिये अच्छा ही होगा।
किन्तु ऐसा भाव इससे पहले नही था। शायद जरूरत नही रही हो…। या शायद उस समय बाज़ार में इसका मोल ना के बराबर था।
प्रतीक जी की टिप्पणी ( जो की हिन्दी ब्लौग्स को सन्चालित करते हैं ) इस बात को और साफ़ करती है-
"जहाँ तक नारद का प्रश्न है, इसका मूल पूर्णत: लोकतांत्रिक विचारधारागत प्रणाली पर अवस्थित है और किसी अन्य ब्लॉग एग्रीगेटर के विरुद्ध नहीं है चाहे उसे कोई और ब्लॉगर खड़ा करे या बाज़ार या फिर कोई और। इसका उदाहरण एक अन्य हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर HindiBlogs.com है। जब किसी कारणवश मैं HindiBlogs को बंद करने पर विचार कर रहा था, तब नारद के प्रबन्धक जीतेन्द्र चौधरी ने ख़ुद इसको बन्द न करने की अपील की थी और नारद की इसी सर्वसमंवयी नीति के कारण आज भी हिन्दीब्लॉग्स.कॉम सुचारू रूप से अपनी भिन्न नीति के अनुसार कार्यरत है। नारद का काम महज़ एग्रीगेशन को अपने वैचारिक आदर्शों, जो हिन्दी ब्लॉग जगत के शुरुआती दौर से उसकी उन्नति के साथ सहज तौर पर विकसित हुए हैं, को आधार बनाकर हिन्दी चिट्ठों को पेश करना है।"


जगदीश जी नारद को एक अनूठा प्रयोग कह्ते हैं । …यह है भी अनूठा । और कितनी भाषाओं में ऐसा प्रयोग है? कहाँ लोग सिर्फ़ भाषा, साहित्य और सँस्क्रिति के प्रेम की वजह से चिट्ठाचर्चा करते हैं …?

आर्यभट्ट ने शून्य दिया था…कुछ नया सन्सार को देने के काबिल हम आज भी हैं ।

इस्वामी जी ने एक लिंक दिया था-http://www.upi.com/NewsTrack/Business/20070125-034637-2375r/

पढने लायक लगा। अमेरिका मे प्रिन्ट मीडिया मे लोगो के नौकरी खोने की बात थी।

वहाँ से,


"A sea change in the way people get and read news, not to mention the way they search for jobs, used cars and consumer products, was the primary contributor," the company said.
"These organizations will continue to make adjustments as their focus shifts from print to electronic," Chief Executive John Challenger said. "Until they can figure out a way to make as much money from their online services as they are losing from the print side, it is going to be an uphill battle." "

यह चिन्ता सिर्फ़ अमेरिका के मीडिया की नहीं हो सकती। यह बदलते दौर में हर मीडिया हाउस की हो सकती है। ऐसे में इस सभावना से पूर्णतया असहमत नही हुआ जा सकता। हो सकता है की मीडिया बाज़ार का अन्दाज़ा लगाना चाह्ती है।
बहरहाल इस थ्योरी को साबित भी नही किया जा सकता… और रद्द भी नही किया जा सकता। कन्स्यूमर होने के नाते हम सजग जरूर रह सकते हैं । और क्या पता फ़ुल्के बनाते बनाते ग्रह उध्योग ही शुरु कर सकें ।

एक प्रश्न था क्या यह समाज को कोई दिशा देना चाह्ते हैं ?
चाहती थी कि उत्तर हाँ मे हो…किन्तु इसका उत्तर मिला ही नहीं ।फ़िर दुहराना चाहूँगी ,"पत्रकार मदद करने में सक्षम ज़रूर हैं । बेबसी की आवाज़ नहीं होती…यह उसे अवाज़ दे सकते हैं । यह समाज की सोच तथ्य सामने रख कर बदल सकते हैं । यह नेताओं के चेहरे से नकाब खींच सकते हैं । यह ज़रूरत की जगहो पर सही सहायता नियोजित कर सकते हैं । यह क्रान्ती और शान्ती की आवाज़ हो सकते हैं।"क्या कोई भी ऐसा पत्रकार नहीं जो वास्तव मे समाज को एक सार्थक सही दिशा देना चाहता है?

एक सवाल यह भी था- क्या पत्रकार हम जैसे आम ब्लौगरों की तरह ही हैं......??!!!
शायद नही ।
कई कारण हैं ।
• लेखन से इनका पूर्व परिचय
• अनुभवों की विविधता
• मीडिया से खास सम्पर्क
• सनसनीखेज़ खबरों के बीच की इनकी ज़िन्दगी


कहते हैं कुत्ता आदमी को काटे तो वह खबर नहीं है…आदमी कुत्ते को काटे तो खबर है।
पर ज़िन्दगी अखबार नही । यहाँ कई घरों मे कुत्ते अखबार बाहर से उठा कर घर में लाते हैं । टी वी मे निठारी की खबर जब पापा देख रहे होते हैं …माँ पूर्णतया आश्वस्त हो अपने बच्चे को सुला रही होती है। वूल्मर की हत्या बातचीत चालू करने का सहारा बन जाती है।

हर इन्सान की अपनी खुशियॉ और मज़बूरिया हैं । अपनी उपलब्धियाँ और निराशाये हैं ।

हम मे से जिनके पास अपना ब्लौग है…वो जाकर अपनी ज़िन्दगी का कच्चा चिट्ठा कीबोर्ड से ब्लौग पर उतार आता है। जो झाँकना चाहता है झान्क ले…नही तो नही सही…

हाँ बात जितनी रुचिकर ढ़ंग से कही जायेगी उतने लोग पढना चाहेंगे । सच, जज़्बा, साहित्य,बहस, तकनीकी सुझाव्…या बस यूँ ही कुछ भी…जो भी रोचक और दिलचस्प होगा पढा जायेगा।

और पत्रकार आकर लिखे…तो हम कितनी ही ज़िन्दगियो को करीब से देख पायेंगे । उनके अनुभवों से कुछ हमारी धारणाओं को रूप मिलेगा… हमारी बातों से वह सामान्य ज़िन्दगी के करीब रहेंगें । कुछ दोस्त बनेंगे …। कुछ सपने जो हम स्वयं पूर्ण करने मे सक्षम नही …वो एक दूसरे के साथ चलकर पूरा करने में सक्षम होंगें । अलग अलग कार्यक्षेत्र के लोग दुनिया के अलग अलग जगह से जुडेगे। हम भी थोडा सा समाज का निर्माण करेंगें।

अनामदास जी ने कहा,"कुछ लोग इस बात से चकित हैं कि इतने पत्रकार क्यों ब्लॉग लिख रहे हैं लेकिन मैं तो सोच रहा हूँ जिन्हें नाज़ है क़लम पर वो कहाँ हैं. बहुत कम पत्रकार ब्लॉग लिख रहे हैं, शायद उन्हें मालिक की चक्की पीसने से फ़ुरसत नहीं है या फिर उन्हें अभी माध्यम के तौर पर ब्लॉग की ताक़त और उसके मज़े का अंदाज़ा नहीं है. ब्लॉग लिखने की ज़रूरत शायद हर दूसरे पत्रकार को देर-सवेर महसूस होगी."

मैं उम्मीद करती हूँ की हमें ऐसे पत्रकारों की कलम से परिचित होने का अवसर मिलेगा।

जैसा की प्रमोद जी कहते हैं ,"जैसे-जैसे सुलभता बढ़ेगी, नये खिलाड़ी आयेंगे. बाज़ार के विचार, सेक्‍स और सामान बेचनेवाले.हमारे लिए तो वह स्‍वास्‍थ्‍यकर चुनौती होनी चाहिये. नये चैलेंजेस का मज़ा लेने की बजाय हम नये विद्यार्थियों की तरफ ढेला क्‍यों फेंके?"

उम्मीद है की ऐसे लोग भी आगे आयेंगे जो हिन्दी चिट्ठाकारिता को नई चुनौतियों से लडने के काबिल बनायेंगे ।

बहस यहीं समाप्त करती हूँ ।

इस बहस से किसी को भी ठेस पहुँची हो तो क्षमा चाहती हूँ । किन्तु समझती हूँ कि बिना कहे, पूछे, सोचे…समझे राय बना लेने से अच्छा है कि बहस हो…।

ना जाने क्यूँ ऐसा लगता है की हम जितने भी लोग हैं सभी अपनी मिट्टी की सौन्धी खुश्बू से बहुत प्यार करते है…
ख्यालो मे बहुत ख्वाब पाल कर चलते हैं …
कुछ कहना चाहते हैं …कुछ करना चाहते हैं …


क्या कुछ पक्की …कुछ कच्ची घोडिया मिलकर इस खेल का मजा नहीं ले सकते…??

Wednesday, March 21, 2007

पत्रकार क्यूँ बने ब्लौगर ??

हर ब्लौगर की ब्लौगिंग करने की एक वजह होती है। सभी कुछ ना कुछ कहना चाहते हैं । थोड़ा दिमाग कीबोर्ड से अपने ब्लौग पर उतार देते हैं। अगर कोई पढ़े तो अच्छा लगता है....आखिर कोई मुझे भी सुनता है। खुद के शब्द कम्प्यूटर स्क्रीन पर देख कर भी मन एकदम प्रसन्न हो उठता है।
नारद पर अपने ब्लौग का लिंक और उस पर आई हिट्स भी देख कर एक अजीब सी खुशी हासिल होती है। खुद को लेखक,कवि और ब्लौगर के रूप में देखना भी मन को आनन्दित कर देता है।

छपे शब्दों में एक अजीब सी मुग्धता होती है। कुछ चित्त को सम्मोहित करती सी ....।

आये दिन महसूस किया की काफी पत्रकार ब्लौगिंग पर उतर आये हैं। उनका जोश भी उनकी तरफ एकदम से ध्यान आकर्षित कर देता है।


थोड़ा आश्चर्य हुआ.....।

इनका लिखा दुनिया पढ़ती आयी है ,कहा दुनिया सुनती आयी है। नाम भी जाने पहचाने हैं। छपे शब्दों के जादू से तो यह पूर्वपरिचित हैं । फिर क्या वजह हुई कि यह ब्लौगिंग करने लगे???!!!


कहते हैं कलम इस दुनिया में सबसे सशक्त साधन है।

यह क्रान्ती, शान्ती और भ्रांति लाने में सक्षम है।

मन हुआ कि मैं इस विषय को थोड़ा और कगालूँ।

ब्लौगिंग के कुछ फायदे एकदम साफ थे ।
• यह असम्पादित है
• तुरंत प्रतिक्रिया मिलती है
• सीमारहित शब्दों की संख्या का इस्तेमाल किया जा सकता है
• विषयों का फैलाव बहुत है
• बेबाक राय दी जा सकती है
• विश्व व्याप्त पहुँच है

मैं जितना इस विषय के बारे में सोचती हूँ मेरे मन में और सवाल उठ जाते हैं ।

क्या संपादकों ने इनके शब्दों को इस तरह अपाहिज किया है कि इन्हे अपनी सोच रखने का यह ज़रिया सूझा??

क्या इन्हे टीवी और समाचार पत्र पर इससे कम प्रतिक्रिया मिलती है??

क्या यह दिये हुए विषयों पर बात कर के निराश हो चुके हैं....और हम तक कोई ऐसा सच पहुँचाना चाहते हैं जिसके हम हकदार हैं??

क्या जो लगाम नौकरी ने इन पर लगाई है....उसे बेलगाम कर बेबाक सोच हम तक पहुँचाना चाहते हैं?

क्या यह मीडिया से मिली पहचान का आधार बना कर विश्व व्याप्त पहचान बनाना चाहते हैं ??

क्या यह ब्लौगिन्ग को अपनी कुण्ठा निकालने का एक साधन मानते है?!!


…………….या फिर यह भी हम जैसे आम ब्लौगरों की तरह ही हैं......??!!!


अगर इन पत्रकारों के ब्लौग का अवलोकन किया जाये तो इनके बीच एक सामाजिक समता वाद साफ उभरता है । यह एकजुट हैं । इनकी क्षमता और पहुँच इसलिए महत्वपूर्ण है ।

हो सकता है कि इन पत्रकारों ने भी नही सोचा की उनकी ब्लौगिन्ग का शौक मेरे जैसे लोगों की उत्सुक्ता का विषय बन जायेगा । और मैं खामखा ही अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रही हूँ ।

परन्तु क्या सतह के नीचे कुछ हलचल है ?

यह तो निश्चित है की यह लोग समाज के रीती रिवाज से परिचित हैं । समाज के मनोविज्ञान को भी खूब समझते हैं । ब्लौगिन्ग की दुनिया को समाचार पत्र की तरह ही देख रहे हैं। और हर सनसनी खबर को और सनसनी बना कर प्रेषित करने में माहिर हैं ।

स्वाभाविक तौर पर ब्लौगिन्ग करने से पूर्व इन्होने पाठकों के प्रतिक्रिया को आँका होगा।

क्या यह किसी पूर्वनियोजित योजना के तहत है?क्या इनके पीछे इनके अलावा कोई सन्गठन, अन्य व्यक्ति या कोई घुट है ? क्या इनके ब्लौग पर प्रेषित राय सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति की है या इन सभी की?!!

क्या यह समाज को कोई दिशा देना चाह्ते हैं ?


यह सवाल महत्वपूर्ण हैं । उत्तर हमें खोजने होंगे ।

दिमाग स्पन्ज की तरह होता है। आसपास मिली सूचना को तुरन्त सोंक लेता है। हमे पता भी नही चलता और हमारी राय बदल जाती है।

क्या हमारी राय बदलने की योजनाबद्ध कोशिश है??

ब्लौगिन्ग आम इन्सान को मिला सबसे श्रेष्ठ साधन है। यह हर इन्सान को अपनी सोच बिना दबे सामने रखने का श्रेष्ठतम जरिया है । यह पूरे विश्व में अलग अलग व्यवसाय , देश, धर्म, मत,दृष्टिकोण से जुड़े लोगों के जीवन का कच्चा चिट्ठा सामने रखता है। इन चिट्ठों को रिपोर्टरों या सम्पादकों की जरूरत नही है। यह वह लोग हैं जो अपनी अपनी जिन्दगी जी रहे हैं और हमें उसकी झलक भी दिखा रहे हैं । यह एक अवसर है कि दुनिया के हर कोने से हम आगे आकर हिन्दी की एक पहचान बना सके।
उन्मुक्त हो गा सके....हिन्दी हैं हम....हिन्दी है हम.....वतन है हिनदोसिताँ हमारा .....

सबसे ज्यादा जरूरी है की यह जारी रहे।
बिना संपादन के....बिना राजनीतिक नेताओं के....बिना मीडिया के..... हम अभिव्यक्ति के लिए ब्लौगिंग में स्वतंत्र हैं।


इस कार्य में यह पत्रकार क्या भूमिका निभा रहे हैं ?क्या यह इसमे मदद कर रहे हैं या यह इतना ऊँचा बोलना चाह्ते हैं की बाकी आवाज़ इनकी आवाज़ के नीचे दब जाये ??

हाँ यह मदद करने में सक्षम ज़रूर हैं ।

बेबसी की आवाज़ नहीं होती…यह उसे अवाज़ दे सकते हैं । यह समाज की सोच तथ्य सामने रख कर बदल सकते हैं । यह नेताओं के चेहरे से नकाब खींच सकते हैं । यह ज़रूरत की जगहो पर सही सहायता नियोजित कर सकते हैं । यह क्रान्ती और शान्ती की आवाज़ हो सकते हैं।

इनके पास आग है…यह क्या करना चाह्ते हैं ?…..रौशन भी कर सकते हैं और आग में सब खाक भी कर सकते हैं !!

कई बार स्वयं को स्वंय की शक्ति का अन्दाजा नहीं होता।

कहीं ऐसा तो नहीं कि इन पत्रकारों को भी खुद की शक्ति का अन्दाजा नही ?

या कहीं ऐसा है कि इन्हे इनकी शक्ति का पूर्वानुमान है ??

जब पहली बार मैने पत्रकारों को ब्लौगिन्ग की दुनिया मे देखा था; बहुत खुश हुई थी। पत्रकारों को समकक्ष पाना काफ़ी गौरव की बात लगी थी। मानती थी कि यह दबी आवाज़ को बुलन्द बनना सिखायेंगे ।

आज ना जाने क्यूँ ऐसा मह्सूस करती हूँ कि शायद यह कुछ बुलन्द आवाज़ों को भी दबाना चाहते हैं ।
शायद यह ऐसा करने में भी सक्षम हैं । ना जाने क्यूँ सुनना चाहती हूँ की मेरी सोच बेबुनियाद है।

किन्तु यह सिर्फ़ समय ही तय कर सकता है। निर्णय आने तक गुजरने वाला समय लौटाया नही जा सकता। इसलिये निर्णय समय पर छोड देते है किन्तु अपने विवेक की खिड़कियाँ खुली रखने के लिए खास ध्यान दे सकते हैं।

हम सभी को अपनी अवाज़ साफ़, अनुत्तेजित, और सहज रखनी होगी। अपनी बात संयत तरीके से कहनी होगी। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता किसी झुन्झलाहट में या किसी अभद्रता में खोने से बचानी होगी।

खुद की आवाज़ इतनी बुलन्द बनानी होगी की किसी भी ऊँची आवाज़ मे नही दबे।

…देखना यह है कि क्या इनकी आवाज़ भी सबके साथ शामिल होगी?!!

काश.........!!



सूचना- यह लेख कहीं और छापने की अनुमति मैने नहीं दी है।

Wednesday, March 7, 2007

नारी - एक विचार कुछ विमर्श

रेडियो कार में चल रहा था । सवाल पूछा गया अगले जन्म में आप लड़की बनना चाहेंगे कि लड़का ।

मै फट से बोली लड़की । पति साथ ही बैठे थे, बोले ....बात अगर हम दोनों में से एक की जगह लेने की है तो इसकी ही लूँगा ।

मेरे पापा दसवीं के बाद घर से भाग मुम्बई पहुँचे थे । दस साल इधर उधर भटकने के बाद शादी करने का ख्याल आया । लड़की माँगने माँ के घर पहुँचे तो नाना ने दो शर्तें रखी । दहेज नहीं दूँगा और लड़की को पढ़ने का शौक है इसलिए आगे पढ़ाना होगा । पापा ने झट हाँ कर दी । अठारह साल की लड़की घर आ गई । टाईपिंग, शार्टहैन्ड और B.A नौकरी के साथ पूरे किये । बीच में भाई और मैं भी उनकी दुनिया में आ गये ।

अभिव्यक्ति और चयन की आज़ादी विरासत में मिली । कोई भी घर का काम लिंग से नहीं जुड़ा था । घर एक इकाई था और जो जिस काम को बेहतर कर सकता था वह काम उसके जिम्मे था । पर इसका मतलब यह नहीं था कि दूसरे बाकी काम नहीं सीखे....हर किसी को हर काम सीख तैयार रखा जाता था । जरूरत के समय सभी तैयार ।

दहेज, घूँघट , सतीप्रथा और पुत्री होने का अभिशाप.....यह सभी पाठशाला में बहस के मुद्दों की तरह चर्चित होते थे....किन्तु इनसे कभी मेरा सामना नहीं हुआ । मैं आजाद थी...अपनी पहचान ढूँढने के लिये ।

बालिग होने पर खुद के भाई से अलग होने का अहसास हुआ । मेरी सोच, सामर्थ्य, सहनशीलता, अनुरक्ति, अनुभूति .......और बेचैनी, भावुकता, अहसास.....सब भिन्न था ।

मेरी सोच की रफ्तार, उसके पड़ाव....सब भिन्न थे ।

मैं सिर्फ अनुभवों का विषयाश्रित अवलोकन करने में असमर्थ थी । मुझे हर बात के कई पहलू नज़र आते थे । हर निर्णय भाव के साथ जुड़ा होता था । बचपन देख मातृत्व उमड़ पड़ता.....और सखियों संग बाँकपन.....मैं अल्हड़ भी थी और संयत भी.....

मैं अपने भाई से भिन्न थी....
एक लड़की थी....।

कालेज , शादी फिर माँ बनने का अनुभव । मैं अलग थी । सभी पुरुषों से भिन्न.... । मेरा अलग होना मेरी ताकत थी ।.........और मेरी कमजोरी ।

मुझे माँ बाप ने, परिवार ने और समाज ने पूरी स्वतंत्रता दी । जाओ अपना मुकाम हासिल करो । पर मैं फिर भी लड़खड़ा जाती थी ।

माँ की तरह परिवार चलाने के लिए मुझे नौकरी करने की जरूरत नहीं थी । मुझे नौकरी इसलिए करनी थी क्योंकि मैं करना चाहती थी । कभी खुद के बीमार बच्चे को छोड़ ओ पी ड़ी देखने बैठती थी तो अपराधबोध जकड़ लेता था । कभी मन करता घर में ही बैठ घर के सब काम करूँ । पर मैं समाज को एक सार्थक योगदान देने में समर्थ थी । अपनी अब तक की जिन्दगी मैने स्वयं को इस काबिल बनाने में गुजारी ।अब जब मैं सक्षम थी तो इस विडम्बना में ।
कभी अपने भाई और पति को इस दुविधा से गुजरते नहीं देखा । मेरी सोच और अब तक एकत्रित किए गये विचार मुझे इस चक्रव्यूह में और भीतर घसीटते थे । मैं किसी पर अन्याय नहीं करना चाहती थी । न बच्चों पर....ना स्वयं पर।

कभी सोचती अपनी बिटिया को क्या सीख दूँ । अपनी पहचान ढूँढो.....और जब हासिल करने वाली हो....तब अपने बच्चों की पहचान में योगदान दो ।

सफल नेता, अन्तरिक्षयात्री, सफलता किसी भी क्षेत्र में हो......उसके साथ एक सक्षम माँ बनना.....जो बच्चों की जिज्ञासा का उत्तर दे सके......जब बीमार हो तो गोदी में सुला सके.....त्योहारों में पकवानों से घर महका सके........एक अपवाद सा लगता है ।

बचपन से ही भाग्य साथ था । कसी रस्सी पर चल कर भी मैं खुद के मायने में खरी उतरी । पर पूरा श्रेय पति की सोच.....और मेरी किस्मत को जाता है ।

हम ऐसा क्या कर सकते हैं कि यह रास्ता थोड़ा आसान हो जाये ??

कहते हैं अगर एक पुरुष का विचार बदलो तो सिर्फ उसका विचार ही बदलता है । अगर एक स्त्री का बदलो तो पूरी कौम की विचारधारा बदली जा सकती है ।

दुर्गा, सरस्वती, जानकी, पार्वती........मंथरा, कैकयी, सूर्पणखा.......यशोदा, कुन्ती, द्रौपदी......राधा, मीरा...

कितने रूप हैं स्त्री के......

क्या बदलें ?!!

खुद की सोच....स्वयं की पूर्वनिर्धारित सीमा.......

माँ....सास....बहन....बेटी....बहु......सबको बदलना होगा.....

जानकी वनवास गई.....कैकयी के कारण......लंका गई....सूर्पणका के कारण...
द्रौपधी पाँच पाँडवो के साथ ब्याही गई....कुन्ती के कारण........

दशरथ और रावण को दोषी ठहराने से इनका दोष नहीं कम होता.....

पुरुष ने नारी को शायद ही कभी बाँधा है......बेडियाँ एक नारी ने ही अक्सर दूसरे पर डाली है......

नारी को ही पहल कर इन्हे खोलना होगा । आज़ाद होना होगा ।

मुझे पुरुष नहीं बनना । सृष्टि में परम ने मुझसे साझेदारी की है। मैं इस दायित्व से सम्मानित महसूस करती हूँ । जीवन को दुनिया में लाने से पहले उसे रूप मे ढ़ालने का जिम्मा भी मेरा है......मैं इसे भी निभाना चाहती हूँ। मैं अपने लहू से भविष्य सींचना चाहती हूँ।

मुझे समाज को भी अपनी सोच देनी है । एक सार्थक योगदान देना चाहती हूँ।
मुझे इसमें सहयोग चाहिए !!

माँ का....जो मेरे बच्चों को तब सँभाल सके जब मैं नज़दीक न हूँ....
सास का .....जब मैं अपने घर के प्रति मेरी जिम्मेदारियाँ निभाने में असमर्थ हो जाऊँ....
ननद का....बहन का.....भाभी का.......
....नारी का....

क्यूँ कोख में जन्म देते ही कुचली जाती हैं लड़कियाँ ??
भविष्य में सुरक्षा प्रदान करने का वादा न कर पाने की वजह से ।
बदल दो विचारधारा.....सास और माँ दोनो को सहेजो......

क्यूँ दहेज में जलाई जाती हैं अब तक लड़कियाँ ?
अपने पुत्र के लिए मत माँगो दहेज !

क्यूँ लड़की महज पिता या पति के पहचान के पीछे रहे ?
अपनी बिटिया को आत्मविश्वास दो....पहचान दो...!!

समर्थन पुरुष से नहीं....स्त्री से चाहिये.....

जो तुम्हे नहीं मिला.....वह तुम देने में सक्षम हो.....दे दो

वेशभूषा....काम ...अंदाज़.....सभी में आधुनिक करण करने के बाद नहीं.....आधुनिक करण में ओझल हो अपने समाज में विध्यमान आलम्बन को उखाड़ फेंकने के बाद नहीं ...अभी सचेतो....

अपने परिवारिक इकाई को सहेजो....इससे पहले की यह गलत धारणाओं का शिकार हो जाये....।

फिर लौट चलें अपने संयुक्त परिवार की तरफ.....एक नये इराधे के साथ.....जहाँ आलम्बन प्राप्त करने का प्रबन्ध हो......। भूत और भविष्य दोनों को सँवारे ।

शायद तब यह रास्ता आसान हो जाये ।

हम सभी के लिये ।

यह कोई पुरुष और नारी के बीच की लड़ाई नहीं है । एक वाहन के दो पहियों को आपस में उलझाने से क्या फायदा ।

इसमें सिर्फ मानवता के विकास का चयन करने का रास्ता है । समाज में स्त्री का योगदान जरूरी है । आर्थिक स्वतंत्रता हमें पूर्वानुमान नहीं लगाये जा सकने दुर्भाग्य से लड़ने में सक्षम रखता है । हमारी पहचान नई पीढ़ी को पहचान देती है। पहचान ढूँढने के लिए नवजात शिशुओं को भी वँचित रखने की जरूरत नहीं। सहयोग से हम भविष्य को एक नींव दे सकते हैं ।

....एक सपने का रेखाचित्र.....और.....उसमें भरने के लिये कुछ इरादों के पक्के रंग......!!!