कमरे में हल्का उजाला था। जैसे रात की रोशनी में साये सहमें खड़े हों। लकड़ी की अलमारी पूरी बंद नहीं थी। कोई कपड़े का गहरे रंग का लटका नाड़ा जैसे चढ़ते चढ़ते रह गया हो। लगता था कोई साँप अलमारी में घुसने को है। टेबल लैंप का बल्ब जल नहीं रहा था पर चाँदनी में बिल्ली की आँख सा चमक रहा था। खिड़की पर पर्दों के साये गुसुर फुसुर कर रहे थे...किसी साजिश की तैयारी हो रही हो जैसे।
उसके माथे पर पसीना था। गला सूखा हुआ। प्रिड्ज की आवाज़, कहीं पास के घर में कोई हँस रहा था शायद, पंखा बंद मनहूस चेहरा लटका कर खड़ा था।
वह कोई ऐसी चीज़ को तलाश रहा था जो उसे कुछ सुकून दे सके। देखे हुए सपने को फिर सिर्फ सपनों के अहसासों में बदल सके। तकिये को ही कस कर पकड़ा था। पलक झपकी नहीं और पूरा सपना रिवाइन्ड होकर आँखों में फिर चलने लगा।
तेज़ तूफानी हवायें। आसपास की हर चीज़ उखड़ कर उड़ रही थी। पर उसका ध्यान उधर नहीं था। उसके चेहरे का रंग सफ़ेद, आँख में ऐसा खौफ जो उसने जागते हुए कभी महसूस नहीं किया था।
ज़मीन पर दोहरा हुआ मुट्टियाँ बींच कर, आँख बंद कर तूफान में खड़ा था। डरा हुआ....डूबते हुए जैसे खुद ही उभरने की कोशिश कर रहा हो।
हवा का रुख ठीक उसकी तरफ था। सपाट बिखरी हवायें सिमटती गोल होती जा रही थी। तेजी से उसकी ओर। उसे हार का अंदाज़ा था शायद। उबलते आँसू पलकों से गिरे उससे पहले हवा में उड़ गये थे।
हवा ने उसे जड़ कर निचोड़ के उसकी जान सोंक ली.....वह गिरा था निढ़ाल होकर । पर देख सकता था। हवा दूर जा रही थी। फिर जैसे ठिठक कर रुकी। एक क्षण के लिये सब रुक गया। धूल का हर कण स्थिर हो गया। एक चेहरा उभर आया।
कभी भूल नहीं सकता उसको। उसके लंबे केश लहरा रहे थे। और वो हँसती हुई फिर तूफान बन गई।
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6 comments:
स्टिल लाइफ़ में डेंस ड्रामा? फिर? फिर आगे?..
गजब का दृष्टिकोण है आपका.
बहुत अच्छा लिखा आपने.
एकदम अद्भुत लगता है ये सब पढ़ना.
'वो' का खूबसूरत चित्रण किया है आपने। कभी कभी 'वो' के खौफ को रात के अंधेरे में कोई न कोई महसूस कर ही लेता है शायद।
kya ye koi kahaani hai ?
कविताओं की ही तरह गद्य भी सुंदर है।
काफी समय से यहाँ आपके ब्लॉग पर आकर एक ही चीज को ध्यान से देख रहा था की आप बात कहते वक्त एनी चीजों का कितनी बारीकी से वर्णन करती हैं.. बड़ी कमाल की प्रतिभा है आपकी इस ख़ास विधा में..
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