Tuesday, November 6, 2007

बाबुल



घर में सब्जियाँ खत्म हो गई थी। कार लेकर निकली थी। सोच रही थी।

पिछले हफ्ते फोन किया धर पर तो मम्मी ने बताया....पापा की तबियत ठीक नहीं है...सुना तो ही परेशान हो गई...टेस्ट्स, डायग्नोसिस, ट्रीटमेन्ट....सुनते समझाते बिमारी तो याद रही...पापा कहीं ओझल से हो गये।

आज बात हुई....वाक्य के कोनों पर हाँफ...जिसको मेरे कान सुने उससे पहले....आवाज़ फोन से दूर हो जाती। फिर जो आवाज़ सुनाई देती उसमें ताजगी। जैसे रुक रुक कर ताज़गी की चुस्की की जरूरत हो।

पापा ऐसे कभी नहीं थे। सुबह चार बजे उठ जाते। पाँच साल की मैं भी। हाथ में दूध के लिये केटली लेकर पूछते....."बिजु....आयेगा...?!"
मैं अपनी चप्पल में पाँव उतार कर भाग कर आ जाती। फिर उनकी छोटी उँगली के साथ उछलती , लटकती उनके साथ....दूधवालों की बस्ती तक। पापा बहुत तेज़ चलते हैं....आज भी....मैं भी तेज चलती हूँ...अब...पर तब और अब भी ...पीछे रह जाती हूँ। कौलोनी में लाइन से लगे मकान, टीन की छतें...आँगन में गिरे हरसिंगार के फूल.....मोगरे खिलते हुए....हल्के गुलाबी रंग के गुलाब गुच्छों में....हरे नींबू से लदे पेड़....अमरूद कुतरता तोता....अँगडाई लेती बिल्ली.....और आते जाते कोईएक लोग, नमस्ते, सलाम कहते हुए।

दूधवाला आँख मलते हुए उठकर आता...पापा मुस्कुराते...."अभी तो उठे हो पानी नहीं मिला पाये ना"....वह भी हँसता...कहता,"अरे आप के दूध में कैसे पानी मिला सकता हूँ?" लीपे हुए आँगन में बिछाये पलंग पर मैं पसर जाती....बछड़ा फुदक कर कभी इधर कभी उधर ....शिकायत से मुझे ऐसे देखता कि उसकी माँ का दूध मैं क्यों पीने जा रही हूँ।

लँबे घूँघट के पीछे से भी उसकी घरवाली की आँखे मुस्कुरा कर पापा को देखती....फिर वह कहती....."बाबूजी यह सिर्फ आपके दूध में पानी नहीं मिलाता।"

पापा का हाथ एकदम सख्त हुआ करता था। पकड़ो तो लगता कि किसी मज़बूत सहारे को पकड़ रखा है। अक्सर हाथ लेकर बैठ जाती...."पापा आपकी भाग्य की रेखा कितनी छोटी है.?"...पापा हँस कर कहते ,"मेरी किस्मत में तुम्हारी मम्मी लिखी थी....बाकी सब उसकी किस्मत में लिखा है।"

मम्मी उनके लिये जिन्दगी से बढ़कर है। पापा को अठ्ठाईस साल की उम्र में मम्मी मिली। दस साल का अंतर। बारहवीं कक्षा के तुरंत बाद। पापा के लिये जैसे जिंदगी की सबसे बड़ी सौगात मिल गई हो। नाना ने पूछा लड़की को पढ़ाओगे...कहा हाँ....दहेज लोगे ...कहा ना....खुश रखोगे....जान देकर भी....

नाना ने लड़की दे दी।

बेहद गरीबी में पले थे पापा....भूख लगे तो तौलिया लेकर कमर पर बाँध कर स्कूल जाओ। आकर काम करो। कुछ हो तो खा लो। नहीं तो सो जाओ।

पढ़ाई में खास अच्छे नहीं रहे। खास तौर पर अपने बाकी तीन भाईयों जितने.....दसवीं में उत्तीर्ण नहीं हुए। दादा जी थोड़े गुस्से में .....ज्यादा देसी दारू के नशे में....मारते चले गये....उनसे बचकर भागे तो मुंबई पहुँचकर रुके।

वहाँ छुटपुट काम....थोड़ा अनुभव....फिर राजस्थान के परमाणु ऊर्जा कोन्द्र में छोटी सी एक नौकरी। मम्मी आई तो हैरान...नाना उस ज़माने के जमींदार...उनकी उम्मीदों से काफी कम था जो मिला।
"टाइपिंग सीखनी है....शॉर्टहैंड.....बी ए......" ,पापा मानते गये। बीच में भाई और मैं भी आ गये । माँ नौकरी में लग गई।

पापा का एक ही जीवन का लक्ष्य था....अपने परिवार को खुश रखना और बहुत प्यार करना....
मम्मी का एक ही लक्ष्य था ....अपने जीवन के स्तर को बेहतरी के लिये बदलना।

रास्ता एक ही था....पढ़ना....।

पापा ओवरटाइम करते रहते....मम्मी घर, बैंक एकाऊँट्स, और हमें सँभालती। सोने से पहले प्रार्थना जरूर करते....सुबह फिर शुरु।

थक कर लेटते तो कहते...."पाँव पर चलेगी तो आराम आ जायेगा।" मैं झट तैयार। "कँधे पर लोगे ? गुड़ की बोरी बनाओगे....?"वो भी झट तैयार। उनकी लाड़ली थी मैं....नहला कर तौलिये में लपेट कर लाते फिर एक काला ठीका गाल पर लगा देते। भाई और मेरा झगड़ा होता तो कभी नहीं कहते कि मैं गलत हूँ। माँ नाराज़ होती तो कहते,"छोटी सी अपनी गुड़िया है....इसे भी डाँटे क्या।"

मैं जब उठती पापा काम कर रहे होते। मैं जब सोती तब भी पापा काम कर रहे होते। थकान कितनी भी हो काम से कभी शिकायत नहीं हुई। हर काम इतनी तन्मयता से करते कि कभी कभार पापा के बॉस कहते...."इतने परफेक्शन की जरूरत नहीं है।"

काम पर जाने से पहले पापा दूध लाते, फिर मम्मी और उनके लिये चाय बनाते, मम्मी दोपहर का खाना बनाती....पापा सुबह के लिये आठ रोटियाँ....सबकी दो।

साड़े आठ बजे गाड़ी होती....पापा आठ बजे तैयार.....आठ बजकर दस मिनट पर बस स्टाप पर। मम्मी भी उसी गाड़ी से जाती थी। जब पापा बस स्टाप पर जाते मम्मी बाथरूम जाती। आठ बजकर पच्चीस मिनट पर मम्मी बस स्टाप पर पहुँचती....दोनों एक दूसरे को निहारते....दूर अलग अलग सीट पर बैठकर काम पर निकलते।

मम्मी में हमेशा टीचर जैसा अंदाज़ रहा। और पापा में गाँव की ताज़गी।

जब बड़ी होने लगी तो महसूस किया पापा जरूरत से जल्दी गुस्सा हो जाते हैं। अपनी बात कह कर ही आते हैं भले ही उसके लिये कितनी ऊँची आवाज़ में बोलना पड़े। पापा में पढ़े लिखे अफसरों सी तहजीब नहीं थी। थोड़ा परेशान होती। बाकी बच्चों के पापांओं को देखती....अफसरी अंदाज़....मैनरिस्म्स भी ...बिल्कुल पौलिश्ड भी.....

पर पापा फिर भी बहुत प्यारे थे....उनसे चाँद सितारा भी माँगो....वो ना नहीं करते। हर चीज़ हमें मिल जाती....सबसे अच्छे कपड़े....बैग,कामिक्स, खिलौने....हमें अहसास भी नहीं होता कितने ओवरटाईम का फल है।

जब आँठवी कक्षा में आई...."क्यों" शब्द मुझसे जुड़ गया। मम्मी कुछ भी कहती मैं पूछती क्यों। हर क्यों का जवाब मम्मी नहीं देना चाहती....नाराज़ होती, दुखी होती....। मम्मी को दुखी देखकर पापा दुखी हो जाते। उनके समझाने पर भी नहीं समझती तो उनका चेहरा उतर जाता।

उनके निर्णय करने का तरीका बिल्कुल आसान था.....भाई और मेरे बीच की लड़ाई हो तो भाई गलत....मम्मी और मेरी हो तो मैं। उनके हिसाब से छोटी बहन को सिर्फ प्यार से समझाया जा सकता था और माँ को कभी गलत नहीं ठहराया जा सकता।

मुझे ऐसा न्याय पसंद नहीं था। उन्हे बदलना नामुमकिन।

तब अपने सही और गलत की बुनियाद रख रही थी और उनसे थोड़ी दूर हो गई।

जब दसवी में थी तो भाई बारहवीं में.....दोनो ने बोर्ड एक्साम में स्कूल में टॉप किया। मम्मी पापा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पहली बार एक ही घर से दोनो बच्चों ने टॉप किया...वह भी निम्न मध्य वर्ग से।

कहानी आगे बड़ी। भाई कंप्यूटर इंजीनियर बना...अमेरिका में इंटेल में सीनीयर स्ट्रैटजिस्ट.....मैं बच्चों की डॉक्टर। बचत कर के रखी रकम से एक बँगला....पाँच बैडरूम का केरल में.....दामाद पसंद का मिला....जिसने दहेज नहीं माँगा और बेटी को आगे पढ़ाया....

हाँ काफी वक्त गुजर गया।

दो पोतियाँ एक नाता एक नाती....

हमेशा चिन्ता रहती थी कि भावुक सी बेटी को प्यार करने वाला संयत जीवनसाथी मिलेगा कि नहीं। जयसन को उन्होने एकदम उपयुक्त पाया था।

सुपरमार्केट पहुँच चुकी थी। लिस्ट पर नज़र ड़ाली। गरम मसाला खत्म हो गया था। साँभार पावडर की जरूरत नहीं थी। पापा ने छुट्टियों में ही तैयार करके भेजा था। मम्मी एलर्जी की वजह से मसालों से दूर ही रहती हैं। बच्चे पीछे की सीट से चिल्ला रहे थे। दिवाली के लिये पठाखे लेना। मैने कहा ,"इट इस नॉट एलाउड़ हियर।" " देन लेट अस गो टू अप्पापन्स हाउस....लाइक लास्ट टाईम....अप्पापन विल बर्स्ट क्रैकर्स....।"

मैने उन्हे अनसुना किया.....पार्किंग के लिये एक धिरहम नहीं मिल रहा था......झल्ला रही थी....अब छुट्टे कहाँ से आयेंगे....

तभी याद आया....गये साल पापा आये थे तो कहा था....,"तेरी कार के इस ड्रा में छुट्टे ड़ाल रहा हूँ....किसी दिन नहीं हो तो ले लेना....और हाँ वापस भी रख देना।"

ड्रा खोला....पाँच साल की उनकी गुड़िया का विश्वास आज भी हिला नहीं था....पापा ने कहा था तो होगा ज़रूर....एक धिरहम के दस सिक्के सरीके से रखे थे।

एक साल पहले लिखी कविता फिर ड़ाल रही हूँ....


बाबूजी से बातें

जीवन के किनारे में..

साँसों के समंदर में...

एक उम्र बूढ़ी हो रही थी...

थोड़ी पुरानी हो रही थी...




अनुभव के बोझे तले...

कमर से थोड़ी झुकी थी...

तेज रफ्तार की ज़िन्दगी में...

हिचकिचा कर रुकी रुकी थी...




चेहरे पर यादों की झुर्रियाँ...

हाथों में कटी सी लकीरें...

जीवन की रेखा भी...

पूरी होने को थी धीरे धीरे...





"ना जाने कब सुस्त हुए कदम

ठहरे से दिन.....

पल गुजरे सहम

जवानी बड़ी जल्दी कट गई

झुर्रियाँ कमाने में लग गई ..."





"आज साया भी कतरा रहा है

रोशनी को भी कुछ गिला है

शुष्क हाथों में हमारे

अब यह खालीपन क्या बला है!!"





"क्या सोच कर यूँ रुक गये हो ?

किन ख्यालों में गुम हुए हो?

मेरा हाथ थामो ..

ना छोड़ो कभी भी

अँधेरे में डर लगता अभी भी!!"





"आदत है मुझको तेरी डाँट की

रूठ कर मुझसे फटकार की...

मेरी आँख जब भी होती थी नम

टपकते हुए तेरे अनुराग की...."





"याद मुझको वो दिन जब गिर गई थी

उठाते हुए आँख गीली हुई थी...

खिलाया था मुझको जैसे बिठाकर

निवाला तुम्हे तोड़ कर मैं भी दूँगी "





"धुन्ध मे जाकर अकेले

सताना ना मुझको

तुम अगर खो गये तो

....रोती रहूँगी"





"उँगली पकड़ कर

जीवन क्षितिज पर

तुम्हारे साथ साथ

मैं भी चलूँगी "





"दादा के पास

जाने से पहले

बताना मुझे....

लम्बी सी उनको

चिट्ठी लिखूँगी...."





26 comments:

Sanjeet Tripathi said...

स्पर्शी!!
आंखें नम सी हो गई!!

काफ़ी दिन बाद आपके ब्लॉग पर आया और हमेशा की तरह आपके लेखन को सलाम करता लौट रहा हूं।

आशीष said...

दिल को छू गई आपकी लेखनी

Pratyaksha said...

उम्मीद है आपके पापा अब बेहतर होंगे ।

काकेश said...

पूरा नहीं पढ़ पाया ..पढ़ भी नहीं पाउंगा शायद.. आंखे नम होकर रोक देती हैं.

महेंद्र मिश्रा said...

अंतरात्मा की आवाज़ की अभिव्यक्ति अपने बहुत सुंदर ढंग से की है सराहनीय

महेंद्र मिश्रा said...

अंतरात्मा की आवाज़ की अभिव्यक्ति अपने बहुत सुंदर ढंग से की है सराहनीय

दुष्यंत said...

अच्छा भर कहना काफी नही ,खुदा करे जोरेकलम और ज़्यादा

मीनाक्षी said...

पाँच साल की उनकी गुड़िया का विश्वास आज भी हिला नहीं था....पापा ने कहा था तो होगा ज़रूर.... मर्म स्पर्शी ! आपके पापा जल्दी ठीक हों जाएँ , कामना करती हूँ.

prabhakar said...

बेहद भावपूर्ण और भोलेपन के साथ!

Neeraj Goswamy said...

बेहतरीन लेखन, सीधा दिल से दिल तक.
बधाई
नीरज

sushant jha said...

दिल भर आया..सच में बेटियाँ, पिता से कितने गहरे जुडी होती हैं..और आप केरल की होकर कितना अच्छा हिंदी लिखती हैं..

parul k said...

एक एक शब्द रूह तक भिगो गया…कल ही पापा के पास से लौटी हूं…आज फ़िर लौट जाने का मन हो आया………awsome post

Udan Tashtari said...

बहुत भीतर तक दिल को छू जाने वाली लेखनी. आपके पापा जी को शीघ्र स्वास्थय लाभ हो, यही हमारी कामना है.

अफ़लातून said...

एक घूँट में पढ़ गया /पी गया। प्रार्थना है ,पिताजी की तबीयत ठीक होगी।

Lavanyam - Antarman said...

बेजी,
आप के जैसी गुडीया सी बिटिया सभी के हो और आप के पापा जी जैसे पापा सभी के होँ
जीवन के लँबे बरसोँ का यह शब्द -चित्र,मन मेँ घर कर गया - आपके पापा के स्वास्थ्य लाभ के लिये मेरी दुआ कुबुल करेँ
और दीपावली मँगलमय हो उसकी शुभेच्छाएँ भी स्वीकारेँ परिवार के सभी के लिये हम सभी की, दीपावली की शुभ कामना सह:
धन तेरस नी वधाई --
-- लावण्या

मीत said...

Boss, I'm speechless.

ये क्या है ?? जैसा कि मैं ने कहा - मेरे पास बोलने जैसा कुछ भी नहीं आप के इस post पर. फिर भी ये लिख रहा हूँ ..... जाने क्या सोच कर. या शायद इस लिए कि सोच साथ छोड़ गयी है. पता नहीं क्या है .... But something has struck somewhere inside ....

Thanks for this feeling.

Priyankar said...

अभी तीन वर्ष पहले पिता को खोया है . क्या लिखूं . आपने एकदम भावुक कर दिया . आंखें डबडबा आईं हैं, अक्षर अस्पष्ट हो गए हैं .

Pramod Yadav said...

आज खाली बैठा था। आफिस में। सोचा नेट खंगालू। मंथन करना शुरु किया इस समुद्र का आपका ब्लाग मिला.
पढ़ते समय कई बार अपनी भावनाओं का रोकने के लिए पढ़ना रोकना पड़ा। रुका तो पर दिल अटका रहा।
और अंत में आंखे नम हो गयी..
बस इससे ज्यादा और क्या लिखूं

Pramod Yadav said...

आज खाली बैठा था। आफिस में। सोचा नेट खंगालू। मंथन करना शुरु किया इस समुद्र का आपका ब्लाग मिला.
पढ़ते समय कई बार अपनी भावनाओं का रोकने के लिए पढ़ना रोकना पड़ा। रुका तो पर दिल अटका रहा।
और अंत में आंखे नम हो गयी..
बस इससे ज्यादा और क्या लिखूं

anuradha srivastav said...

दिल को छू गई आपकी लेखनी। शायद पिता के लिये बेटी सबसे बढ कर होती है। ईश्वर उन्हें जल्दी स्वस्थय करें।

राज यादव said...

क्या लिखु ???? कुछ लिखते ही नही बन रहा है ...आंखो को अस्क्क बहाने से नही रोक पा रहा ..ऐसा लग रहा है ,की ये मेरी कहानी है ...सब कुछ जन पहचाना सा लग रहा है.............

जोशिम said...

आपके पापा के लिए, उनके स्वास्थ के लिए, लम्बी उम्र के लिए, ताजगी, तरान के लंबे घूँट के लिए, उनकी मुस्कान के लिए, अद्भुत लेखनी को सजग रखने के लिए - हम सब के हिस्से की प्रार्थनाएं, प्रोत्साहन सहित | इससे अच्छा शब्द चित्र पढे लंबा समय बीता

पुनीत ओमर said...

एक बार शुरू किया तो एकदम अपनी खुद की कहानी की तरह से पढता ही चला गया. कुछ बातें वाकई में कभी नहीं भुलाई जा सकती. इन्सान चाहे कितना भी आगे बढ़ जाये, कुछ भी क्यों न पा ले, पर इतना समर्थ हो सकता की अपने माता पिटा का कर्ज उतार सके.
वैसे ये दो वाक्य-
....."बिजु....आयेगा...?!"
अभी तो उठे हो पानी नहीं मिला पाये ना"....
सिर्फ त्रुटी वश पुल्लिंग में लिख गए हैं या फिर कुछ बात है.... अगर बात है तो अवश्य ही गंभीर बात रही होगी.

Beji said...

नहीं पुनीतजी कोई गंभीर बात नहीं है....मूलरूप से केरल से हैं...पापा की हिंदी ही ऐसी है...प्यार से बेजी बिजु बन जाता है।

Pramod Singh said...

"मेरी किस्मत में तुम्हारी मम्मी लिखी थी....बाकी सब उसकी किस्मत में लिखा है।" ओहोहो, कैसे लिखा को मलयालम में कैसे कहते हें?

PD said...

इतना अच्छा विवरण पढ कर आंखों मे नमी सी महसूस होने लगी.. पहली बार आपके चिट्ठे पर आया हूं और आते आपका पंखा, एसी, कूलर सब बन गया हूं.. :)