सोच रही हूँ....
सारे समय सोचते रहना क्यों जरूरी है....हर बात की खाल निकालना...रोशनी को भी इतने शेड्स में देखना....कहाँ से आई..कहाँ छनी...कहाँ गिरी...कहाँ रुकी....
उस उजाले से क्या उजागर हुआ....वह कितना साफ दिखा...उसके साये कितने लंबे कितने छोटे....
उनका अस्तित्व कितना निर्भर इस रोशनी पर.....
हाथ में जैसे एक टॉर्च...मन में एक धुँधला सा ख्वाब.....कोशिश हर बिम्ब में उसे तलाशने की....
जिन्दगी जैसे इसी तलाश का नाम हो....
धुँधली सी इस तस्वीर की आड़ी तिरछी रेखायें...कभी गुम हो जाती है..कभी और साफ दिखती हैं....
जहाँ साफ दिखती हैं...वहीं थम जाने का मन करता है....जैसे खुद को निहारने का एक मौका मिला हो....
मन...हाँ मैं मन के आधीन हूँ....मन का पूरे मन से करना चाहती हूँ.....
इस आधीनता से कभी परेशान नहीं हुई....पर इसके स्वाधीनता पर संदेह, प्रश्न देखती हूँ तो बौखला जाती हूँ....
योग की छोटी सी बात कि साँस को महसूस कर के अंदर बाहर करो....मेरी समझ से बाहर है....
साँस जैसी सहज बात को इतना असहज करने की क्या जरूरत है.....पता नहीं.....
दौड़ते समय हाँफना, हँसते समय रक्त का संचार अधिक होना...दुखी खबर सुनने पर गहरी साँस लेना....इससे अधिक और क्या सहज होगा....
संयम, नियंत्रण .....जीवन का सबसे अमूल्य पाठ....हाँ ऐसा ही कुछ कहकर इसे सिखाया जाता है.....
एक एक करके अपनी इन्द्रियों को बंद करते चलो....कबतक.....जबतक जड़ ना हो जायें....
जबतक मेरे और मेरे आसपास पड़े निर्जीव चीज़ों में कोई अंतर ना रह जाये......
इन्द्रधनुष....सात रंग....तीन प्राथमिक रंगों का संगम....सफेद रंग.....जिसे पहचानना आँखों पर निर्भर....
आँख बंद कर लो....रंग अपने जिन्दगी से अलग कर लो....
जीवन क्या है...क्यों है....मैं नहीं जानती....पर अगर मुझे मिला है तो मैं जीवित रहना चाहती हूँ.......
हो सकता है कि सन्यास और त्याग से अंतिम सच तक जल्दी पहुँचा जा सके.....
मुझे कोई जल्दी नहीं है....
जीवन सुंदर है...मेरे लिये....
नवजात शिशु की भींची हुई आँखे जब खुलती हैं.....कली जब नींद से उठती है....बच्चा जब स्तन पकड़कर सो जाता है....बादल जब हाथी घोड़ा और ऊँट बनता है.....
सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज़ को भी कुदरत ने कितनी बारीकी से बनाया है....
बर्फ का हर कण का रूप अलग....जैसे एक ही रंग के हज़ारों फूल ....आसमान से झड़ रहें हो....
आँख बंद कर लूँ....
पेड़ पर बैठी कोयल की कूक...हवा के पदचाप ... लहरों का स्वर....बच्चे की खिलखिलाहट
सुनना बंद कर दूँ....
रात को हरसिंगार से आती खुशबू....बरसात मिट्टी पर गिरे तब उठती सौंधी खुशबू....माँ की रसोई की महक.....
सूँघना बंद कर दूँ.....
साँसो की गरमी, स्पर्श की नरमी....पीठ पर थपथपाहट....गोद की ममता....महसूस करना छोड़ दूँ.....
संवेदनाओं को दफना दूँ....आँसू और दर्द का संबंध देखना छोड़ दूँ.....अपने स्नेह की ताकत का अंदाजा लगाना छोड़ दूँ....
सोचना छोड़ दूँ.....
मैं जीवित हूँ....हो सकता है कि यह कोई माया हो.....जैसे कुछ बूँदो से गुजर कर प्रकाश सात रंग में बँट जाता है....पर मैं यह सात रंगों को बड़ी लगन से पहनना चाहती हूँ....जबतक आसमाँ पर हूँ....पूरे रंगों में खिलना चाहती हूँ....
सोचना चाहती हूँ....महसूस करना चाहती हूँ.....
स्व के अहम में जीवित रहना चाहती हूँ....
Subscribe to:
Post Comments (Atom)




12 comments:
सोच का इतना सुन्दर वर्णन - "स्व के अहम में जीवित रहना चाहती हूँ.."
मानव मन की सोच की इतनी सुन्दर व्याख्या पढ़ कर आनन्द आ गया...
शुभकामनाएँ
सोचना चाहती हूँ. महसूस करना चाहती हूँ.....अच्छे खयालात का सहज बयान...
kho gayi poori tarah se..bahut bahut khuubsurat lagaa...kitni baar padhuun...aur kya kya quote karuun? samajh nahi aa raha....shayaad pratyek jeevit insaan me aisi bhaavnaaye uthh ti rahti hain..magar sab bhaavnaao ko shabd nahi de paatey...aapkaa prayaas ya kahuun ki manobhaav bahut acchey lagey. thx
संदर,सहज कविता। अच्छा लगा। बहुत दिन बाद आपकी कविता पढ़ी। अब पिछ्ली पढ़ने का मन कर रहा है।
स्व के अहम में जीवित रहना चाहती हूँ....
--बहुत उम्दा चित्रण. वाह!! एक बहाव है और
(खूब सारी बिन्दी.....याँ)
वाह बेजी, क्या यह रचना मेरे नाम से प्रेरित है, ? प्लीस नही मत कहना, ( मज़ाक था ), बहुत ही सुंदर है शब्द शब्द
सजीव जी,
आपका नाम ऐसे भाव से जरूर जुड़ा है...आप पर यह नाम सार्थक तो है ना।
बेजी आप डॉक्टर हैं और योग की बाबत कहती हैं :"योग की छोटी सी बात कि साँस को महसूस कर के अंदर बाहर करो....मेरी समझ से बाहर है....
साँस जैसी सहज बात को इतना असहज करने की क्या जरूरत है.....पता नहीं.....
दौड़ते समय हाँफना, हँसते समय रक्त का संचार अधिक होना...दुखी खबर सुनने पर गहरी साँस लेना....इससे अधिक और क्या सहज होगा....
संयम, नियंत्रण .....जीवन का सबसे अमूल्य पाठ....हाँ ऐसा ही कुछ कहकर इसे सिखाया जाता है....."
एक डॉक्टर ने जब इतनी सरलता से खारिज कर दिया तो मुझे डर लगने लगा । क्या साँस लेने की सामान्य प्रक्रिया से कुछ समय हटकर हम ज्यादा ऑक्सीजन फेंफडों तक नहीं पहुँचाते ? मैं एलोपैथी दवाओं और बदले हुए आहार,तम्बाकू छोड़ने के अलावा कुछ आसन और प्राणायाम कर रहा था , हृदय के लिए । अब ?
अफलातून जी आपकी ही तरह जयसन ने भी इस ओर मेरा ध्यान दिलाया था। उनका कहना यह था कि योग में साँस की तरफ ध्यान इसलिये देते हैं ताकि हम मास्किंग एफेक्ट को हटा कर हर एहसास को और तीक्ष्णता से महसूस कर सकें....और तीक्ष्णता से जीवन कैसे अनुभव करूँ?!!....जिनके जीवन में हाल में यह तीक्ष्णता नहीं है शायद उन्हे लाभ हो....
ज्यादा औक्सिजन की बात के प्रमाणित फायदें हैं....पर बिना मिलावट के जीवन और साँस का सबसे बड़ा फायदा सजीव रह पाना ही है।
सोच में डुब कर सोचिये फिर जरा
किसलिये सोचना किसलिये छोड़ना
सोच ही तो प्रणेता बनी है कभी
सोच का साथ बिल्कुल नहीं छोड़ना
सोचते सोचते ध्यान के केन्द्र में
ज्ञान की एक सम्पूर्णता है छुपी
इसलिये सोच की चादरों को सदा
पास रखना बिछाना , उन्हें ओढ़ना
अगर अपने ब्लोग पर " कापी राइट सुरक्षित " लिखेगे तो आप उन ब्लोग लिखने वालो को आगाह करेगे जो केवल शोकिया या अज्ञानता से कापी कर रहें हैं ।
सुंदर एहसास.
Post a Comment