
यह हवा नमकीन क्यूँ है??
इसमें तेरे आँसू मिले हैं
या पसीना घुला है?!!
जिस कोने में मैं खड़ी हूँ....वहाँ से ऐसा दिखता है.....
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Via chitthajagat.in
5 comments:
शानदार...
अरे, यह तस्वीर तो कलकत्ता की लगती है.
या तो म्हारे कलकत्ते की फोटू दीखै . अठ्यां को पसीनो और बीको'इ नमक .
कुछ उत्तर नहीं देते बनता। मुझे याद है छात्र जीवन में हमलोग साइकिल रिक्शा के बदले आटो रिक्शा लेना पसन्द करते थे। कारण यही कि उनपर बैठकर सवारी करना अमानवीय लगता था । पर एक बार एक साइकिल रिक्शा वाले ने समझाया कि उन्हें भूखा रखना और भी अमानवीय था ।
घुघूती बासूती
सामने सब के स्वीकार करता हूँ
हिन्दी से कितना प्यार करता हूँ
कलम है मेरी टूटी फूटी
थोड़ी सुखी थोड़ी रुखी
हर हिन्दी लिखने वाले का
प्रकट आभार करता हूँ
आप लिखते रहिए
मैं इन्तज़ार करता हूँ ।
NishikantWorld
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