Saturday, July 21, 2007

स्मृति की छवि

(कहानी लिखने का पहला प्रयास)

“आपने बताया नहीं जाना कहाँ है?” टैक्सी ड्राइवर ने पूछा तो अनुराग अचानक से चौंका। “फिरोझा स्ट्रीट” अनुराग ने खोये खोये ही कहा था।

ना जाने स्मृति कैसी होगी। हाल की एक फोटो देखी तो थी । थोड़ी मोटी हो गई थी। पर मुस्कराहट में अभी भी एक मासूमियत थी और आँखों में वही पुरानी शरारत।

वो छोटी सी चुलबुली लड़की उसके आँखों के सामने घूम रही थी। स्मृति को अनुराग बचपन से ही जानता था। उनके पड़ोस में ही रहती थी। बचपन से ही अनुराग उसे देखता तो देखता रह जाता। उससे पाँच साल छोटी थी। पहली बार मिली थी तो एक चिड़िया हाथ में थी। “ देखो ना इसका पाँव टूट गया है ।”

अनुराग को चिड़िया कम और स्मृति ज्यादा दिखाई दे रही थी। “तुम्हारा नाम क्या है ?” “स्मृति और तुम्हारा?”
गुँजन, अनुराग की छोटी बहन दौड़ते हुई आई थी। “यह स्मृति है, मेरी दोस्त...और यह मेरे भैया अनुराग।”
“अनुराग इस चिड़िया को चोट लगी है, क्या तुम कुछ कर सकते हो?” स्मृति ने बड़ी उम्मीद से पूछा था।

“हाँ हाँ क्यों नहीं!!” अनुराग का ध्यान टूटा।

“तुम भी भैया को भैया बुलाओ ना!!” गुँजन ने स्मृति को झिड़कते हुए कहा था। “अनुराग कुछ करो ना”, स्मृति ने गुँजन को अनसुना करते हुए कहा ।

अनुराग स्मृति को निहार रहा था। कोई दस ग्यारह बरस की होगी। हाथ में जिस तरह से स्मृति ने चिड़िया को उठा रखा था ऐसा प्रतीत होता था जैसे किसी शिशु को उठा रखा हो। उसके चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास था । कोमलता और निर्भयता का अजीब सा संगम । आँखों में मासूमियत थी पर व्यक्तित्व में एक परिपक्वता ।

“अनुराग!!” स्मृति की आवाज़ जैसे सुनाई ही नहीं दी हो…

घुटनों पर ध्यान गया था....दोनो छिले हुए थे। हाथ के कुछ नाखून कटे ,कुछ टूटे हुए, पाँव में चप्पल नहीं थी।

चेहरा एकदम दूधला,बड़ी बड़ी आँखें, चोटी सी नाक और लाल भरे से होंठ।
“तुम सुन रहे हो अनुराग!!”
“हाँ लाओ पट्टी कर देता हूँ।”
जब स्मृति पानी पिलाने चिड़या को ले गई तब अनुराग का ध्यान गुँजन की ओर गया था। रूठ कर एक कोने में बैठी थी। “क्या हुआ गुँजन?”

“वह स्मृति अपने आप को ना जाने क्या समझती है.......अनुराग!!...कोई दादी अम्मा की तरह बुलाने की क्या जरूरत है भैया भी बुला सकती है। मैने जो कहा जैसे सुना ही ना हो। अब कभी घर नहीं लाऊँगी।”

“अरे नहीं गुँजन, ऐसे किसी भी ऐरे गैरे का भैया थोड़ी ना हूँ, तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा।”

गुँजन मन गई थी। अनुराग ने राहत की साँस ली थी। वह स्मृति से फिर मिलना चाहता था।

इस बार स्मृति से मिला था कब्बड़ी के मैदान में। दोनो टीम में लड़के और लड़कियाँ दोनों थे। स्मृति सबसे छोटी थी और सबसे सुन्दर भी। बाकी लड़कियाँ लड़कों जैसी ज्यादा थी। अनुराग को मालूम था कि ऐसे में रणनीति लड़की को फँसाने की ही होती है।
अनुराग को स्मृति को वहाँ देखना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था। खींचातानी के बीच स्मृति का होना ....वह खुद समझ नहीं पा रहा था कि उसे खराब क्या लग रहा था।

खेल शुरु हुआ। अनुराग का खेल में बिल्कुल ध्यान नहीं था।
स्मृति बिल्कुल खेल में रच गई थी। फुर्ती इतनी की हाथ ही नहीं आती थी। कहीं भी , कभी भी बीच से निकल जाती । अनुराग का ध्यान लगातार स्मृति पर था।

जब खेल खत्म हुआ तो अनुराग की टीम हार चुकी थी।अनुराग हैरान था...खुद से। उसकी अवस्था कुछ सम्मोहित किये लोगों सी थी। इतना बेकाबू उसने पहले खुद को महसूस नहीं किया था।

अचानक से टैक्सी रुकी तो अनुराग ठिठका था।देखा तो लाल बत्ती थी। सहज होते हुए खिड़की से बाहर झाँका था। लोग, वाहन जैसे किसी क्रम में आगे बढ़ रहे हों।

क्रम...हुंह क्रम में सुधीर , स्मृति का भाई अनुराग के पीछे था। पन्द्रह अगस्त की परेड का अभ्यास चालू था। बीच में थक कर बैठते तो आपस में बातचीत होती। सुधीर से जल्द ही दोस्ती हो गई।

फिर घर में आना जाना। कभी उन्ही के घर रह जाता।

स्मृती बड़ी हो रही थी.....बहुत ही सहजता से। उसको देखकर लगता था जैसे कोई जंगली फूल अपने सुंदरता के अहसास से परे....ताजा तरोजा बेपरवाह खिला खड़ा हो।

नाक थोड़ी तीखी होने लगी थी। शमीज के पीछे से कभी यौवन झाँक जाता।

अनुराग का व्यक्तित्व भी काफी निखर आया था। कभी स्मृति को इस ओर ध्यान देते नहीं देखा था।

अपने आप में कोई ऐसे भी खोता है पर स्मृति को किसी चीज़ की परवाह नहीं थी। मस्त और खुश। ना तो उसे बाकी लड़कियों की तरह मेहंदी लगाते, सिलाई बुनाई करते देखा...ना खुद को घंटों शीशा निहारते। कहीं कोई अच्छा गाना सुनती तो थिरकने लगती...हर छोटी बड़ी बात पर खिलखिला कर हँसती....और कभी घंटों खिड़की पर बैठी रहती।

अनुराग अक्सर उसे तैयार होते देखता। दो छोटी, वालों में लाल रिब्बन, फिर काजल की डिबिया पकड़ कर मँझली उँगली से दोनो आँखों में लगाती।फिर उँगली सर पर पोंछ, आइने में मुस्करा कर देखती। उसका श्रृंगार पूरा ।

कॉलेज में भर्ती होने पर स्मृति से मिलने गया था। कहाँ अनुराग का ध्यान उसके पंखुड़ियों से होठों पर स्थिर था और कहाँ स्मृति का ध्यान सुधीर का सामान बाँधने में था।

होस्टल में आया, अकेला पड़ा तो उसका सहारा स्मृति ही थी। रात को उसकी तस्वीर के साथ कितनी बातें....कई खत लिखे पर कोई भी डाक में नहीं भेजा।

इस बार घर गया तो बरामदे में ही स्मृति को रोक लिया।
“मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ स्मृति।”

स्मृति खिलखिला कर हँस पड़ी थी। “मुझे मालूम है।”


होस्टल के वार्डन ने देर रात जब बुलाया तो माता ठनका था। क्या हुआ होगा।

माँ की सड़क पार करते हुए दुर्घटना हुई थी। जैसे तैसे घर पहुँचा। गुँजन का रो रो कर बुरा हाल था। रसोई स्मृति ने सँभाल रखी थी। पापा मम्मी के पास थे।

कुछ दिन माँ की हालत गंभीर रही। इस बीच कभी स्मृति ,कभी उसकी मम्मी गुँजन के पास रहते, ढाढस बँधाते।

स्मृति को देखते ही अनुराग का मन करता कि उसका हाथ पकड़ इस मुश्किल समय से बाहर आ जाये। स्मृति कभी लाड़ से देखती तो कभी छेड़ कर भाग जाती। उसकी बातों में कब मन हल्का हो जाता पता ही नहीं चलता।

माँ की हालत सुधरने लगी थी। पापा ने होस्टल का रास्ता दिखाया। घर आना जाना कम हुआ। और कॉलेज की चकाचौंद में बाकी यादें भी धुँधली पड़ी।

कभी पुरानी यादों में टहलता और स्मृति याद आ जाती। खुद पर हँसी आती ।

स्मृति भी कॉलेज गई। माँ की दुर्घटना के बाद मुलाकात नहीं हुई।

उस दिन सुधीर से पता चला था। स्मृति के विवाह की तारीख तय हो गई थी।

अजीब सा लगा था। बड़ी मुश्किल से छुट्टी कर पहुँचा था। स्मृति को गुँजन के साथ देखा। खुले बाल ....हमेशा की तरह खिलखिलाती हुई....जैसे कोई कली जो खिलने के बस तैयार खड़ी हो।

अनुराग को खुद से ही डर लग रहा था। मन था कि पूरी दुनिया को अनदेखा कर उसे आलिंगन में ले ले ।

और स्मृति बेपरवाह चूड़ियाँ पहन रही थी।

अनुराग खुद को अजीब से जज़्बे से जूझते हुए महसूस कर रहा था। अपने सभी विचारों और मूल्यों को अपने जज़्वों पर हावी पा रहा था। जब खुद की तड़प सहन नहीं कर सका तो कुछ बहाना कर तुरंत वापस चल दिया।

समय बीता, अनुराग का भी विवाह हुआ। साथ ही में पढ़ती एक लड़की थी। सभी मायनों में सहधर्मिणी। अनुराग खुश था। एक बेटा और एक बेटी, छोटा सा परिवार।

जब माँ को कहा शहर से गुजरेगा तो माँ ने स्मृति का नंबर दिया था। और एक उसके परिवार के साथ की तस्वीर भी। स्मृति से बात हुई थी । “शहर में हो और अब तक घर नहीं आये।” स्मृति की आवाज़ में वही कनक आज भी थी। “चलो अब देर नहीं करो, जल्दी आओ ...खाना साथ ही खायेंगे ।तुम्हारे पसंद का बैंगन का भरता बना है। सब घर पर भी हैं। तुम सब से मिल भी लोगे।”
अनुराग ने जेब से फोटो निकाल कर देखी । दो बच्चे ...दोनो लड़के...शक्ल से ही शरारती नज़र आ रहे थे। स्मृति भी काफी खुश लग रही थी। उसके पति को देखा.....।

और जैसे समय लुड़क कर पीछे पहुँच गया।

ड्राइवर ने मुड़ कर पूछा था, “साहब तबियत तो ठीक है!!”

“हाँ हाँ!!”

“फिरोझा स्ट्रीट आ गया कहाँ जाना है?”

पानी की बोतल बैग में थी...दो घूँट पीकर अनुराग बोला,
“कोई बार है आसपास....वहीं ले चलो...।”

6 comments:

कामगार-श्रमिक said...

प्रयास अच्छा है ....एक सास में पढ़ गया.. कहानी में ठहराव नहीं है ये अच्छी बात है.. आगे जरूर कोशिश करें

Udan Tashtari said...

लगता तो नहीं कि कहानी लिखने का पहला प्रयास है..कोई कैसे कह सकता है, इतनी बहावपूर्ण और अर्थजनक शैली को देख. कम से कम हम तो नहीं.
अब गद्य में झंडे फहरायें, शुभकामनायें. मुख्य बात तो भाव हैं वो तो आपके अति उत्तम होते ही हैं. फिर क्या गद्य और क्या पद्य...बधाई.

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया कहानी है।बधाई।

अनामदास said...

पसंद आई. पात्रों के नाम भी शायद सोचकर रखे हैं आपने ऐसा लगता है. बहाव अच्छा है. मैं पढ़ गया क्योंकि अच्छी थी और छोटी सी. आजकल लोगों की कविता नहीं झेल पाता (आपकी पढ़ता हूँ) कहानी आपने पढ़वा ली, मतलब समझिए कि अच्छी है.

Beji said...

आप सभी के प्रोत्साहन का शुक्रिया।

समीर जी पूरी उम्मीद थी आप कुछ तो अच्छा ढूँढ ही लेंगे। आपकी टिप्पणियों का हमेशा इंतज़ार रहता है।
कामगार श्रमिक जी आगे कोशिश करूँगी। बहुत दिनों बाद इस रस्ते नज़र आये। आते रहिये।

परमजीत जी आपने कहानी को सराहा शुक्रिया।

नामों की महिमा अनामदास जी आप ही समझ सकते थे। :))

Rohit Tripathi said...

bahut sunder likha aapne.... bahut hi sunder