हमेशा से छोटे मोहल्लों और कस्बों में रही। थोड़े से लोग ....भीड़ भाड़ से दूर....किराने की दुकान,चक्की, पानवाला,फेरीवाले....
मुंबई महानगर से दूर.....। साल दो साल में कुछ दिनों के लिये वहाँ जाते। कभी बेहरीन और सौदी अरब से आये मामा से मिलने ...तो कभी बी ए आर सी के अस्पताल में जाने के लिये.....
मेरे लिये मुंबई का मतलब सिर्फ एक घर था। कहने को वे हमारे दूर के रिश्तेदार थे....पर उनसे इतना करीबी रिश्ता था कि असली रिश्ता दूर का लगता था।
चाचा, चाची भैया और दीदी......। एक कमरा और किचन। पानी की टंकी, कपड़े टाँगने के लिये एक लकड़ी जिसके एक सिरे पर एक कील, सिलाई की मशीन जिसपर अक्सर चाची सिलाई की मशीन के साथ होती,फोल्डिंग डाइनिंग टेबल.....बाहर लौबी में कैरम बोर्ड पर जमें बच्चे।
दीदी बाहर जाते जाते बुलाती.... “बेजी आते क्या.....मैं बाजार जाते.....”
“नहीं मैं यहीं भैया के संग रुकूँगी....आप जाओ....”
“वो तो सोते है....तू आते तो अपन बाजी लेकर आते....गजरा भी दीदी लेकर देते..”.
“नहीं नहीं...”
सुनिल.... भैया थोड़े सुस्त और एकदम शांत से थे। मुझे वह बहुत अच्छे लगते थे। बात कम ही किया करते थे पर हमेशा एक मंद मंद मुस्कराहट होठों में खेलती रहती। वो बिल्डिंग के ऊपर ले जाते....टैरस से शहर और अलग लगता। इतनी ऊँचाई से नीचे देखती तो सर चकराने लगता....और झट भैया की उँगली पकड़ लेती। मैं उन्हे स्कूल, घर , मेरे दोस्त ....सभी के बारे में बताती....वह बड़ी ध्यान से हर बात सुनते।
उनके परिवार में एक दूसरे के बीच बहुत ही अपनापन था। भैया और दीदी दोनों नौकरी करते थे। चाचाजी का कहना था अपने पैरों पर खड़े हो तो ही कुछ मतलब है। मुझे और भाई को भैया लोकल ट्रेन में लेकर अलग अलग जगह जाते। इतनी भीड़ को देख हम दोनों एकदम आश्चर्य चकित होकर देखते।
समय भी बीता और मैं थोड़ी बड़ी भी हो गई। खुद को और अपने आसपास हर किसी को समझने और देखने का मेरा अंदाज़ बदल रहा था। कभी दादी अम्मा की तरह तो कभी छोटे बच्चे की तरह व्यवहार करती। इस साल जब भैया से मिली तो हम दोनों कुछ बदल बदल गये थे।
टैरस पर उनकी उँगली पकड़े बिना ही खड़ी होती। लोकल ट्रेन में वो इस तरह मेरे साथ खड़े होते कि गल्ती से भी किसी का हाथ मुझ पर ना आये......। उन्होने मुझे बच्चे की तरह देखना छोड़ दिया था। उस दिन किसी बात को लेकर माँ फटकार रही थी.....गलत तो मैं थी.....किन्तु इतने लोगों के बीच खुद को अपमानित महसूस कर रही थी....उस समय भरी आँखों से देखा था उनकी आँखों के कोनों में अनुराग तैर रहा था।
आपस में कहे हुए शब्द बहुत कम थे....पर हम दोनों को एक अलग ही रिश्ते में बाँधने के लिये काफी थे।
और तब शुरु हुआ खतों का सिलसिला.......जो वो कहते नहीं थे ....लिखने में हिचकिचाते नहीं....मैं अपने जिन्दगी का कच्चा चिट्ठा उनके सामने रखती.....वह मुझे बाकी दुनिया का दृष्टिकोण समझाते...। मैं बदल रही थी....और वह मेरे साथ में इस बदलाव के साथ थे। वो एक लड़की के बचपन से यौवन के सफर को देख रहे थे और मैं मुंबई के एक आम आदमी के अनुभूतियों को महसूस कर रही थी।
माँ को अजीब लगता कि ना जाने यह चुप रहने वाला लड़का क्या लिखता होगा......और यह चार पाँच पन्ने भर कर क्या साहित्य हर हफ्ते लिख भेजती है।
हम दोनों इस चिन्ता से दूर थे। कब इतने अच्छे दोस्त बने पता ही नहीं चला.....। मुंबई से गुजरात ....शहर से कौलोनी तक....हर हफ्ते कुछ शब्द और हमें जोड़ देते।
कालेज गई तो धीरे धीरे साथ छूटने लगा। उनकी शादी की तारीख माँ ने बताई थी। नहीं जा सकी। मेरी शादी में भाभी और बेटी के साथ आये थे......। देखा था....पर मैं अपनी जिन्दगी के इस नये अहसास में मशगूल थी।
वक्त बीतता गया......और माँ और चाची से ही एक दूसरे के बारे में पता चलता।
अगस्त ग्यारह....2003 मुंबई से अबुदाभी (UAE) के लिये फ्लाइट बुक्ड़ थी.....मुंबई बदला बदला लग रहा था....सालों पुराने बिताये सभी पल आँखों के सामने तैर रहे थे.........सुनिल भैया याद आ रहे थे....कैसे बदल जाते हैं हम....सोच रही थी.....एयरपोर्ट से फोन कर लूँगी सोचा....पापा साथ थे.....।
पापा का मोबाइल अचानक बज उठा। पापा का चेहरा इतनी तेजी से गंभीर हो रहा था कि कोई अनजाना सा डर मेरे मन में बैठ रहा था...। “क्या हुआ पापा?”, मेरे प्रश्न को जैसे सुना ही ना हो....।
पापा जयसन के कान में कुछ कह रहे थे। चेक इन करने का समय हो गया था। मैं परेशान हो रही थी। आखिर फोन किसका था।
पापा ने नसीहत देते हुए कुछ कहा.....वो काफी उदास हो गये थे.....ना जाने क्यूँ लग रहा था कि उनकी उदासी का कारण वो फोन था...।
फ्लाइट टाइम पर थी। चेक इन करने के बाद जयसन को कहा सुनिल भैया को बुलाते हैं...।
जयसन के चेहरे पर इतने सारे भाव असमन्जस में थे....क्या कहे और क्या नहीं....मैं आतुर हो रही थी....
“अब तुम उनसे नहीं बात कर पाओगी.....वे नहीं रहे!!”
जयसन क्या कह रहे थे मेरी समझ से बाहर था।
ONGC का हेलिकौप्टर क्रैश हुआ है
...22 लोग मृत बताये गये है....सुनिल भी उन्ही में है।
पहली बार देश से बाहर जा रही थी......अरब महासागर के ऊपर से.......उन्ही हवाओं के बीच से.......
भैया का चेहरा आँखों के सामने घूम रहा था। सुबह सुबह उठाती थी तो कहते....बेड़ एक्सरसाइस कर रहा हूँ.....। डिफेन्स के लोगों पर बात की थी एक बार तो कहा था...ऐसी वायलंट जिन्दगी नहीं पसंद....एक चूहे को तक मार नहीं सकते थे.....मेरी आँखों में कभी आँसू देखते तो कहते....तुम रोना नहीं...नहीं तो मैं रो दूंगा....।
रिग जाने के लिये जरूरी था हेलिकाप्टर का सफर.....और नियती को यही समय मिला था अपना विधान सुनाने को....
मन नहीं मान रहा था....कुछ तो गलत होगा इस खबर में.....
अबुदाभी में बीच रिसौर्ट पर ठहराया था......अजीब सी घुटन हो रही थी......पानी को देखती तो लगता कि भैया को यही ले गई.....
चाची और भाभी से बात की थी....क्या कहती....उनका गम मेरी समझ से बाहर था.....
और मेरा भी.......
आज भी वो सभी खत मेरे पास सहेजे हुए हैं.....ऐसा लगता है शब्द अभी बोल पड़ेंगे....मेरे लिये भैया इन्ही खतों में हैं.....मेरे जीवन के गुजरे पड़ाव पर आज भी खड़े हुए....
होंगे ही......नहीं तो किसने कहा....रोना नहीं मैं रो दूँगा ....।
(असली नाम गोपनीयता के लिये बदल दिया गया है)
-इस दुर्घटना में आहत हुए सभी को समर्पित ।
Wednesday, July 4, 2007
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8 comments:
मार्मिक चित्रण है. दिल हिल गया.
यदि आप ... का प्रयोग कम करें तो अच्छा होगा. हां, सुझाव मेरा है लेकिन चुनाव आपका है.
बहुत ही अच्छा बेजी आपने लिखा , बिल्कुल दिल को छूती और मन को झकझोरती हुयी .
ह्र्दयस्पर्शी संस्मरण!!
आभार बांटने के लिए!!
इतना सुचित्रमय वर्णन लिखकर आपने सचमुच 'सच्ची श्रद्धाञ्जलि' दी है। वे पाठकों के मन में अमर बने रहेंगे।
जिन्दगी ऐसी ही संगदिल होती है । अजीब बात है, गुज़रते वक्त के साथ इन जख्मों का दर्द कम होता चला जाता है ।
बहुत ही मार्मिक और हृदय स्पर्शी संस्मरण. आपके भैया को हमारी श्रृद्धांजली. वो कहीं नहीं गये, आपके साथ यादों में हैं, उन खतों में हैं. आपको हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे.
प्रतिक्रिया शब्दों में बयां करनी कठिन है। आपमें लेखनी से चित्र आंकने कि क्षमता है।
साधुवाद
oh, so raw and naked.. very touching.. such is the life.. cruel and affectionate..
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